राजेन्द्र यादव के लेखन व विचारों में जो स्पष्टता, साफगोई और वैचारिक 'आकाश' --'दर्शन' दिखता है वह काफी कुछ उनके जीवन-दर्शन और सृजन का ही प्रतिबिंब है। लेकिन यह भी सच है कि झोल-झाल बर्दाश्त न करने की आदत और खतरनाक किस्म की साफगोई
के बावजूद उनके यहां भी अपार झोल-झाल और ‘डिफेंस मैकेनिज्म’ (सुरक्षा कवच) मौजूद रहता है। सुविधा से चलने में वे माहिर हैं . ईमानदार तो हैं ही।
उनके बहस - विमर्श में एक ऐसी मौलिकता रहती है जो असहमति और ‘अति’ की पुर जोर गुंजाइश के बावजूद आकर्षित, मंत्रमुग्ध और भौंचक करती है। तभी खिसियाहट में भी
प्यार आता है , श्रद्धा जगती है उन पर । उनके प्रति एक सा सम्मान जगता है दोस्त-दुश्मनों में ।
राजनीति में यदि राजेन्द्र जी की तुलना किसी अब के नेता से की जाए तो शरद यादव से वे काफी मिलते-जुलते हैं! यहां शरद यादव से तुलना का आधार उनके नाम में लगे अनिवार्य किस्म के ‘उपनाम’ से नहीं है। (अगर यादव मिलान ही करना होता तो मुलायम सिंह और लालू जी कहीं ज्यादा प्रासंगिक थे !) दरअसल, यहां तुलना का कारण शरद जी की दुद्धर्ष ईमानदारी और स्वच्छ छवि तथा वैचारिकता है। जो राजेन्द्र जी की कहीं ज्यादा गहन है, लेकिन सामाजिक न्याय और अगड़ा-पिछड़ा की समाज मनोवैज्ञानिक “मंडलीय” सोच दोनों लोगों की एक जैसी है और वह काफी ईमानदार भी है ! प्रायः दोनों लोग अपने क्रांतिकारी चिंतन और अभिव्यक्ति में ईमानदारी के बावजूद राजनीतिक- रणनीतिक हैं । और किसी भी गंभीर बहस को मटियामेट करने में माहिर ! यह ध्यान रहे राजेन्द्र जी और शरद जी के दुश्मन भी यह नहीं कह सकते कि ये लोग निजी रूप से जातिवादी हैं! जनवादी जरूर हैं ! सामाजिक न्याय के लिए तड़प है । समाज के कमजोर-वंचित , श्रमजीवी
वर्ग के लिए आग्रह है ।
राजेंद्रजी को बिहार में लालू जी के मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार का सबसे बड़ा साहित्यिक पुरस्कार दिया जा रहा था तो तमाम लेखकों की अपील (न लेने के ) के बावजूद उन्होंने ‘हंस’ के लिए पुरस्कार ग्रहण किया और पुरस्कार समारोह में जब भरी सभा में कहा कि ''मुझे यह इसलिए दिया जा रहा है कि मैं यादव हूं'' तो तमाम लोगों सहित लालू जी, राजेंद्रजी की बेबाकी और सत्साहस-दुस्साहस को सुनकर फक पड़ गए थे। यादव न होते तो भी राजेंद्र जी पुरस्कार पाने के हकदार थे । लेकिन इसमें भी उन्होंने जरूरी 'विमर्श' खोज लिया ।
राजेन्द्र यादव तो मार्क्सवादी हैं, लेकिन शरद यादव मार्क्सवादी न होते हुए भी जनवाद और सामाजिक न्याय को बखूबी उठाते रहते हैं। राजेन्द्र यादव जी हिन्दी पट्टी में ९० के बाद जो तेज सामाजिक- राजनीतिक बदलाव हुए उसे महसूस करते हुए हंस की रचनाओं में दर्ज किया-कराया। साहित्य की शुद्धता-पवित्रता और आदर्शी सीख के संदेशों से आगे साहित्य का विस्तार किया और सबको सोचने पर मजबूर किया। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श को लाख उलाहना, आलोचना,बदनामी के बावजूद केन्द्रीय जगह देने में उनके योगदानों को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। हालांकि, उन्होंने भी दलित साहित्य सिर्फ दलित लिख सकता है, के चिंतन को भी तमाम तर्को-कुतर्को से परिष्कृत किया और मजबूत संरक्षण दिया ।
भटकाओं और अतियों को पुचकारते रहे । दलित ही दलित को समझ-बुझ सकता है के मारफत नव ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दिया ! किसी के जातीय टाइटिल यानि पाण्डेय, यादव, सिंह, बाल्मिकी को सामने रखकर उनके साहित्य का मुल्यांकन करने की चिंतन- धारा भी उन्होंने खूब बहायी। उन्होंने अपने को संशोधित भी किया । कही -कही बदला भी ! गाहे -बगाहे उन्होंने भाव मुद्रा बदली है । गाँधी और अज्ञेय के मामले भी !
