Monday, July 15, 2013

प्रभाष जोशी होने का अर्थ

Friday, July 12, 2013

एक खलनायक जो नायक था ...


1920-2013

हिंदी सिनेमा का लीजेंड चला गया । 'द लेजेंड ऑफ़ हिंदी सिनेमा..., 'द विलेन ऑफ़ द मिल्लेनियम '.... 'प्राण'  नहीं रहे ...।  अभिनय की विविधता ..के प्रतीक प्राण हमारी कलात्मक उपलब्धियों में से एक थे ..। भारतीय सिनेमा के इतिहास में, लोगों के दिलों-दिमाग में प्राण हमेशा सिनेमा में किये-धरे  योगदान के लिए याद किए जाते रहेंगे, प्रेरणा देते रहेंगे।' जी हाँ,  प्राण होने का यही मतलब है। प्राण कभी खत्म नहीं होता ! रूपांतरित होता है...। प्राण हमेशा बने रहेंगे ...। अपनी सृजनात्मकता में रहेंगे युगों-युगों तक । 


खलनायक ‘खल’ छवि वाले नायक होते हैं। खलनायक ऊर्जा, उत्तेजना और भावावेग का समग्र होते हैं जो नायक को संघर्ष के लिए प्रेरित  करते हैं। नायक को नायक बनाते हैं। खलनायक वह अंधेरी रात है, जिस पर विजय पाकर ही नायक चमकता है। विजय का प्रकाश ! फिल्मों में खलनायकों का होना फिल्मों को एक नये हौसले से भर देता है। भारतीय सिनेमा में खलनायक दर्शकों का उत्साह, जोश-खरोश और छिपी भावनाओं की अभिव्यक्ति बनकर उभरते हैं। दर्शक नायक बन जाते हैं। ‘मार दो साले को....’, ‘और मारो.... और पीटो...’ जैसी आवाजों, सीटियों, तालियों के बीच दर्शक अपनी सीटों से खड़े हो-होकर हौसलाआफजाई के क्रम में सिनेमाघर को हो-हल्ले से भर देते हैं । इस तरह खलनायक एक अदम्य वेग का संचार कर देते हैं। हारकर और पीटकर दर्शकों में विजय भाव भर देते हैं। कभी-कभी प्राण जैसे खलनायक सकारात्मक भूमिकाओं से खलनायक- नायक की नई छवि रच डालते हैं। 2010 में सीएनएन ने उन्हें एशिया के शीर्ष 25 सर्वकालिक अभिनेताओँ  में रखा । 'विल्लैन ऑफ़ दी मिल्लेन्नियम ' ...। प्राण सबके चहेते रहे हैं । 90 ' पार प्राण हिंदी सिनेमा के लिजेंड रहे हैं । 




प्राण साहब!  यह फिल्म इण्डस्ट्री द्वारा उन्हें दिया गया सम्मान का नाम है। उनकी प्रभावी कला से आकर्षित लोग अपने बच्चों का नाम प्राण रखने लगे। उनका पसंदीदा शब्द ‘बरख़ुरदार’ लोगों की जुबान पर छा गया। प्राण साहब ने हिंदी फिल्म इण्डस्ट्री में छह दशक लंबा कॅरियर तय किया और ‘विलेन ऑफ द मिलेनियम’ से नवाजे गये। बड़ी बहन (1949), आह (1953 ), बिराज बहू (1954) , ‘हलाकू’ (1956), ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960), ‘विक्टोरिया नं. 203’ (1972), 'कश्मीर की कली ' (1964),‘उपकार’ , (1967),  ‘पूरब और पश्चिम’, ‘जंजीर’ (1973), ‘अमर अकबर एंथनी’ (1977), और ‘डॉन’ (1978) जैसी यादगार फिल्में कर प्राण चाहनेवालों के जहन में बस गये। 
हिंदी सिनेमा के सर्वाधिक मशहूर खलनायकों में एक प्राण कृष्ण सिकंद अपनी स्थिर आवाज, संकरी आंखों और हाव-भाव के विविधतापूर्ण प्रदर्शन के दम पर हिंदी सिनेमा के परिदृश्य पर छा गये।
 इनका जन्म एक संपन्न सिविल कॉन्टै्रक्टर के घर दिल्ली में हुआ। पिता का स्थानांतरण कई जगहों पर होता रहता था। इसी क्रम में प्राण ने अपना मैट्रिकुलेशन मेरठ से पूरा किया और फिर लाहौर में एक फोटो स्टूडियो के मैनेजर की तरह काम करने लगे। फिल्म लेखक  मोहम्मद वाली के साथ उनकी एक आकस्मिक मुलाकात ने प्राण को पंजाबी फिल्म ‘यमला जाट’ (1940) में एक भूमिका निभाने का अवसर दिया। इसके बाद ‘चौधरी और खजांची’ जैसी फिल्मों ने इन्हें अजीत और के.एन.सिंह की तरह खलनायक की पहचान दिलाई। निर्माता दलसुख पंचोली ने ‘खानदान’ में नूरजहां के साथ मुख्य भूमिका दी।
 फिल्म की सफलता ने प्राण को स्टार बना दिया। ‘खानदान’ की सफलता के बाद मिली हीरो की भूमिकाओं को इन्होंने अस्वीकार कर दिया, क्योंकि एक हीरो की तरह नाचने-गाने में असहज महसूस करते थे। 1947 में देश विभाजन के बाद प्राण बंबई चले आये। लाहौर में स्टार छवि के बावजूद भारतीय फिल्म राजधानी में काम ढ़ूंढऩे में नाकामयाब हो रहे थे कि लेखक सद्दात हसन मंटो और अभिनेता श्याम की मदद से बॉम्बे टॉकिज की फिल्म ‘जिद्दी’ में रोल मिल गया। फिल्म सफल रही। ‘गृहस्थी’, ‘अपराधी’ और ‘बड़ी बहन’ लगातार सफल फिल्में रहीं। अगले दो दशकों तक अपनी ब्लॉक बस्टर फिल्मों के साथ प्राण छाये रहे। जिनमें शामिल हैं- ‘आजाद’, ‘मधुमती’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’ तथा ‘राम और श्याम’।
अपनी भूमिकाओं में पेशेवर प्राण अपने कॉस्ट्यूम और मेक-अप का खास ध्यान रखते थे। अपनी हर फिल्म में विविध चरित्रों को रचते प्राण की हर फिल्म दिलकश अदाकारी से भरी होती। 1960 के पूर्व वर्षों में इन्होंने व्यंग्यात्मक खलनायकी का सूत्रपात ‘हाफ टिकट’ और ‘कश्मीर की कली’ जैसी फिल्मों से किया। मनोज कुमार की ‘उपकार’ में मलंग बाबा के रोल से इन्होंने नाटकीय छवियों संग अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा। इस तरह की उनकी नई छवि वाली अन्य सफल फिल्में ‘जंजीर’, ‘कसौटी’ और ‘विक्टोरिया नं. 203’ रहीं।
प्राण की बायोग्राफी के नामित शब्द हैं ‘.....और प्राण’। यह इसलिये क्योंकि उनकी अधिकतर फिल्मों में कास्टिंग में उनका नाम ‘....और प्राण’ या कभी-कभी ‘‘...सबसे ऊपर प्राण’’ जैसे शब्दों में होता था। यह फिल्मकारों का उन्हें क्रे डिट और सम्मान देने का तरीका था। प्राण साहब का स्टाइलिस्ट अंदाज और विविध आयामों वाली उनकी छवि उन्हें औरों से अलग बनाती है। सकारात्मक सोंच वाले खलनायकों की उनकी भूमिका ने नई छवियां गढ़ी। 1970 के दशक में उनका कॅरियर अपने चरम पर था। फिल्म ‘डॉन’ में प्राण को अमिताभ बच्चन से कहीं अधिक पैसे मिले थे।
प्राण को उनकी बेहतरीन अदायगी के लिए कई पुरस्कार सम्मान मिले, जिनमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए तीन फिल्म फेयर पुरस्कार सहित नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ भी शामिल है।       
अमिताभ बच्चन ने बहुत सही कहा है कि 'चाहे तकनीक बदल जाएं, सिनेमा बदल सकता है, लेकिन प्राण हमेशा सिनेमा में योगदान के लिए याद किए जाते रहेंगे, प्रेरणा देते रहेंगे।' जी हाँ,  प्राण होने का यही मतलब है ।    
 प्राण कभी खत्म नहीं होता ! रूपांतरित होता है ...। प्राण हमेशा बने रहेंगे ...। अपनी सृजनात्मकता में रहेंगे युगों -युगों तक ।

