Monday, July 30, 2012

एक सांस्कृतिक संवाददाता की डायरी में ‘प्रेमचंद’


                                                       लमही वृतांत
31 जुलाई, 2005 
जन-मन के कुशल चितरे महान कथा-शिल्पी प्रेमचन्द की वर्षपर्यंत मनायी जाने वाली 125 वीं जयंती के निमित्त गठित प्रेमचन्दः 125 वीं जयंती राष्ट्रीय समारोह समिति के बैनर तले (प्रेमचन्द के गाँव) लमहीमें (नामवर) साहित्यकरों-राजनेताओं का दृढ़  जमावड़ा हुआ। इस दिन इस गाँव में इस तरह की जुटान , मेला-तमाशा पिछले 50 वर्षों से 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस), 15 अगस्त, गाँधी जंयती (2 अक्टूबर) की तरह होता रहा है।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर न जाने कितने मंत्री , अधिकारी (साहित्यकार-पाठक तो ऐसे भी आते रहते हैं......) लमही पधारकर  प्रेमचंद को कृतार्थ कर चुके हैं! इस बार लगता है शायद हमारी सरकार अपने प्रतिनिधि लेखक के सचमुच (?) गंभीर है। इसलिए 125 वी जयंती  धूम-धाम से मनाने के लिए समितिगठित हुई। इसी के तहत सूचना-प्रसारण एवं संस्कृति मंत्री  श्री एस. जयपाल रेड्डी (समारोह समिति के अध्यक्ष) यहाँ पधारे तथा प्रेमचन्द स्मारक तथा प्रेमचंद शोध व अध्ययन संस्थान का शिलान्यास  किया। उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने मुख्य अतिथि पद से बड़ी घोषणाएं कीं।

इस तरह रा.सा. समिति की संयोजक राज्यसभा की सांसद सरला माहेश्वरी, आलोचक चंद्रबली सिंह , नामवर सिंहराजेंद्र  यादव,  शिवकुमार मिश्र जैसे मूर्घन्य लोगों की मजबूत उपस्थिति में कर्मकाण्ड की तरह वर्षों से  होती रही तमाम घोषणाओं-आश्वासनों में एक और अध्याय जुड़ गया। “.... नहीं सचमुच इस बार कुछ न कुछ होकर रहेगा .....  के बीच पिछले पर्याप्त अनुभवों  से उपजी आशंकाएं पीछा नहीं छोड़ पा रही हैं। क्या भारत के राष्ट्रपति से बड़ा अभी तक यहाँ कोई आया है क्या ? (अगर सत्ता/पद की बात ही की जाय तो .......)
 गाँव वालों की कई पीढ़ियां मुंशी जी के समकालीनों से लेकर नई पीढ़ी तक हर साल होने वाली कर्मकाण्डी  भीड़-भाड़ से लगभग उबिया चुकी है। खैर, आजादी के बाद से अब तक हमारे जैसे लोकतंत्र में जनता चुनावी आश्वासनों, घोषणाओं की इतनी आदती हो चुकी है कि अब उसके लिए इन्हें  पूरा होना ... नहीं होना कोई मायने नहीं रखता। अब वहइसे इंज्वॉयकरने लगी है। कलम के सिपाही भी कब चाहते कि  जनता की समस्याएँ उसका दुःख-दर्द जारी रहे और सिर्फ  महानों की विरासत के नाम पर स्मारक पर स्मारक  बनते रहे ।

आगे की बात ........

शिलान्यासके बाद सत्तातंत्रदिल्ली /लखनऊ... उड़ गया। लमही से समारोह समिति के अधिकृत नामी साहित्यकारों- लेखकों  का जत्था संगोष्ठी स्थल  उदय प्रताप महाविद्यालय (भोजूवीर) के प्रेक्षागृह में पहुँचा। संगोष्ठी के श्रोताओं, लेखकों का एक बड़ा समूह पहिले से ही वहां जमा था.... लमही नही गया। नहीं जा पाया .. । कारण - वहाँ जाकर पलिहर का वानरहोना है ? बेइज्जत होना है और जो वहाँ से होकर आये थे - वे उदास, चुपचाप,कड़वे अनुभव को लिये खीझते हुए लौटे थे। आखिर, पुलिस-प्रशासन सत्ता को छोड़कर किस चीन्हती है, वे भी लेखकों, पाठकों.... जैसे 'टुच्चे' लोगों को!  बताते हैं बुजुर्ग और भले आलोचक चंद्रबली सिंह तक की गाड़ी रोकी गयी थी.... प्रेमचंद के प्रपौत्र अतुल तो रोके ही गये!

