Wednesday, June 6, 2012

इंदिरा गोस्वामी : लेखकीय गरिमा की प्रतिनिधि हस्ताक्षर



                                                        इंदिरा गोस्वामी बनारस में ...




                                             
                                             बनारस में  लेखकों-पत्रकारों के साथ इंदिरा
                                                                                                                 छाया : एस. के. पाठक

..इंदिरा गोस्वामी  (१९४२- २०११) अब  नहीं हैं । राजेंद्र जी के शब्दों में कहें तो ‘चीखती अनुपस्थितियां ।’ यह अप्रत्याशित खबर है। ..जाना निश्चित है । इसका कोई सूत्र भी नहीं कि कोई किस उम्र में चला जाए ।  नहीं तो पिता के कंधे पर बेटे की अर्थी क्यों उठती ! ८०-९० के बाबा-दादा पोते -पोतियों की मौत को सीने पर पत्थर रखकर कैसे झोलते !
पर ऐसी भी क्या जल्दी थी !  ७० पार भी नहीं । इंदिरा गोस्वामी का जाना खल गया है । अब चाहे एक हजार साल भी कोई क्यों न जीकर चला जाए उसका जाना बेधता तो है ही  ! हमारे  चित्त को उदास करने वाला है यह ताबड़तोड़ जागमन !  तकलीफदेह है  इस तरह औचक चले जाना ।  69 वर्षीया इंदिरा गोस्वामी एक शिक्षक, शांति कार्यकर्ता, लेखिका के रूप में समाज-संस्कृति-देश को बहुत कुछ देकर गई हैं। वह सिर्फ असमिया साहित्य की ही नहीं बल्कि भारतीय साहित्य, हिंदी साहित्य की भी  निधि थीं। ‘दिल हूम -हूम करे’ वाले विशिष्ट संगीत साधक डॉ. भूपेन हजारिका की तरह अपनी माटी की गंध से सिंचित होकर भारतीयता से सिक्त थीं। गंगा से ब्रह्मïपुत्र तक वह भारतीयता फैली थी । ‘रामायण फ्रॉम गंगा टू ब्रह्मपुत्र’ में वह चिंतन सार यूं ही मौजूद नहीं है  !  रामचरितमानस और १४ वीं सदी के माधव कांदली रामायण के तुलनात्मक अध्ययन के रूप एक महत्वपूर्ण पुस्तक है रामायण फ्रॉम गंगा टू ब्रह्मपुत्र । एक अध्येता के रूप में भी समता-समन्वय से भरे स्वप्न समाज को रच रही थीं । परंपरा पर सवाल और सवालों की बौद्धिक परंपरा को लेकर चल रही थीं । एक पारम्परिक परिवार में पली-बढ़ीं इंदिरा को यूं तो खुले विचारों वाले माता-पिता की मजबूत छांह मिली। लेकिन उनके लिए कभी परम्परा का मतलब जड़ हो जाना नहीं रहा। खोखले आचरण, पाखंड और विद्रूपताओं पर बिना ‘खास’ मीडियाजीवी होहल्ले के जैसा वह रचनात्मक प्रहार करती हैं वह परम्परा की समझ से ही सम्भव हो पाया। उनके लेखन में जो सवाल और सरोकार हैं वह परिवर्तक हैं। सडऩ के खिलाफ प्रतिरोध की एक समझदार आवाज थीं इंदिरा। विसंगतियों-विडम्बनाओं की खोजबीन और उसके समाधान की और भी उनका स्वर बुलंद है।
तमाम सर्जकों की तरह समाज को, जीवन को सुंदर बनाना उनकी चाह थी । वह लेखकीय गरिमा की भी एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर थीं। अलगाववादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन  फ्रंट ऑफ असम यानी उल्फा और केंद्र सरकार के बीच शांति वार्ताकार के रूप में भी उन्होंने महती भूमिका निभायी। एक लेखक पर विद्रोही संगठन से जुड़े भटके हुए  ‘लडकों’ ने विश्वास किया। खून को खेल समझने वाली धारा ने अपना वार्ताकार बनाया एक लेखक को। एक सृजक का भरोसा । शब्द शिल्पी पर बंदूक संस्कृति, आतंकी संस्कृति का विश्वास यह बोध कराता है कि एक बुद्धिजीवी और लेखक का दायित्व कितना बड़ा है! सरोकार सिर्फ शब्द नहीं है या फिर हिन्दी समाज के बुद्घिजीवियों की तरह ‘चुनी हुई चुप्पियां’ नहीं हैं। शब्द संस्कार और सृजन के मूल्य क्या होते हैं ! लेखन कार्य कोई जनसंपर्क का कार्य नहीं है। पुरस्कार और प्रसिद्धि का कार्य नहीं है । न ही उठाने-गिराने, नष्ट करने का ‘पुनीत’ कार्य है! न ही जातिवाद और जनवाद के सुख को साथ-साथ भुगतने और जीने का बौधिक यंत्र है।  रचना कर्म  ईमानदारी (नासमझ और आकाशीय नहीं) और सत्साहस का ऐसा दायित्व है जो मनुष्यता को ऊपर उठाने का , जीवन को सुंदर बनाने का काम करता है।