Thursday, October 11, 2012

अमिताभ: एक सुंदर कविता






अगर सिनेमा मानस पटल पर छा जानेवाली कोई सुंदर-सी किताब है तो अमिताभ बच्चन उस किताब की एक सुंदर कविता हैं। ऐसी मधुर पंक्तियां हैं जो बरबस ही होंठों पर नाच उठती हैं। किसी अज्ञात सम्मोहन में बिंधे से हम पंक्ति -दर -पंक्ति उसे गुनते रहते हैं। औरों से उसकी चर्चा करते हैं। फिर सब मिलकर उसका सस्वर गान करने लगते हैं।  एक गाथा बन जाते हैं। फिल्मी किरदार के रूप में हम उस गाथा को परदे पर अवतरित होता देखते हैं। वह एक आम आदमी बन जाते हैं। उनके अंदर वही सब मानवीय भावना दिखती हैं जो हमारे-आपके अंदर हैं। अमिताभ बच्चन को देखते हुये हम हंस सकते हैं, रो सकते हैं,  तालियां पीट सकते हैं,  ढीशूम-ढीशूम कर सकते हैं। एक संपूर्ण कलाकार को जीवन के विभिन्न रंगों में डूबता देखते हैं। साथ-साथ हिचकोले खाते हैं। अमिताभ बच्चन!! अमिताभ बच्चन!! गॉड ऑफ स्क्रीन,  वन मैन इंडस्ट्री, मेगा स्टार, लिजेंड, एक्टर ऑफ मिलेनियम...  सहस्त्राब्दी के नायक ...अमिताभ ने नायक की अवधारणा को बदलकर रख दिया ! 
 





