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Thursday, October 11, 2012

अमिताभ: एक सुंदर कविता






अगर सिनेमा मानस पटल पर छा जानेवाली कोई सुंदर-सी किताब है तो अमिताभ बच्चन उस किताब की एक सुंदर कविता हैं। ऐसी मधुर पंक्तियां हैं जो बरबस ही होंठों पर नाच उठती हैं। किसी अज्ञात सम्मोहन में बिंधे से हम पंक्ति -दर -पंक्ति उसे गुनते रहते हैं। औरों से उसकी चर्चा करते हैं। फिर सब मिलकर उसका सस्वर गान करने लगते हैं।  एक गाथा बन जाते हैं। फिल्मी किरदार के रूप में हम उस गाथा को परदे पर अवतरित होता देखते हैं। वह एक आम आदमी बन जाते हैं। उनके अंदर वही सब मानवीय भावना दिखती हैं जो हमारे-आपके अंदर हैं। अमिताभ बच्चन को देखते हुये हम हंस सकते हैं, रो सकते हैं,  तालियां पीट सकते हैं,  ढीशूम-ढीशूम कर सकते हैं। एक संपूर्ण कलाकार को जीवन के विभिन्न रंगों में डूबता देखते हैं। साथ-साथ हिचकोले खाते हैं। अमिताभ बच्चन!! अमिताभ बच्चन!! गॉड ऑफ स्क्रीन,  वन मैन इंडस्ट्री, मेगा स्टार, लिजेंड, एक्टर ऑफ मिलेनियम...  सहस्त्राब्दी के नायक ...अमिताभ ने नायक की अवधारणा को बदलकर रख दिया ! 
 