डॉ धर्मवीर के 'सामंत का मुंशी' की दलित धारणा को वे कहा पचा पाए ! अति को जीने वाले यादव जी अति को कहा पचा पाए ! लेकिन धर्मवीर उनके पुर्वग्रहोँ के अनुरूप किसी अन्य के लिए उल-जुलूल लिखते तो यादव जी लोकतंत्र , वे देवता नहीं हैं , अभिव्यक्ति के नाम पर अभयदान देते । सब कुछ के बावजूद उनकी बेबाकी और दुस्साहस तथा खतरनाक किस्म की रचनात्मक जिद को उनके पाठक-प्रशंसक ही नहीं, अशोक वाजपेयी जैसे कलावादी दुश्मन और नामवर जी जैसे आचार्य दुश्मन-दोस्त भी आदर के साथ सराहते हैं।
खैर, राजेन्द्र यादव की संपादकीय पढ़कर ही इन पंक्तियों के लेखक ने उनके लेखन से उपजी मंत्र-मुग्धता के साथ असहमति और अतिवादिता के बावजूद आधुनिक और ‘अच्छे साहित्य’ की स्थापित अवधारणा से अलग लिखना सीखा। हर महीने कथा-कहानियों से कहीं ज्यादा इंतजार उन ‘फालतू’ विमर्शों का रहता जो राजेन्द्र जी उठाते रहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे क्रमिक विकास क्रम में यह भी महसूस हुआ कि वे अपने ही सवालों और संदर्भों को बीजेपी, आरएसएस, हिन्दुत्व, ब्राह्मणवादी संस्कृति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आदि को मौलिकता से बांचने के क्रम में उलट-पुलट करते रहते हैं। एक तरफ वे कहते हैं कि ‘ईश्वर आदमी का अविष्कार है’ वहीं दूसरी तरफ ईश्वर को बांचते समय वे वर्ण व्यवस्था सहित तमाम बातों के लिए ईश्वर को (मानो) प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की तरह प्रामाणिक और जिम्मेदार जन प्रतिनिधि मानकर कटघरे में खड़े करते हैं। हनुमान और राम को जब वे बांच रहे होते हैं तो उसमें से जो निकल कर आता है उसको तो पूछिए मत ! ऐसे-ऐसे सवालों के सहित वे राम, सीता आदि को सुलझाते-उलझाते हुए कैरेक्टर पाठ करने लगते हैं मानों राम, सीता के बारे में जो कुछ लिखा-पढ़ा गया है उनमें पुराण नहीं इतिहास नजर आ रहा हो । एक प्रामाणिक इतिहास का मानो पाठ कर रहे हों । अगले ही क्षण वाले लेखन में विदेशियों को कोस भी रहे होते हैं कि भारतीयों में इतिहास दृष्टि का घनघोर अभाव रहा है । मतलब जब गरियाना हो तो कथाएं हु-ब-हू प्रामाणिक; कोसना हो तो एक दम काल्पनिक भड़ैती । अब जैसे यदि वे कविता को श्रमहीन विधा ठहराते हुए ब्राह्मण और कथा-उपन्यास को श्रमजीवी विधा बताते हुए दलित -पिछड़ा घोषित करते हैं तो लगता है कि वे विमर्श को मौलिकता के चक्कर में सतह से नीचे ले जा रहे हैं।
यहां याद नहीं लेकिन अपनी एक संपादकीय ने उन्होंने जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त और अन्य अनेक रचनाकारों को जातीय आधार पर रखते हुए यह साबित किया कि आधुनिक और बीते इतिहास में सबसे ज्यादा गैर ब्राह्मण साहित्यकारों ने महान रचा है। वही शायद उन्हें याद नहीं रहता कि जब वे भारतीय संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ऐसी-तैसी कर रहे होते हैं तो मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद उन्हें हाफ पैन्ट धारी विचार धारा वाले लगने लगते हैं। क्योकि इनका दर्शन ब्रह्मण है ! कहने का मतलब कि मण्डल और कमण्डल को राजेन्द्र जी जब गहन चिंतन का विषय बेनाते हैं तो काफी नकार और साकार दिखने लगता है और उसका कोई अर्थ नहीं निकालता। सवाल उठाने चाहे वह सही हो या गलत और अपने समय संदर्भ के द्वंद को दिखाने और दर्ज कराने में उनके योगदानों को कोई भी नाकार नहीं सकता। काश ! मैं राष्ट्र द्रोही होता ! जैसे टी आर पी बटोरने वाले सवाल का तो पूछिये ही नहीं !
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--राजेन्द्र यादव उवाच
"प्रेमचन्द के व्यक्तिगत संस्मरण हैं कि वे व्यवहार में खुलकर मिलते थे, ठठाकर हँसते थे और जो खुलकर हँसता है, वह निर्भीक होता है, जो निर्भीक होता है ईश्वर से नहीं डरता। उसे धर्म की जरूरत नहीं होती । भेद करने की मानसिकता जाति में मिलती है। ‘जाति’ को धर्म का समर्थन हासिल है। हिन्दू सेक्युलर नहीं हो सकता, राजनीति व रणनीति में भले हो जाए। जातिवाद के सबसे बडे़ शिकार दलित और स्त्री हैं। स्त्री और दलित की मुक्ति के बिना जातिवाद नहीं मिट सकता। और जातिवाद मिटे बिना साम्प्रदायिकता खत्म नहीं हो सकती। प्रेमचन्द ने उन सारी समस्याओं को पकड़ा है जो हमारे समाज और देश को बाँटता है वह वर्ण व्यवस्था है। प्रेमचन्द बड़ी बाधा हैं। कोई भी रचनाकार जब हम उसकी नकल करते हैं तो वे हमें खा जाते हैं और जब पार कर जाते हैं तो वे हमारी शक्ति बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द की पूजा क्या हमें निरंतर बौना बनाने की तो नहीं है, यह जाँचनी चाहिए। प्रेमचन्द प्रासंगिक हैं यह कहते हुए गर्व नहीं होता, वे आज भी प्रासंगिक हैं इसमें हमारे समाज की असफलता है।" - (31 जुलाई, 2005, बनारस , प्रेमचन्द की 125 वीं जयंती के अवसर पर 125 वीं जयंती राष्ट्रीय समारोह समिति’ की ओर से ‘धर्मनिरपेक्ष भारत और प्रेमचन्द’ विषय संगोष्ठी )
‘‘अतीत मुझे कभी नहीं सुहाता और सताता। जो लोग बीते कल महानता और स्वर्णयुग की बात करते हैं वे सब झूठ बोलते हैं। आदमी इतिहास से नहीं बल्कि सिर्फ अपनी गलतियों-गुनाहों से सीखता है। मैं पीछे मुडक़र नहीं देखता।’’
- ‘‘पता नहीं ‘नई कहानी’ को हमने बनाया या ‘नई कहानी’ ने हमें। हम लोगों ने सत्ता-विरोध से अपनी यात्राएं शुरू की थीं, मगर धीरे-धीरे स्वयं सत्तावान की प्रक्रिया में उसी के हिस्से बनते चले गए। छह बातें हम आज भी सात्र्र, कामू, ब्रेख्त, लोर्का और पाब्लो नेरूदा की करते हैं। ’’
राजेंद्र जी के बारे में
''राजेन्द्र यादव जी हमारे समय के एक सशक्त, उत्तेजक, विवादप्रिय और विवादजनक उपस्थिति हैं । उनकी बेबाकी और दुस्साहस भी प्रसिद्घ है। उन्होंने उपन्यास लिखे, कहानियां लिखीं,लेकिन अब उन्हें हंस के लिए याद किया जाता है । स्त्री ,दलित विमर्श और अपनी जिदों के लिए याद किया जाता है ।'' -अशोक वाजपेयी, प्रसिद्घ कवि-आलोचक