गंगा किनारे वाले उस छोरे की लंबाई,  दुबले-पतले बदन, पतली-महीन  आवाज की शुरू में अनदेखी की गई, अस्वीकृत किया गया। बाद में वही आवाज एक सुंदर पहचान बन गई। बेमिसाल । अमिताभ का नाम देश-विदेश, गांवों-कस्बों, बस्ती-बस्ती में सुना जा सकता है। वे आमजन की वेदना, गुस्से-आक्रोश को कला के सांचे में ढाल देते हैं। दबे और दबाये हुए लोगों की आवाज को सिनेमाई अंदाज देते हैं और इस तरह जन-जन के मन में अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। लंबी-पतली टांगों, छरहरे बदन और डूबती हुई दूर तलक देखती गहरी आंखों को लोग सिर-माथे पर उठा लेते हैं। हाथों-हाथ लपक लेते हैं। दिल के कोनों और मन की अनंत गहराइयों में बिठा लेते हैं। उनकी हेयर स्टाइल,  पहनावे और संवाद और हर पहलू की नकल करते हैं।हां! अमिताभ सिनेमा-संसार के अद्भुत नक्षत्र हैं। विश्व मंच पर छा जाने वाले सुनहरे सितारें हैं, जिनकी एक छवि पाने के लिये इजिप्टियन महिलाएं इस कदर उतावली हो जाती हैं कि काइरो एयरपोर्ट 'डेंजर जोन ' बन जाता है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  नजीबुल्लाह उनके साथ अपनी ढेर सारी तस्वीरों के बदले फिल्म 'खुदा गवाह'  की शूटिंग के लिए फिल्म टीम को अफगान एयरफोर्स के लगभग आधे भाग का प्रबंध करवाते हैं। यहाँ तक की मुजाहिद्दीन भी उनकी करिश्मा से बच नहीं सके ।  और अपने वतन में उनकी प्रसिद्घि का यह आलम छाया होता है कि कुली (१९८२) की शूटिंग के दौरान  पुनीत इस्सर के प्रहार के कारण घायल हो जाने पर पूरे देश की सांसें थम जाती हैं। उनकी हर एक सांस देशवासियों की प्रार्थनाओं के साथ घुल-मिल जाती हैं। सलमान रुश्दी 'द सैटनिक वर्सेस'  में रेखा के स्क्रीन लवर के रूप में उन्हें इंगित करते हैं।  शशि थरूर और शोभा डे अपनी कहानियों में उन्हें उद्घृत और चित्रित करते हैं। प्रसिद्ध लेखक-गीतकार जावेद अख्तर उनकी भूमिका को संबोधित करते हैं- '....ऐसा गुस्सा जिसमें गरिमा हो, ऐसा आक्रोश जो दुखी करता हो और जिसमें आंसू हों।...'अमिताभ निर्विवाद रूप से हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे हैं।  सिनेमा आकाश के शिखर पुरुष । बॉक्स ऑफिस पर प्रभाव इतना गहरा रहा कि १९७० के दशक में उन्हें 'वन मैन इंडस्ट्री'  कहा जाता रहा।
हिंदी के प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन के बेटे अमिताभ बच्चन का जन्म इलाहाबाद में हुआ। दिल्ली के किरोरीमल कॉलेज से इन्होंने विज्ञान स्नातक की उपाधि ली। कलकत्ता से अभिनय में अपना भाग्य आजमाने बंबई गये।फिल्मी करियर में पहला ब्रेक के. ए. अब्बास की फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' से मिला। लेकिन फिल्म असफल रही। इसके पूर्व प्रख्यात फिल्मकार मृणाल सेन की क्लासिक फिल्म भुवन शोमे (१९६९) में वॉयस नैरेटर के रूप में काम किया। शुरुआती असफलताओं के बाद ऋषिकेश मुखर्जी की कुछ फिल्मों जैसे-'आनंद'  अभिमान और नमक हराम ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। १९७३ में फिल्म जंजीर  की अपार सफलता ने अमिताभ की एंग्री यंग मैन की छवि बना दी। एक ऐसा युवा नायक जो कानून को  हाथों में लेकर भी गलत कामों का बदला लेता है, वाली बनी उनकी अन्याय के खिलाफ आक्रोश जनित छवि ने उन्हें स्टारडम तक पहुंचाया। दीवार, शोले  त्रिशुल और शक्ति का क्रोध, कुंठा, गुस्से, आक्रोश और प्रतिशोध से भरा नायक युवा सपनों का प्रतिनिधि  बन गया। सलीम-जावेद ने १९७० के दशक में गुस्से को प्रदर्शित करती उनकी फिल्मों में एंग्री यंग मैन वाली भूमिका में जान डाल दी। अमिताभ के अभिनय को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- मनमोहन देसाई की वन मैन इंटरटेनर वाली फिल्में जैसे- कुली  और मर्द । यश चोपड़ा और प्रकाश मेहरा की मेनस्ट्रीम वाली सीरियस ड्रामा वाली फिल्में, जैसे- नमक हलाल, शराबी  और सिलसिला या ऋषिकेश मुखर्जी की अभिनय प्रधान फिल्में।  १९८४ में उन्होंने बाल सखा राजीव गांधी के कहने पर राजनीति की ओर रुख किया तथा इलाहाबाद से लोक सभा की सीट भी जीती। राजनीति की चक्करघिन्नी में वह एडज़स्ट  नहीं हो पाए । पर राजनीति  के बाद वाली फिल्मों में वह जादू नहीं रहा। बच गया बस जादुई यथार्थ  ! १९९० में अग्निपथ और हम की सफलता ने उन्हें फिर ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया। १९९२ के बाद फिल्मों से पांच साल का अवकाश लिया और सारा ध्यान अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल) पर केंद्रित रखा। १९९७ में फिल्म मृत्युदंड  से वापसी की। लेकिन यह फिल्म भी उनकी अन्य फिल्मों मेजर साब और सूर्यवंशम की तरह वह खोया हुआ आकर्षण वापस लाने में असफल रही। फिर भी, अमिताभ टेलीविजन के गेम शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में होस्ट की भूमिका से चाहनेवालों की लंबी फेहरिस्त से घिर गये। एक नया अवतार । जोश और जुनून । नये मिलेनियम की और नये दशक की शुरुआत के साथ अमिताभ नये अवतार में सामने आये और एक रिश्ता- द बॉण्ड ऑव लव, मोहब्बतें, अक्स, कभी खुशी कभी गम,  आंखें और हम किसी से कम नहीं जैसी कई प्रशंसनीय और प्रसिद्घ फिल्में की। उन्हें अनेक राष्टरीय-अंतर्राष्टï्रीय सम्मान मिलें हैं। मिलते चले जा रहे हैं । फिल्म फेयर अवार्ड , राष्टïरीय पुरस्कार। अंतरराष्टïरीय सम्मान। मानद डॉक्टरेट उपाधि।   नागरिक सम्मान। एशियन फिल्म पुरस्कार। फ्रांस सरकार का  सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेजन  ऑफ आनर।  लगातार प्रसिद्घि ने बीबीसी ऑनलाइन यूजर्स पोल’ की वोटिंग के जरिए इन्हें मिलेनियम ग्रेटेस्ट स्टार ऑव स्टेज और स्क्रीन से सम्मानित किया गया। कई हॉलीवुड नायकों को पछाडक़र । बीते सालों में  पा में ऑरो की अनूठी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ नायकका राष्टïरीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया है। सच! अमिताभ बच्चन मिलेनियम के नायक हैं। किसी परिचय के मोहताज नहीं। किसी नाम के गुलाम नहीं। कला को जीते हुये, अभिनय को जिंदा बनाये हुये। विविध आयामों वाली भूमिकाएं निभाते हुए एक संपूर्ण कलाकार! महानायक! पुरस्कार-सम्मान, प्रसिद्घि, लोकप्रियता... और नायकत्व अमिताभ के लिए अब लघु है। वे सिनेमा के इतिहास में स्थायी नायक बन चुके हैं। जीवेद् शरद: शतम्... अमिताभ।              

Friday, September 28, 2012

लता मंगेशकर : भारत की आवाज


                             

कहते हैं संगीत ईश्वर है। सच ही, संगीत प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है। अखिल ब्रह़मांड एक प्रकार का संगीत है। नन्हे से घुंघरु की खनक से लेकर नदियों के कलरव और सघन वनों की शांति को भंग करती पत्तियों की चरमराहट में है संगीत। संगीत चिडिय़ों की चहचहाहट संग भोर के प्रकाश में घुल जाता है। रात गए झींगुरों की आवाज संग नाच उठता है। कोयल की कूक बन आम्रमंजरियों-सा महक उठता है। संगीत मेघ मल्हार बन बादलों से बरस उठता है और रौशनी बन चिरागों रौशन हो उठता है। यही संगीत जब सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज बन जाता है तो हमारी आत्मा को छू लेता है। हमारा मन-प्राण झंकृत हो उठता है।  प्रियतमा की बाहों में झूम गा उठता है ‘तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया...’ सिली-सिली बिरहा की आग में जल उठता है। ‘प्यार किया तो डरना क्या’ गा कर  बगावत कर देता है। ‘लग जा गले’ कह आंखों से आंसू बन झरता है... तो कमर्शियल फिल्मों की तेज धूनों संग यह गाता है ‘दिल तो पागल है...’।