गंगा किनारे वाले उस छोरे की लंबाई,  दुबले-पतले बदन, पतली-महीन  आवाज की शुरू में अनदेखी की गई, अस्वीकृत किया गया। बाद में वही आवाज एक सुंदर पहचान बन गई। बेमिसाल । अमिताभ का नाम देश-विदेश, गांवों-कस्बों, बस्ती-बस्ती में सुना जा सकता है। वे आमजन की वेदना, गुस्से-आक्रोश को कला के सांचे में ढाल देते हैं। दबे और दबाये हुए लोगों की आवाज को सिनेमाई अंदाज देते हैं और इस तरह जन-जन के मन में अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। लंबी-पतली टांगों, छरहरे बदन और डूबती हुई दूर तलक देखती गहरी आंखों को लोग सिर-माथे पर उठा लेते हैं। हाथों-हाथ लपक लेते हैं। दिल के कोनों और मन की अनंत गहराइयों में बिठा लेते हैं। उनकी हेयर स्टाइल,  पहनावे और संवाद और हर पहलू की नकल करते हैं।हां! अमिताभ सिनेमा-संसार के अद्भुत नक्षत्र हैं। विश्व मंच पर छा जाने वाले सुनहरे सितारें हैं, जिनकी एक छवि पाने के लिये इजिप्टियन महिलाएं इस कदर उतावली हो जाती हैं कि काइरो एयरपोर्ट 'डेंजर जोन ' बन जाता है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  नजीबुल्लाह उनके साथ अपनी ढेर सारी तस्वीरों के बदले फिल्म 'खुदा गवाह'  की शूटिंग के लिए फिल्म टीम को अफगान एयरफोर्स के लगभग आधे भाग का प्रबंध करवाते हैं। यहाँ तक की मुजाहिद्दीन भी उनकी करिश्मा से बच नहीं सके ।  और अपने वतन में उनकी प्रसिद्घि का यह आलम छाया होता है कि कुली (१९८२) की शूटिंग के दौरान  पुनीत इस्सर के प्रहार के कारण घायल हो जाने पर पूरे देश की सांसें थम जाती हैं। उनकी हर एक सांस देशवासियों की प्रार्थनाओं के साथ घुल-मिल जाती हैं। सलमान रुश्दी 'द सैटनिक वर्सेस'  में रेखा के स्क्रीन लवर के रूप में उन्हें इंगित करते हैं।  शशि थरूर और शोभा डे अपनी कहानियों में उन्हें उद्घृत और चित्रित करते हैं। प्रसिद्ध लेखक-गीतकार जावेद अख्तर उनकी भूमिका को संबोधित करते हैं- '....ऐसा गुस्सा जिसमें गरिमा हो, ऐसा आक्रोश जो दुखी करता हो और जिसमें आंसू हों।...'अमिताभ निर्विवाद रूप से हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे हैं।  सिनेमा आकाश के शिखर पुरुष । बॉक्स ऑफिस पर प्रभाव इतना गहरा रहा कि १९७० के दशक में उन्हें 'वन मैन इंडस्ट्री'  कहा जाता रहा।
हिंदी के प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन के बेटे अमिताभ बच्चन का जन्म इलाहाबाद में हुआ। दिल्ली के किरोरीमल कॉलेज से इन्होंने विज्ञान स्नातक की उपाधि ली। कलकत्ता से अभिनय में अपना भाग्य आजमाने बंबई गये।फिल्मी करियर में पहला ब्रेक के. ए. अब्बास की फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' से मिला। लेकिन फिल्म असफल रही। इसके पूर्व प्रख्यात फिल्मकार मृणाल सेन की क्लासिक फिल्म भुवन शोमे (१९६९) में वॉयस नैरेटर के रूप में काम किया। शुरुआती असफलताओं के बाद ऋषिकेश मुखर्जी की कुछ फिल्मों जैसे-'आनंद'  अभिमान और नमक हराम ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। १९७३ में फिल्म जंजीर  की अपार सफलता ने अमिताभ की एंग्री यंग मैन की छवि बना दी। एक ऐसा युवा नायक जो कानून को  हाथों में लेकर भी गलत कामों का बदला लेता है, वाली बनी उनकी अन्याय के खिलाफ आक्रोश जनित छवि ने उन्हें स्टारडम तक पहुंचाया। दीवार, शोले  त्रिशुल और शक्ति का क्रोध, कुंठा, गुस्से, आक्रोश और प्रतिशोध से भरा नायक युवा सपनों का प्रतिनिधि  बन गया। सलीम-जावेद ने १९७० के दशक में गुस्से को प्रदर्शित करती उनकी फिल्मों में एंग्री यंग मैन वाली भूमिका में जान डाल दी। अमिताभ के अभिनय को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- मनमोहन देसाई की वन मैन इंटरटेनर वाली फिल्में जैसे- कुली  और मर्द । यश चोपड़ा और प्रकाश मेहरा की मेनस्ट्रीम वाली सीरियस ड्रामा वाली फिल्में, जैसे- नमक हलाल, शराबी  और सिलसिला या ऋषिकेश मुखर्जी की अभिनय प्रधान फिल्में।  १९८४ में उन्होंने बाल सखा राजीव गांधी के कहने पर राजनीति की ओर रुख किया तथा इलाहाबाद से लोक सभा की सीट भी जीती। राजनीति की चक्करघिन्नी में वह एडज़स्ट  नहीं हो पाए । पर राजनीति  के बाद वाली फिल्मों में वह जादू नहीं रहा। बच गया बस जादुई यथार्थ  ! १९९० में अग्निपथ और हम की सफलता ने उन्हें फिर ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया। १९९२ के बाद फिल्मों से पांच साल का अवकाश लिया और सारा ध्यान अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल) पर केंद्रित रखा। १९९७ में फिल्म मृत्युदंड  से वापसी की। लेकिन यह फिल्म भी उनकी अन्य फिल्मों मेजर साब और सूर्यवंशम की तरह वह खोया हुआ आकर्षण वापस लाने में असफल रही। फिर भी, अमिताभ टेलीविजन के गेम शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में होस्ट की भूमिका से चाहनेवालों की लंबी फेहरिस्त से घिर गये। एक नया अवतार । जोश और जुनून । नये मिलेनियम की और नये दशक की शुरुआत के साथ अमिताभ नये अवतार में सामने आये और एक रिश्ता- द बॉण्ड ऑव लव, मोहब्बतें, अक्स, कभी खुशी कभी गम,  आंखें और हम किसी से कम नहीं जैसी कई प्रशंसनीय और प्रसिद्घ फिल्में की। उन्हें अनेक राष्टरीय-अंतर्राष्टï्रीय सम्मान मिलें हैं। मिलते चले जा रहे हैं । फिल्म फेयर अवार्ड , राष्टïरीय पुरस्कार। अंतरराष्टïरीय सम्मान। मानद डॉक्टरेट उपाधि।   नागरिक सम्मान। एशियन फिल्म पुरस्कार। फ्रांस सरकार का  सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेजन  ऑफ आनर।  लगातार प्रसिद्घि ने बीबीसी ऑनलाइन यूजर्स पोल’ की वोटिंग के जरिए इन्हें मिलेनियम ग्रेटेस्ट स्टार ऑव स्टेज और स्क्रीन से सम्मानित किया गया। कई हॉलीवुड नायकों को पछाडक़र । बीते सालों में  पा में ऑरो की अनूठी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ नायकका राष्टïरीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया है। सच! अमिताभ बच्चन मिलेनियम के नायक हैं। किसी परिचय के मोहताज नहीं। किसी नाम के गुलाम नहीं। कला को जीते हुये, अभिनय को जिंदा बनाये हुये। विविध आयामों वाली भूमिकाएं निभाते हुए एक संपूर्ण कलाकार! महानायक! पुरस्कार-सम्मान, प्रसिद्घि, लोकप्रियता... और नायकत्व अमिताभ के लिए अब लघु है। वे सिनेमा के इतिहास में स्थायी नायक बन चुके हैं। जीवेद् शरद: शतम्... अमिताभ।              