समाज की नब्ज को ठीक से परखने वाले डा. दीनबंधु तिवारी (याद है... 'काशी का अस्सी) का आब्जर्वेशन सटीक बैठा था! वे दो-चार दिन पहले से बता रहे थे कि  वहाँ लदकर जायेंगे ... कोई नहीं पूछेगा और धकियाये जायेंगे अलग से .... और लदकर ही आना पडेगा रैलियोंके भागीदारों की तरह। लेकिन इस मायने में लमही यात्रा सुखद थी कि लंका से (बी.एच.यू.)  एक लक्जरी बस में पाँच-दस  लोग सवार हुए और उधर से रात को लौटानी में भी यहीं दशा थी।


संगोष्ठी: वाराणसी 31 जुलाई 2005 

प्रेमचन्द की प्रासंगिकता समाज की असफलता है - राजेन्द्र यादव

 प्रेमचन्द की 125 वीं जयंती के अवसर पर 125 वीं जयंती  राष्ट्रीय समारोह समितिकी ओर से उदय प्रताप  महाविद्यालय के प्रेक्षागृह में धर्मनिरपेक्ष भारत और प्रेमचन्द  विषयक संगोष्ठी का आयोजन हुआ।

 चंद्रबली सिंह की अध्यक्षता और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के संचालन में गोष्ठी की शुरुआत करते हुए  नामवर सिंह ने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन के दौर में प्रेमचन्द से बड़ा कोई लेखक नहीं दिखाई  देता। कर्बला’ (नाटक), ‘लाँछन (उर्दू में फरेब-कहानी), ‘मंदिर-मस्जिद’(कहानी), ‘हिंसा परमो धर्मः’, ‘कायाकल्प’ (उपन्यास) आदि अनेक रचनाओं को उधृत करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द ने सांप्रदायिकता पर जमकर प्रहार किया। उनकी लडाई दोनों मोर्चों पर थी । हिन्दुत्व की कट्टरता के खिलाफ भी लड़ रहे थे और इस्लाम के भी। उनका मानना था कि समप्रदायिकता पैसे कमाने का भी धंधा है क्योंकि नफरत बिकती है, प्रेम बिकाऊ नहीं होता। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के इस्लाम का विषवृक्षको उन्होंने कम्यूनल एजेंडाकहा था । नामवर जी ने कहा कि प्रेमचंद के  साहित्य में तीन दशक के भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की अमरगाथा है।

हालांकि, नामवर जी इस बार जमे नहीं! पाँच-सात मिनट तक मंच के इस किनारे से उस किनारे तक खराब माइक के कारण चककर काटते रहे। ठोक-ठाक ... इधर-उधर में उनका यूनिक  लयबिगड़ गया था। ...और पहली बार बनारस में खचाखच भरे सभागारों में जनता को वक्तृत्व द्वारा हमेशा सम्मोहित कर देने वाले नामवर जी प्रभावहीन लगे। वे अंत तक प्रेमचंद कि कहानियों को समझाने में लग रहे स्वाभविक भाषण नहीं कर पाये।
जलेस के रा. अ. आलोचक शिवकुमार मिश्र ने कहा कि प्रेमचन्द के वैचारिक लेखन (हंस’, मर्यादा, जागरण, जमाना जैसी पत्रिकाओं में छपे लेख, संपादकीय वगैरह में) स्वाधीनता आंदोलन का पूरा इतिहास मिलता है।  राही मासूम रज़ा से सम्बंधित एक प्रसंग  का उल्लेख करते हुए उनका मानना था कि प्रेमचन्द जेहन के भीतर जमे हुए हिन्दू- मुसलमान को मार चुके थे। इसलिए उन्होंने धर्म की रूढ़ियों, कट्टरता की धज्जियाँ उड़ाई कबीर की तरह। उन्होंने आगे कि सही मायने में प्रेमचंद की सेकुलर  निगाह थी। सेकुलर वो दृष्टि है, सोच है जो आदमी को आदमियत के पैमाने पर शिनाख्त करती है। उनकी स्वराज-संर्घषकी परिकल्पना की बुनियाद ही धर्मनिपेक्षताहै उनके लिए यह बड़ा मूल्य था। अगर जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक समाजवादी भारत आ सका तो प्रेमचन्द का सही सपना पूरा होगा।
सुप्रसिद्व कथाकार दूधनाथ सिंह ने असहमति जताते हुए कहा कि नामवर जी ने कुछ कहानियाँ निकाली .... और शिवकुमार जी ने लेख, संपादकीय ... । इन्हें  सुनकर लगा कि 1900 - 19360  के लेखन काल में उनका पूरा सरोकार हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता  ही थी। सामंतवाद, शोषण और स्त्री पराधीनता के विरूद्व लिखनेवाले प्रेमचन्द का धरम,मरजाद’ ’धर्मनही बल्कि नैतिक मूल्य है।
राजनितिक चिन्तक रमेश दीक्षित  का कहना था कि भारतीय स्वधीनता आंदोलन को हम प्रेमचन्द के बिना समझ नहीं सकते। धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण में उनक मूल्य हमारे लिए संबल है।
 हंससंपादक राजेन्द्र यादव को बचाकररखा गया था। अपेक्षा के मुताबिक देश के दिग्गज स्टा रों  के जमावड़े के बावजूद कुर्सियां खाली थीं। प्रेक्षागृह के आधे हाल में। नामवर जी को सुनने के लिए  इतनी और इस इससे भी अधिक भीड़ होती रही है। श्रोताओं में अधिकसंख्यक नई पीढ़ी के लेखक-पाठक छात्रगण  राजेंद्र यादव को पहली बार देख-सुन रहे थे। कभी साहित्यिक गोष्ठियों में शिरकत न करने वाले लोगों में कई-हम सिर्फ राजेंद्र यादव को सुनने आये हैं। वाले थे।  अपनी बेबाकी, तल्खी, प्रतिशोध तथा जिन्दादिली   के लिय प्रसिद्व (बदनाम’) राजेंद्र यादव ने भी निराश नहीं किया। उनके प्रशंसकों - पाठकों ने हंसऔर अन्य जगह जैसा उनको पढ़ा था, पढ़ी जाने वाल भाषा उसी तरह सुना भी।
श्री यादव ने कहा कि बड़ी मुश्किल से प्रेमचंद प्रतिमा क पहुँचना हो पाया। वहाँ (लमही में) हमारी जरूरत थी भी नहीं। स्थानीय साहित्यकारों की भी भागीदारी  नहीं थी। कैमरामैनही ज्यादा दीख रहे थे। वहाँ प्रेमचन्द का क्या होगा ? हमें राजनेताओं खासकर सत्ता वालों से एलर्जी है। साहित्य सत्ता का प्रतिपक्ष है।  मैं राजनेताओं के साथ असहज हो जाता हूँ। नामवरजी थोड़ा उनके साथ सहज हो जाते हैं। लहमी में किसी संास्कृतिक केंद्र, वाचनालय की घोषणा  नहीं  हुई। यहाँ आकर लगा कि शायाद हम थोड़ा  प्रेमचन्द पर बाल कर सकते हैं।  उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द के व्यक्तिगत  संस्मरण है कि वे व्यवहार में खुलकर मिलते थे, ठठाकर हँसते थे और जो खुलकर हँसता है - वह निर्भीक होता है, जो निर्भीक होता है ईश्वर से नहीं डरता। उसे धर्म की जरूरत नहीं होती । उन्होंने कहा कि भेद करने की मानसिकता जाति में मिलती है। जातिको धर्म का समर्थन हासिल है। हिन्दू सेकुलर नहीं हो सकता- राजनीति व रणनीति में भले हो जाए। जातिवाद के  सबसे बडे़ शिकार दलित और स्त्री  हैं। स्त्री और दलित की मुक्ति के बिना जातिवाद नहीं मिट सकता। और जातिवाद मिटे बिना संाप्रदायिकता खत्म नहीं हो सकती। प्रेमचन्द ने उन सारी समस्याओं को पकड़ा है