सुप्रसिद्घ संगीतकार नौशाद के शब्दों में- ‘‘अभी तक हम इस बात का अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि लता मंगेशकर के रूप में हमें ऊपर वालों ने क्या दिया ! यह खुशकिस्मती है कि हम उस दौर में हैं जिसमें लता जी ने जन्म लिया। उन्होंने गायकी की शुरुआत उस दौर में की, जब नूरजहां, शमशाद बेगम, अमीरबाई और जौहराबाई अम्बालेवाली जैसे जानदार बड़े नाम मौजूद थे। बावजूद इसके लता जी ने अपनी न सिर्फ एक अलग पहचान बनाई बल्कि श्रेष्ठ और शीर्ष स्थान हासिल भी किया। ’’

भारतीय सिनेमा में लता मंगेशकर का नाम 'सिंगिंग' से गूंथा-सा लगता है। इनके गाने हजारों-करोड़ों लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये हैं और दुनिया भर में गुनगुनाये जाते हैं । इन्होंने अलग-अलग भाषाओं में छह दशकों से भी अधिक समय तक गाने गाये और भारतीय संगीत को नई ऊचाईयां दी। गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड  ने माना है कि लता दुनिया भर में सर्वाधिक रिकार्ड की गई गायिका हैं । उन्होंने  20 से अधिक भाषाओं में  30 हजार से अधिक गाने गाये हैं।


लता मंगेशकर का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में 28 सितम्बर, 1929 को हुआ ।  ये पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं जिनके नाम हैं आशा भोंसले, मीना खादीकर, ऊषा मंगेशकर और ह्रदयनाथ मंगेशकर। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर जाने-माने गायक और स्टेज ऐक्टर थे। लता जी के पहले गुरु भी वही थे। १३ वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई। परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने इस छोटी-सी उम्र में ही मराठी और हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया। 


जब स्वतंत्रता आन्दोलन के समय भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था तब 1942 में उनके पिता दुनिया से विदा हो गए, लता के कंधों पर पूरे परिवार का ख़र्च चलाने की ज़िम्मेदारी आ गई  बाल कलाकार के रूप में उनकी पहली फिल्म थी ‘पाहिली मंग्लागौर’। इसी फिल्म में इन्होंने अपना पहला गाना ‘नाटी चैत्रीची नावालाई... गाया। पहला हिंदी गाना ‘पा लागू कर जोरी... 1947 में बनी फिल्म ‘आपकी सेवा में’ के लिए गाया। उस समय जबकि शमशाद बेगम और नूरजहाँ का फिल्मी दुनिया में राज छाया था। लता मंगेशकर ने धीरे-धीरे अपनी पहचान ‘मजबूर’ और ‘महल’ जैसी फिल्मों से बनाई। भारत-चीन युद्घ के बाद 1962 में कवि प्रदीप (असल नाम रामचंद्र द्विवेदी ) का लिखा गाना ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ गाया तो माहौल इतना गमगीन हो उठा कि पंडित जी की आंखों से आंसू आ गये !

ईश्वर की विशेष रूप से तराशी गई जादुई आवाज के साथ लता मंगेशकर ने मधुबाला, मीना कुमारी से लेकर माधुरी दीक्षित तक कई हीरोइनों को अपनी आवाज दी। 70 की उम्र में भी उन्होंने अपनी आवाज की मधुरता से चाहने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया जब उन्होंने फिल्म 'दिल से' का ‘जिया जले जा जले...’ गाया जिसे मात्र 40 मिनट में पूरा किया गया था। उन्होंने लगभग सभी बड़े संगीत निर्देशकों के साथ काम किया है। नौशाद, सी रामचंद्र, एसडी बर्मन, मदन मोहन और शंकर जयकिशन के साथ अपने सबसे अच्छे प्रदर्शन दिए। ‘अभिमान’, ‘दस्तक’ और ‘आम्रपाली’ यादगार फिल्मों में हैं। 1990 के दशक में ‘रूदाली’, ‘हम आपके है कौन’ और ‘लेकिन’ जैसी अनेक फिल्मों को आवाज दी (जिसे इन्होंने प्रोड्यूज भी किया)। इन्होंने कई मराठी फिल्मों को भी प्रोड्यूज किया। लता मंगेशकर को 1989 में सर्वोच्च भारतीय सिने पुरस्कार दादा साहब फाल्के और 2001 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वे हर संगीतकार की सपना हैं


लता जी अब जीवित किंवदंती बन चुकी हैं। जब तक हो सके, वे गाती रहें... आएगा आने वाला... । जीवेद शरदः शतम....

Tuesday, September 25, 2012

...आनंद और आनंद




                   
                                                           (26 सितम्बर 1923 -- 3 दिसम्बर 2011)



'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’ ....यह उनका फलसफा था . ईश्वर ने उन्हें लम्बी उम्र दी . जिंदगी को भरपूर जिया उन्होंने . विश्वास नहीं होता कि वे 'थे' हो गए हैं .  उल्लास से भरे , अनवरत सृजनरत देव आनंद .
देव आनंद सफलता-असफलता से परे सिनेमा सृजन में जिंदगी के नौवें दशक में भी सक्रिय थे .  वे सिनेमा से ‘सेवानिवृत्त’ न हुए थे . ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’... उन पर सही फबता था .  एक बातचीत में वह कहते हैं- ‘‘मैं फिल्में बनाता हूं क्योंकि मैं बनाना पसंद करता हूं।’’ एक अभिनेता, फिल्मकार, स्क्रीन लेखक, निर्देशक के रूप में देव आनंद ने अनेक चेहरों को ब्रेक दिया। गाइड, ज्वेल थीफ, प्रेम पुजारी, हरे रामा, हरे कृष्णा, देश-परदेश, स्वामी दादा सहित अनेक फिल्मों के कारण वह अन्तर्राष्ट्रीय सिनेमा संसार में भी प्रतिष्ठा रखते हैं। स्वतंत्र भारत का पहला दशक भारतीय सिनेमा के उत्कर्ष का दौर था। यह वो समय था जब फिल्म इंडस्ट्री पल-पल बदल रही थी। नये-नये प्रयोग हो रहे थे। अभिनय लेखन, निर्देशन, प्रयोजन सभी क्षेत्रों में नित नये आयाम खुल रहे थे। वह संजीदा समय था। राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे अभिनेताओं का समय था। देवआनंद इन्हीं कलाकारों की एक कड़ी रहे। पर थोड़े अधिक रोमांटिक, थोड़े अधिक जोशीले, थोड़े अधिक दिलफरेब, थोड़े अधिक शहरी!
जीवन की भूख , सृजन की चाह देव साहब की जिंदगी थी . वे सफलता -असफलता से परे रचनात्मक सक्रियता को जी रहे थे. 