 लेखक और बुद्धिजीवी को मुंह देखी बात नहीं करनी चाहिए।  उसे ईमानदार और सत्साहसी होकर सच बयां करना चाहिए। सच भी कोई अमूर्त किस्म का नहीं । मुक्तिबोध के शब्दों में ‘धरती के विकासी द्वंद क्रम में एक मेरा पक्ष नि:संदेह ’ । उनसे इन पंक्तियों के लेखक की भी भेंट-मुलाकात थी। बोलने-बतियाने का अवसर मिला था। २००४ के दिसंबर में वह बनारस आईं थीं । और बिना किसी हो-हप्पड़, खास औपचारिकता या सेलिब्रिटिज टाईप के ताम-झाम के प्रोफेसर बलराज पांडे के घर सरस्वती सदन में आम और खास लोगों के बीच छोटी सी गोष्ठी में  (१९ दिसंबर) मौजूद थीं। प्रोफेसर दीपक मलिक, चितरंजन सिंह, डा. अवधेश प्रधान, डा. चन्द्रकला त्रिपाठी, डा. प्रभात कुमार पाण्डे, डा. दीनबंधु तिवारी, शरद सिंह, वशिष्ठ मुनि ओझा...और कुछ बीएचयू के रचनाकार बनने के प्रक्रिया में शामिल लडक़े। कुल मिलाकर यह ‘सगोतिया ’ गोष्ठी थी। इस अर्थ में कि कभी भी यानी हमेशा चाय की दुकान या गंगा घाट या किसी के घर-दुआर या बीएचयू ..मतलब कहीं भी नाम मात्र की सूचना पर जुट जाती थी । अस्सी पर तो अगर एक साथ दो-चार लोग एक साथ नजर आ जाएं कि अस्सी के सडक़, चाय घर के अनेक कोनों से कुछ लहकट -लहगर आवाजें गूंजने लगती थीं कि अब कोन टपका कि आप लोग श्रद्धांजलि की तैयारी करने लगे हैं । खैर, यह तो हुई अलग बात।  यहां कहने का मतलब है कि बनारस में कुछ लोग हैं हर कोनों में जो लाख लांछनों के बावजूद कुछ करते -धरते रहते हैं । पुराने समय से है ऐसा । वर्तमान डॉ . काशीनाथ सिंह और ज्ञानेंद्रपति जैसे चर्चित नाम भी हैं जो कुछ कहने -सुनने के लिए एक बुलावे पर आ जाते हैं लेकिन थोड़ी सतर्कता और चयन के साथ । साहित्यिक-वैचारिक गतिविधियों को जिलाये रखने की छोटी सी कोशिश । ‘स्टार’ लेखक इंदिरा गोस्वामी को डाक्टर और पत्रकारगण ही नहीं सभी जानते थे। कि यह वहीं लेखिका हैं जिस पर उल्फा के खतरनाक लडक़े भरोसा करते थे। उनके साहित्य से परिचित थे। उनके सृजन सरोकारों को जानते थे। वह बता रहीं थीं कि किस तरह से अपने एक सांस्कृतिक-वैचारिक उत्सव में कुछ लडक़े आकर उन्हें घर से ससम्मान न जाने किन रास्तों से समारोह स्थल ले गये थे। अपनी आवाज से परिचित कराने। ‘‘दीदी चलो, चिंता की कोई बात नहीं।’’
हमने उनसे सवाल किये -संवाद स्थापित किये। हमारा भी एक राष्ट्रवादी गुस्सा था कि अगर उल्फा या कोई भी अलगाववादी संगठन खूंटा पकड़ ले कि चाहे कोई विकास या पैकेज दे दो हमें हमारा राष्ट्र चाहिए तो क्या किया जाना चाहिए! कोई अपना विचार दर्शन ही बना ले कि हमें बस यही करना है । तो क्या करना चाहिए ? नक्सली, कश्मीर सहित अनेक पक्ष मेरे जेहन में था । इंदिरा ने सधा हुआ शांत जवाब दिया था। समाधान है। हमें सोचना चाहिए कि आसाम के प्रतिभाशाली लडक़े क्यों उग्रवाद का रास्ता अपना रहे हैं। समस्या का समाधान बंदूक नहीं हो सकती, बातचीत-संवाद , भरोसा ही असल चीज है। पर पता नहीं क्रांतिवीर चितरंजन सिंह हमारे सवाल को लेकर क्यों खुन्सा गये थे!