जो हमारे समाज और देश को बाँटता है वह वर्णवयवस्था है। बेहद साहसिक अंदाज में अनेको श्रोताओं के लिए यह स्वर बिल्कुल नया था कि प्रेमचन्द बड़ी बाधा हैं।  कोई भी रचनाकार जब हम उसकी नकल करते हैं तो वे हमें खा जाते हैं और जब पार कर जाते हैं तो वे हमारी शक्ति बन जाते हैं।उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द की पूजा क्या हमें निरंतर बौना बनाने की तो नहीं है, यह जाँचनी चाहिए। प्रेमचन्द प्रासंगिक हैं यह कहते हुए गर्व नहीं होता, वे आज भी प्रासंगिक हैं इसमें  हमारे समाज की असफलता है।

चर्चित कथाकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि प्रेमचन्द का सारा साहित्य हमारे लिए घोषणा पत्र है कोई भी नया लेखक  उनसे सिखता है कि कैसा और कैसे लिखना चाहिए। उन्होंने प्रेमचन्द स्मारककी घोषणओं की एक लंबी पंरपरा को याद करते हुए  बनारस की ओर से दिल्लीवालों से गुजारिश की कि फिर दुबारा ऐसा मजाक न हो। क्योंकि प्रेमचन्द एक ऐसे लेखक हैं जिनकी जयंती यहाँ का हर कलाकार, संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार, पाठक, बुद्विजीवी  मनाना अपना कर्तव्य समझता है। 
अध्यक्षीय वक्तव्य में चंद्रबली सिंह ने कहा कि प्रेमचंद को कम्युनिस्ट, गाँधीवादी अपना-अपना बताते हैं। मैं उन्हें कम्युनिस्ट नहीं मानता। लेकिन सामान्य जनता के दुख-दर्द से प्रतिबह रचनाकार के रूप  में वे जनतोत्रिक व्यवस्था, राष्ट्रीय एकता को नयी चेतना प्रदान करते हैं। उनके पास संपूर्ण दृष्टि है। वे गरीबों-मजदूरों की शक्ति को पहचानते थे। शोषण के विरूद्वउनकी लेखकीय  दृष्टि हमारे लिए बेहद जरूरी है।
आलोक राय, अतुल राय सहित अनेक महत्पूर्ण  उपस्थितियां थी।

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