                      

कहते हैं कि फिल्मी पर्दे पर देवानंद को काले कपड़ों में देख लड़कियां आहें भर उठती थीं। वे सिने प्रेमियों के दिलो-दिमाग पर छा जाते थे। चलने, हंसने, बोलने और अभिनय के अपने ही अलग अंदाज के साथ पर्दे पर रूमानियत और आकर्षण का समां सा बांध देते। नई-नई नायिकाओं के साथ जोडिय़ां बनाते और भी खूबसूरत हो जाते। चटख रंगों, सूट-बूट, सुंदर लिबासों, हंसीसेटों के बीच और भी रोमांटिक और जीवन से भरे दिखते थे। देवआनंद का जन्म पंजाब के गुरदासपुर में हुआ। इनके बचपन का नाम देवदत्त पिशोरीमल आनंद था। पंजाब युनिवर्सिटी से डिग्री लेने के बाद 1943 में फिल्मों में ऐक्टिंग के लिये बम्बई आये। अपने लक्ष्य में इन्हें सफलता हासिल हुई और 1945 में प्रभात फिल्म्स कंपनी की फिल्म ‘हम एक हैं’ से लीड हीरो के रूप में बे्रक मिला जो उनके कैरियर के 50 से भी अधिक वर्षों तक जारी रहा। बड़े भाई चेतन आनंद के साथ मिलकर 1949 में इन्होंने नवकेतन स्टूडियो खोला।
उनकी पहली सबसे बड़ी हिट फिल्म ‘जिद्दी’ रही। ‘बाजी’, ‘सी.आई.डी.,’ ‘काला बाजार,’ ‘हम दोनों’ की सफलता के साथ ही आनंद बॉक्स ऑफिस पर छा गये। 1970 में देव आनंद ने फिल्मों के डायरेक्शन की ओर रूख किया और फिर तब से अपनी ही निर्देशित फिल्मों में अभिनय भी करते रहे। ड्रग कल्चर पर आधारित उनकी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। अपनी फिल्मों से कई नये चेहरों को इंट्रोड्यूज किया जिनमें जीनत अमान, टीना मुनिम, नताशा, एकता और सुनील आनंद जैसे नाम शामिल हैं। निर्देशक होने के साथ-साथ ही देवआनंद एक अच्छे प्रोड्यूसर भी रहे। नवकेतन के बैनर तले इन्होंने ४0 से भी अधिक फिल्मों का निर्माण किया। फिल्म बनाने के क्षेत्र में भी आनंद सफल रहे और फिल्म इण्डस्ट्री को एक अभिनेता निर्देशक और प्रोड्यूसर के रूप में कई सफल फिल्में दी। करियर के अपने लंबे सफर में इन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे और असफलताओं को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ते रहे और हमेशा सक्रिय रहे। उनकी हर फिल्म उनके लिये जैसे एक चैलेंज थी।
‘काला पानी’ और ‘गाइड’ के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिले। वहीं भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें 2001 में पद्म भूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया। पुराने जमाने के नये अभिनेता रहे वह। रोजमर्रा की घटनाओं से कहानियां बुनते लेखक रहे वह, एक सफल निर्देशक, प्रायोजक रहे वह।  देवानंद की किताब रोमांसिंग विद लाइफ के अनुसार ‘मुझे जीनत पर फख्र था, लेकिन राजकपूर से जब वो लिपटती तो... मुझे जलन होती। मुझे लगता कि वह सिर्फ मेरी अमानत है, मेरी खोज है, मेरी नायिका है। उसे एक बार चूमने की चाहत थी मेरे दिल में...’। ‘‘सुराईया ने होंठ मेरी ओर बढ़ाए, मैने पूछा, ‘‘शादी करोगी?’’ उसने फिर मुझे सीने से लगाया और हुंकारी भरते हुए बोली, ‘‘आई लव यू! आई लव यू...’’ ऐसे है हमारे ऐवर ग्रीन हीरो देवानंद... एक समय था जिन पर उनके चाहने वाले मरते थे कहां जाता है कि काली पेंट और सफेद शर्ट पहनकर चलने पर रोक लगा दी गयी थी क्योंकि लड़कियां उन्हे देखकर ऊपर से कूद ना जाएं। 
देव साहब के ६५ साला फ़िल्मी सफ़र के जो किये -धरे कार्य हैं वह हमारे लिए सुरक्षित है . वह जिन्दा रहेंगे अपनी कृत्तियो में . सिनेमा का इतिहास के वे स्वर्णिम अध्याय बनकर प्रेरित करते रहेंगे सिने पीढियों को . कब मिलेगा फिल्म इण्डस्ट्री को एक कलाकार ऐसा दुबारा ?

Monday, September 17, 2012

शबाना आजमी: सृजन एवं सरोकार

                         


      


शबाना आजमी (18 सितम्बर , 1950)  भारतीय सिनेमा की एक अनूठी उपलब्धि हैं। सिनेमा-सृजन और सरोकारों को समर्पित शबाना के लिए सिनेमा सिर्फ कॅरियर या मनोरंजन नहीं है बल्कि एक बड़ा सरोकार भी है। शबाना आजमी का बचपन मशहूर शायर कैफी आजमी और मां शौकत आजमी के सान्निध्य में पला-बढ़ा। सरोकारों से संस्कारित हुआ ।    एक तरह से कलात्मक विरासत और सांस्कृतिक पर्यावरण में उनका पालन पोषण हुआ। सृजन और विचार  द्वारा हस्तक्षेप शबाना का एक लक्ष्य रहा है। एक कुशल वक्ता, समाज सेवी और गंभीर अभिनेत्री के रूप में उन्होंने हिन्दी सिनेमा को एक गरिमा दी है। तभी तो उनकी विशिष्टता को पूरे सिनेमा संसार में एक सम्मानित जगह हासिल है। 
समानांतर सिनेमा हो या फिर कमर्शियल फिल्में उन्होंने हमेशा अपने को साबित किया। उनकी गंभीरता ही उनकी ग्लैमर साबित हुई। 'अर्थ', 'निशांत', 'अंकुर', 'स्पर्श', 'मासूम', 'फायर' जैसी फिल्मों के अलावा 'अमर अकबर एंथोनी', 'परवरिश', 'मैं आजाद हूं'... आदि में भी उनकी अभिनय प्रतिभा प्रबुद्घ और आम दर्शकों में पसंद की गई।  प्रयोगात्मक सिनेमा को एक स्थापित जगह दिलाने में उनके योगदान उल्लेखनीय हैं। विवादास्पद और बहुचर्चित फिल्म 'फायर' में उनके अभिनय को लेकर काफी चर्चा-कुचर्चा हुई  लेकिन जिस तरह उन्होंने बेधडक़ होकर अभिनय किया वह उनकी प्रतिभा का जीवंत प्रमाण ही तो है! 'मकड़ी' में (बाल-फिल्म ) चुड़ैल की भूमिका को देखकर यह लगा कि शबाना के लिए अभिनय का मतलब भीड़ से जुदा है। 'गॉडमदर' में महिला डॉन की भूमिका ने उनकी प्रतिभा को विस्तार दिया। लगभग चार दशक की अपनी अभिनय यात्रा में उन्होंने यह साबित किया है कि एक कलाकार समाज में विविध प्रकार से अपनी भूमिका निभाते हुए बदलाव और जरूरी हस्तक्षेप का वाहक बन सकता है।