''राजेन्द्र कला विरोधी रहें हैं लेकिन उनकी कहानियों की कलात्मकता में कोई शक नहीं है। इनका गद्य निश्चित ही कलात्मक है। राजेन्द्र के अवदान में केन्द्रीय जगह उनकी कहानियों और उपन्यासों की होगी। इनका अवदान कथा -साहित्य के क्षेत्र में होगा, तो विवाद और सम्पादन के क्षेत्र में भी होगा। ‘हंस’ ने बहुत साहसी कहानियां छापी हैं और बहुत सारी कूड़ा भी, पर हंस की खूबी यह है कि इसने वाद-विवाद का और बहस का जो मंच बनाया उसके लिए इन्हें हमेशा याद किया जाएगा।'' -कृष्ण बलदेव वैद, वरिष्ठ कथाकार और नाटककार
जब वे तुलसीदास के व्यक्तित्व और कृतित्व को बांच रहे होते हैं तो तुलसी संकीर्ण जातिवादी और वर्चस्ववादी मूल्यों वाले हो जाते हैं। दलित और पिछड़ा विरोधी हो जाते हैं। यहां राजेन्द्र जी ‘होना/सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ लिखकर सालभर कीर्ति का फल चखते हैं यानि उस पर ऐतिहासिक बहस चलता है। चलवाया जाता है ... और विरोध में लिखे जाने से वे करुणा और खीझ से भर जाते हैं कि लेख यानि रचना के व्यंग्य और सरोकार को पता नहीं हिन्दी वाले समझ क्यों नहीं पा रहे हैं! मतलब तुलसीदास ने अपने समय के मूल्यों या बादमाशियोँ को जब अपनी रचना में रखा तो वह तुलसीदास का निजी विचार बन गया लेकिन राजेन्द्र जी ने महिलाओं के प्रति पुरुष मानसिकता को जब व्यंग्य और प्रतिरोध के रूप में रखा तो उनकी मानसिकता को लेकर जब प्रायोजित-अप्रायोजित हो-हल्ला हुआ तो वे खीझने लगे कि पुरुषवादी मानसिकता को हमारा विचार क्यों माना जा रहा है? राजेन्द्र जी जिन सुविधाओं का वैचारिक सृजन में उपयोग-उपभोग करते हैं उसका दूसरों को लाभ नहीं लेने देते।
राजेन्द्र यादव की हिन्दी विमर्श को सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने पारंपरिक दिमाग के अभिजात्य को बदला। 'हंस' और अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय सामाजिक मनोविज्ञान को बदलने या बदलाव की ओर अग्रसर होने में योगदान किया। 'हंस' में असहमति की आवाज भी बर्दाश्त करने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया उन्होंने ही की। अपना मोर्चा, बीच बहस सहित लेखों और रचनाओं में उन वैचारिक असहमतियों को भी जगह दी गई जो राजेन्द्र जी की चिंता और चिंतन से उलट है। सवाल उठाने चाहे वह सही हो या गलत और अपने समय संदर्भ के द्वंद को दिखाने और दर्ज कराने में उनके योगदानों को कोई भी नाकार नहीं सकता। वो इसी तरह बिंदास बने रहें . जिंदगी को और भी बेहतर बना सकने का उनका रचनात्मक एवं वौधिक उद्यम हमेशा जारी रहे . उनकी उपस्थिति जरूरी और जिंदादिल उपस्थिति है . वे एक ऐसे स्तम्भ हैं जिनसे आस्वस्ति मिलती है .
83 पार राजेंद्रजी को उनके किए-धरे और जिंदादिली के लिए अपार शुभकामनाएं ।

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