खैर इंदिरा गोस्वामी का कहना था कि देश की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का हल खोजने के लिए लेखकों को आगे बढक़र अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। बचपन से ही उनके मन में सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से गरीब व पिछड़े लोगों के प्रति लगाव था। एक प्रतिष्ठित पारंपरिक जमींदार परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने किसी प्रकार के छुआछूत, अलगाव, उंच -नीच के भेद -विभेद को स्वीकार नहीं किया। जबकि इसके लिए परिवार का विरोध भी उन्हें सहना पड़ा। उनके लेखन में सामाजिक कुरीतियों पर बहुत ही सहजता के साथ अचूक प्रहार किया गया है। एक ईमानदार, सचेत लेखक के रूप में उन्होंने स्वयं से, जिंदगी से मुठभेड़ किया। व्यक्तिगत जिंदगी के दु:ख को उन्होंने सृजन सरोकार से पाटा। शादी के कुछ ही महीने बाद जीवन साथी के बिछुड़ जाने के गम को रचनात्मक सरोकारों से भरा इंदिरा ने । गोष्ठी में उन्होंने शादी के महज डेढ़ साल बाद इंजीनियर पति माधवन राईसोम आयंगर के सडक़ दुर्घटना में विछुड़ जाने के गम को भी शेयर किया ।  ‘रामायण से हमें संबल मिला । जीवन को जीने का जज्बा मिला । ’ उनका कहना था । उनकी प्रमुख प्रकाशित रचनाएं हैं- फ्रॉम गंगा टू ब्रह्मïपुत्र’, चिनाकी मोरोम , नीलकंठ ब्रज , अधलिखा दस्तावेज (उनकी अधूरी आत्मकथा), छिन्नमस्ता , लाल नदी , जंग लगी तलवार, बुद्धासागर, मोहम्मद मुच्छा , चिनावर सरोता , उदयभानुर चरितो , शैडो ऑफ द डार्क गॉड  आदि। अपनी रचना ‘दोतल हातिएर ओईये खोवा हाउदा ’ से उनका विशेष लगाव रहा । उन्हें ज्ञानपीठ , साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान -पुरस्कार मिले ।  १९८३ में उनके उपन्यास ‘मामारे धारा तारवल’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला । सन २००० में सवोंच्च भारतीय साहित्य सम्मान ज्ञानपीठ  मिला । डच सरकार का ‘प्रिंसिपल प्रिंस क्लाउट लाउरेट ’ पुरस्कार भी उन्हें मिला । लेकिन सबसे बड़ा सम्मान उन्हें जनता के स्नेह-सम्मान के रूप में मिला। असमिया जनता किस तरह से रचनाकारों को मान देती है यह सभी जानते हैं ! लेकिन हिंदी एवं सभी भारतीय भाषा के पाठकों ने उनके रचे को पसंद किया । उनके लेखन का दायरा विश्व विस्तृत रहा । उनकी कहानियां, कविताएं , उपन्यास और वैचारिक आलेख काफी चर्चित एवं महत्वपूर्ण हैं। बा्ह्मण विधवाओं की जिंदगी के हर पल के कठिन संघर्ष और विडंबनाओं को उन्होंने जिस प्रामाणिकता और संवेदनशीलता के साथ रचा है वह चुनौतीपूर्ण लेखन ही है । अपने वर्ग-समाज के संघर्ष गाथा का चित्रण समाज के सामने लाने की कोशिश अनन्य है । वह कहती थीं कि लेखन मेरे लिए रगों में बहते लहू की भांति है । वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर किये गए एक सवाल के जवाब में  उनका कहना था कि लेखक को राजनीति के बजाए मानवता का साथ देना चाहिए । उनकी विविध रचनाएं समाज-संस्कृति की अनमोल धरोहर हैं । जीवन को सुंदर और सार्थक बनाने का उपक्रम हैं ।  वे हमसे दूर चली गयी हैं लेकिन उनकी कृतियाँ हमें हमेशा उनके होने का अहसास कराती रहेंगी।

                                                                  --30-11-2011, मेरठ
           
                                    


              

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