      

याद है ‘वाटर’ फिल्म की बनारस में शूटिंग के दौरान शबाना आजमी को सिर मुंडवाकर उस किरदार की तैयारी में गंभीरता से डूबे होने का। उस बवाल के दौरान मैं बनारस ही था । अस्सी घाट के एक होटल में शबाना और नंदिता दास रुकी हुई थीं ।  बनारस में इसकी शूटिंग और पटकथा को लेकर हुए बवाल के कारण फिल्म की शूटिंग का प्रभावित होना एक अप्रिय प्रसंग रहा।
शबाना आजमी फिल्म, टेलीविजन और थिएटर के क्षेत्र की कुशल अभिनेत्री और सक्रिय सृजनधर्मी हैं। पूणें स्थित फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षित शबाना ने 1974 में ‘अंकुर ’ से अभिनय जगत में कदम रखा और शीघ्र ही वे समानांतर सिनेमा के क्षेत्र में चर्चित कलाकार के रूप में शुमार हो गईं। सिनेमा के सामाजिक सरोकार के नव यथार्थवादी आंदोलन में बतौर कलाकार शबाना ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सिनेमा संसार में और एक सामाजिक कार्यकर्ता उनके योगदानों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। उन्हें अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार-सम्मान मिले। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार क्रमश: अंकुर (1975), अर्थ (1983), खंडहर (1984), पार (1985), गॉडमदर (1999) के लिए मिले। वही स्वामी (1978), भावना (१९८५) के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिले। लिबास (1993), पतंग (1994), फायर (1996) आदि में उनके सशक्त अभिनय के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। शबाना आजमी को भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य होने का भी गौरव प्राप्त है। सौ से अधिक मुख्यधारा और कलात्मक फिल्मों में जो उन्होंने रचा है वह अपने आप में बेमिसाल है। मशहूर कवि-गीतकार और सिने लेखक जावेद अख्तर की संगिनी शबाना आजमी की सम्पूर्ण कलात्मकता 60 पार भी उसी लय के साथ जारी है। एक कलाकार की तरह जीते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से उनकी सरोकारी सक्रियता बनी हुई है ....जारी रहे अनवरत!

Tuesday, August 28, 2012

' ये वो गलिया थीं , जिनसे मैं गुजर गया हूँ ...'


                         

 राजेन्द्र यादव के लेखन व विचारों में जो स्पष्टता, साफगोई और वैचारिक 'आकाश' --'दर्शन' दिखता है वह काफी कुछ उनके जीवन-दर्शन और सृजन का ही प्रतिबिंब है। लेकिन यह भी सच है कि झोल-झाल बर्दाश्त न करने की आदत और खतरनाक किस्म की साफगोई
के बावजूद उनके यहां भी अपार झोल-झाल और ‘डिफेंस मैकेनिज्म’ (सुरक्षा कवच) मौजूद रहता है। सुविधा से चलने में वे माहिर हैं . ईमानदार तो हैं ही।
उनके बहस - विमर्श में एक ऐसी मौलिकता रहती है जो असहमति और ‘अति’ की  पुर जोर गुंजाइश  के बावजूद आकर्षित,  मंत्रमुग्ध  और भौंचक करती है। तभी खिसियाहट में भी
प्यार आता है , श्रद्धा जगती है उन पर । उनके प्रति एक सा सम्मान जगता है दोस्त-दुश्मनों में ।
राजनीति में यदि राजेन्द्र जी की तुलना किसी अब के नेता से की जाए तो शरद यादव से वे काफी मिलते-जुलते हैं! यहां शरद यादव से तुलना का आधार उनके नाम में लगे अनिवार्य किस्म के ‘उपनाम’ से नहीं है। (अगर यादव मिलान ही करना होता तो मुलायम सिंह और लालू जी कहीं ज्यादा प्रासंगिक थे !) दरअसल, यहां तुलना का कारण शरद जी की दुद्धर्ष ईमानदारी और स्वच्छ छवि तथा वैचारिकता है। जो राजेन्द्र जी की कहीं ज्यादा गहन  है,  लेकिन सामाजिक न्याय और अगड़ा-पिछड़ा की समाज मनोवैज्ञानिक “मंडलीय” सोच दोनों लोगों की एक जैसी है और वह काफी ईमानदार भी है ! प्रायः  दोनों लोग अपने क्रांतिकारी चिंतन और अभिव्यक्ति में ईमानदारी के बावजूद राजनीतिक- रणनीतिक  हैं । और किसी भी गंभीर बहस को मटियामेट करने में माहिर !  यह ध्यान रहे राजेन्द्र जी और शरद जी के दुश्मन भी यह नहीं कह सकते कि ये लोग निजी रूप से जातिवादी हैं!  जनवादी जरूर हैं ! सामाजिक न्याय के लिए तड़प है । समाज के कमजोर-वंचित , श्रमजीवी
वर्ग के लिए आग्रह है ।
  राजेंद्रजी को बिहार में लालू जी के मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार का सबसे बड़ा साहित्यिक पुरस्कार दिया जा रहा था तो तमाम लेखकों की अपील (न लेने के ) के बावजूद उन्होंने ‘हंस’ के लिए पुरस्कार ग्रहण किया और पुरस्कार समारोह में जब भरी सभा में कहा कि ''मुझे यह इसलिए दिया जा रहा है कि मैं यादव हूं'' तो तमाम लोगों  सहित  लालू जी, राजेंद्रजी की बेबाकी और सत्साहस-दुस्साहस को सुनकर फक पड़ गए थे। यादव न होते तो भी राजेंद्र जी  पुरस्कार पाने के हकदार थे । लेकिन इसमें भी उन्होंने जरूरी 'विमर्श' खोज लिया ।
राजेन्द्र यादव तो मार्क्सवादी  हैं, लेकिन शरद यादव मार्क्सवादी  न होते हुए भी जनवाद और सामाजिक न्याय को बखूबी उठाते रहते हैं। राजेन्द्र यादव जी हिन्दी पट्टी में ९० के बाद जो तेज सामाजिक- राजनीतिक बदलाव हुए उसे महसूस करते हुए हंस की रचनाओं में  दर्ज किया-कराया। साहित्य की शुद्धता-पवित्रता  और आदर्शी सीख के संदेशों से आगे साहित्य का विस्तार किया और सबको  सोचने पर मजबूर किया। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श को लाख उलाहना, आलोचना,बदनामी  के बावजूद केन्द्रीय जगह देने में उनके योगदानों को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। हालांकि, उन्होंने भी दलित साहित्य सिर्फ दलित लिख सकता है, के चिंतन को भी तमाम तर्को-कुतर्को से परिष्कृत किया और मजबूत संरक्षण दिया ।
भटकाओं और अतियों को पुचकारते रहे । दलित ही दलित को समझ-बुझ सकता है के मारफत नव ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दिया ! किसी के जातीय टाइटिल यानि पाण्डेय, यादव, सिंह, बाल्मिकी को सामने रखकर उनके साहित्य का मुल्यांकन करने की चिंतन- धारा भी उन्होंने खूब बहायी।  उन्होंने  अपने को संशोधित भी किया । कही -कही बदला भी !   गाहे -बगाहे  उन्होंने भाव मुद्रा बदली है ।  गाँधी और अज्ञेय के मामले भी !
डॉ धर्मवीर के 'सामंत का मुंशी' की दलित धारणा को वे  कहा पचा पाए ! अति को जीने वाले यादव जी अति को कहा पचा पाए !  लेकिन धर्मवीर उनके पुर्वग्रहोँ के अनुरूप किसी अन्य के लिए उल-जुलूल लिखते तो यादव जी लोकतंत्र ,  वे देवता नहीं हैं , अभिव्यक्ति के नाम पर अभयदान देते  ।    सब कुछ के बावजूद उनकी बेबाकी और दुस्साहस तथा खतरनाक किस्म की रचनात्मक जिद को उनके पाठक-प्रशंसक ही नहीं,  अशोक वाजपेयी जैसे कलावादी दुश्मन और नामवर जी जैसे आचार्य दुश्मन-दोस्त भी आदर के साथ सराहते हैं।
खैर,  राजेन्द्र यादव की संपादकीय पढ़कर  ही इन पंक्तियों के लेखक ने उनके लेखन से उपजी मंत्र-मुग्धता के साथ असहमति और अतिवादिता के बावजूद आधुनिक और ‘अच्छे साहित्य’ की स्थापित अवधारणा से अलग लिखना सीखा। हर महीने कथा-कहानियों से कहीं ज्यादा इंतजार उन ‘फालतू’ विमर्शों का रहता जो राजेन्द्र जी उठाते रहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे क्रमिक विकास क्रम में यह भी महसूस हुआ कि वे अपने ही सवालों और संदर्भों को बीजेपी, आरएसएस, हिन्दुत्व, ब्राह्मणवादी संस्कृति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आदि को मौलिकता से बांचने के क्रम में उलट-पुलट करते रहते हैं। एक तरफ वे कहते हैं कि ‘ईश्वर आदमी का अविष्कार है’ वहीं दूसरी तरफ ईश्वर को बांचते समय वे  वर्ण व्यवस्था सहित तमाम बातों के लिए ईश्वर को (मानो) प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की तरह प्रामाणिक और जिम्मेदार जन प्रतिनिधि  मानकर कटघरे में खड़े करते हैं। हनुमान और राम को जब वे बांच रहे होते हैं तो उसमें से जो निकल कर आता है उसको तो पूछिए मत !  ऐसे-ऐसे सवालों के सहित वे राम, सीता आदि को सुलझाते-उलझाते हुए कैरेक्टर पाठ करने लगते हैं मानों राम, सीता के बारे में जो कुछ लिखा-पढ़ा गया है उनमें पुराण नहीं इतिहास नजर आ रहा हो । एक प्रामाणिक इतिहास का मानो पाठ कर रहे हों । अगले ही क्षण वाले लेखन में विदेशियों को कोस भी रहे होते हैं कि भारतीयों में इतिहास दृष्टि का घनघोर अभाव रहा है । मतलब जब गरियाना हो तो कथाएं हु-ब-हू प्रामाणिक; कोसना हो तो एक दम काल्पनिक भड़ैती ।  अब जैसे यदि वे कविता को श्रमहीन विधा ठहराते हुए ब्राह्मण और कथा-उपन्यास को श्रमजीवी विधा बताते हुए दलित -पिछड़ा घोषित करते हैं तो लगता है कि वे विमर्श को मौलिकता के चक्कर में सतह से नीचे ले जा रहे हैं।
यहां याद नहीं लेकिन अपनी एक संपादकीय ने उन्होंने जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त और अन्य अनेक रचनाकारों को जातीय आधार पर रखते हुए यह साबित किया कि आधुनिक और बीते इतिहास में सबसे ज्यादा गैर ब्राह्मण साहित्यकारों ने महान रचा है। वही शायद उन्हें याद नहीं रहता कि जब वे भारतीय संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ऐसी-तैसी कर रहे होते हैं तो मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद उन्हें  हाफ पैन्ट धारी विचार धारा वाले लगने लगते हैं। क्योकि इनका दर्शन ब्रह्मण है ! कहने का मतलब कि मण्डल और कमण्डल को राजेन्द्र जी जब गहन चिंतन का विषय बेनाते हैं तो काफी नकार और साकार दिखने लगता है और उसका कोई अर्थ नहीं निकालता। सवाल उठाने चाहे वह सही हो या गलत और अपने समय संदर्भ के द्वंद को दिखाने और दर्ज कराने में उनके योगदानों को कोई भी नाकार नहीं सकता। काश ! मैं राष्ट्र द्रोही होता ! जैसे टी आर पी बटोरने वाले सवाल का तो पूछिये ही नहीं !

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                          --राजेन्द्र यादव उवाच
"प्रेमचन्द के व्यक्तिगत संस्मरण हैं कि वे व्यवहार में खुलकर मिलते थे,  ठठाकर हँसते थे और जो खुलकर हँसता है, वह निर्भीक होता है, जो निर्भीक होता है  ईश्वर  से नहीं डरता। उसे धर्म की जरूरत नहीं होती । भेद करने की मानसिकता जाति में मिलती है। ‘जाति’ को धर्म का समर्थन हासिल है। हिन्दू सेक्युलर नहीं हो सकता, राजनीति व रणनीति में भले हो जाए। जातिवाद के सबसे बडे़ शिकार दलित और स्त्री हैं। स्त्री और दलित की मुक्ति के बिना जातिवाद नहीं मिट सकता। और जातिवाद मिटे बिना साम्प्रदायिकता खत्म नहीं हो सकती। प्रेमचन्द ने उन सारी समस्याओं को पकड़ा है जो हमारे समाज और देश को बाँटता है वह वर्ण व्यवस्था है।  प्रेमचन्द बड़ी बाधा हैं। कोई भी रचनाकार जब हम उसकी नकल करते हैं तो वे हमें खा जाते हैं और जब पार कर जाते हैं तो वे हमारी शक्ति बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द की पूजा क्या हमें निरंतर बौना बनाने की तो नहीं है, यह जाँचनी चाहिए। प्रेमचन्द प्रासंगिक हैं यह कहते हुए गर्व नहीं होता, वे आज भी प्रासंगिक हैं इसमें हमारे समाज की असफलता है।" - (31 जुलाई, 2005, बनारस , प्रेमचन्द की 125 वीं जयंती के अवसर पर 125 वीं जयंती राष्ट्रीय समारोह समिति’ की ओर से  ‘धर्मनिरपेक्ष भारत और प्रेमचन्द’ विषय संगोष्ठी )     
 ‘‘अतीत मुझे कभी नहीं सुहाता और सताता। जो लोग बीते कल   महानता और स्वर्णयुग की बात करते हैं वे सब झूठ बोलते हैं। आदमी इतिहास से नहीं बल्कि सिर्फ अपनी गलतियों-गुनाहों से सीखता है। मैं पीछे मुडक़र नहीं देखता।’’

   - ‘‘पता नहीं ‘नई कहानी’ को हमने बनाया या ‘नई कहानी’ ने हमें। हम लोगों ने सत्ता-विरोध से अपनी यात्राएं शुरू की थीं, मगर धीरे-धीरे स्वयं सत्तावान की प्रक्रिया में उसी के हिस्से बनते चले गए। छह बातें हम आज भी सात्र्र, कामू, ब्रेख्त, लोर्का और पाब्लो नेरूदा की करते हैं। ’’  
 
                 राजेंद्र जी के बारे में
''राजेन्द्र यादव जी हमारे समय के एक सशक्त, उत्तेजक, विवादप्रिय और विवादजनक उपस्थिति हैं । उनकी बेबाकी और दुस्साहस भी प्रसिद्घ है। उन्होंने उपन्यास लिखे, कहानियां लिखीं,लेकिन अब उन्हें हंस के लिए याद किया जाता है । स्त्री ,दलित विमर्श और अपनी जिदों के लिए याद किया जाता है ।'' -अशोक वाजपेयी, प्रसिद्घ कवि-आलोचक
''राजेन्द्र कला विरोधी रहें हैं लेकिन उनकी कहानियों की कलात्मकता में कोई शक नहीं है। इनका गद्य निश्चित ही कलात्मक है। राजेन्द्र के अवदान में केन्द्रीय जगह उनकी कहानियों और उपन्यासों की होगी। इनका अवदान कथा -साहित्य के क्षेत्र में होगा, तो  विवाद और सम्पादन के क्षेत्र में भी होगा।  ‘हंस’ ने बहुत साहसी कहानियां छापी हैं और बहुत सारी कूड़ा भी, पर हंस की खूबी यह है कि इसने वाद-विवाद का और बहस का जो मंच बनाया उसके लिए इन्हें हमेशा याद किया जाएगा।'' -कृष्ण बलदेव वैद, वरिष्ठ कथाकार और नाटककार    

           जब वे तुलसीदास के व्यक्तित्व और कृतित्व को बांच रहे होते हैं तो तुलसी संकीर्ण जातिवादी और वर्चस्ववादी मूल्यों वाले हो जाते हैं। दलित और पिछड़ा विरोधी हो जाते हैं। यहां राजेन्द्र जी ‘होना/सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ लिखकर सालभर कीर्ति का फल चखते हैं यानि उस पर ऐतिहासिक बहस चलता है। चलवाया जाता है ... और विरोध में लिखे जाने से वे करुणा और खीझ से भर जाते हैं कि लेख यानि रचना के व्यंग्य और सरोकार को पता नहीं हिन्दी वाले समझ क्यों नहीं पा रहे हैं!  मतलब तुलसीदास ने अपने समय के मूल्यों या बादमाशियोँ  को जब अपनी रचना में रखा तो वह तुलसीदास का निजी विचार बन गया लेकिन राजेन्द्र जी ने महिलाओं के प्रति पुरुष मानसिकता को जब व्यंग्य और प्रतिरोध के रूप में रखा तो उनकी मानसिकता को लेकर जब प्रायोजित-अप्रायोजित हो-हल्ला हुआ तो वे खीझने लगे कि पुरुषवादी मानसिकता को हमारा विचार क्यों माना जा रहा है?  राजेन्द्र जी जिन सुविधाओं का वैचारिक सृजन में उपयोग-उपभोग करते हैं उसका दूसरों को लाभ नहीं लेने देते।
राजेन्द्र यादव की हिन्दी विमर्श को सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने पारंपरिक दिमाग के अभिजात्य को बदला। 'हंस' और अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय सामाजिक मनोविज्ञान को बदलने या बदलाव की ओर अग्रसर होने में योगदान किया।  'हंस' में असहमति की आवाज भी बर्दाश्त करने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया उन्होंने ही की। अपना मोर्चा, बीच बहस सहित लेखों और रचनाओं में उन वैचारिक असहमतियों को भी जगह दी गई जो राजेन्द्र जी की चिंता और चिंतन से उलट है। सवाल उठाने चाहे वह सही हो या गलत और अपने समय संदर्भ के द्वंद को दिखाने और दर्ज कराने में उनके योगदानों को कोई भी नाकार नहीं सकता। वो इसी तरह बिंदास बने रहें . जिंदगी को और भी बेहतर बना सकने का उनका रचनात्मक एवं वौधिक उद्यम हमेशा जारी रहे .  उनकी उपस्थिति जरूरी और जिंदादिल उपस्थिति है .  वे एक ऐसे स्तम्भ हैं जिनसे आस्वस्ति मिलती है .
 83 पार राजेंद्रजी को उनके किए-धरे और जिंदादिली के लिए अपार शुभकामनाएं ।