Friday, September 28, 2012

लता मंगेशकर : भारत की आवाज


                             

कहते हैं संगीत ईश्वर है। सच ही, संगीत प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है। अखिल ब्रह़मांड एक प्रकार का संगीत है। नन्हे से घुंघरु की खनक से लेकर नदियों के कलरव और सघन वनों की शांति को भंग करती पत्तियों की चरमराहट में है संगीत। संगीत चिडिय़ों की चहचहाहट संग भोर के प्रकाश में घुल जाता है। रात गए झींगुरों की आवाज संग नाच उठता है। कोयल की कूक बन आम्रमंजरियों-सा महक उठता है। संगीत मेघ मल्हार बन बादलों से बरस उठता है और रौशनी बन चिरागों रौशन हो उठता है। यही संगीत जब सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज बन जाता है तो हमारी आत्मा को छू लेता है। हमारा मन-प्राण झंकृत हो उठता है।  प्रियतमा की बाहों में झूम गा उठता है ‘तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया...’ सिली-सिली बिरहा की आग में जल उठता है। ‘प्यार किया तो डरना क्या’ गा कर  बगावत कर देता है। ‘लग जा गले’ कह आंखों से आंसू बन झरता है... तो कमर्शियल फिल्मों की तेज धूनों संग यह गाता है ‘दिल तो पागल है...’।

सुप्रसिद्घ संगीतकार नौशाद के शब्दों में- ‘‘अभी तक हम इस बात का अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि लता मंगेशकर के रूप में हमें ऊपर वालों ने क्या दिया ! यह खुशकिस्मती है कि हम उस दौर में हैं जिसमें लता जी ने जन्म लिया। उन्होंने गायकी की शुरुआत उस दौर में की, जब नूरजहां, शमशाद बेगम, अमीरबाई और जौहराबाई अम्बालेवाली जैसे जानदार बड़े नाम मौजूद थे। बावजूद इसके लता जी ने अपनी न सिर्फ एक अलग पहचान बनाई बल्कि श्रेष्ठ और शीर्ष स्थान हासिल भी किया। ’’

भारतीय सिनेमा में लता मंगेशकर का नाम 'सिंगिंग' से गूंथा-सा लगता है। इनके गाने हजारों-करोड़ों लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये हैं और दुनिया भर में गुनगुनाये जाते हैं । इन्होंने अलग-अलग भाषाओं में छह दशकों से भी अधिक समय तक गाने गाये और भारतीय संगीत को नई ऊचाईयां दी। गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड  ने माना है कि लता दुनिया भर में सर्वाधिक रिकार्ड की गई गायिका हैं । उन्होंने  20 से अधिक भाषाओं में  30 हजार से अधिक गाने गाये हैं।


लता मंगेशकर का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में 28 सितम्बर, 1929 को हुआ ।  ये पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं जिनके नाम हैं आशा भोंसले, मीना खादीकर, ऊषा मंगेशकर और ह्रदयनाथ मंगेशकर। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर जाने-माने गायक और स्टेज ऐक्टर थे। लता जी के पहले गुरु भी वही थे। १३ वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई। परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने इस छोटी-सी उम्र में ही मराठी और हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया। 


जब स्वतंत्रता आन्दोलन के समय भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था तब 1942 में उनके पिता दुनिया से विदा हो गए, लता के कंधों पर पूरे परिवार का ख़र्च चलाने की ज़िम्मेदारी आ गई  बाल कलाकार के रूप में उनकी पहली फिल्म थी ‘पाहिली मंग्लागौर’। इसी फिल्म में इन्होंने अपना पहला गाना ‘नाटी चैत्रीची नावालाई... गाया। पहला हिंदी गाना ‘पा लागू कर जोरी... 1947 में बनी फिल्म ‘आपकी सेवा में’ के लिए गाया। उस समय जबकि शमशाद बेगम और नूरजहाँ का फिल्मी दुनिया में राज छाया था। लता मंगेशकर ने धीरे-धीरे अपनी पहचान ‘मजबूर’ और ‘महल’ जैसी फिल्मों से बनाई। भारत-चीन युद्घ के बाद 1962 में कवि प्रदीप (असल नाम रामचंद्र द्विवेदी ) का लिखा गाना ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ गाया तो माहौल इतना गमगीन हो उठा कि पंडित जी की आंखों से आंसू आ गये !

ईश्वर की विशेष रूप से तराशी गई जादुई आवाज के साथ लता मंगेशकर ने मधुबाला, मीना कुमारी से लेकर माधुरी दीक्षित तक कई हीरोइनों को अपनी आवाज दी। 70 की उम्र में भी उन्होंने अपनी आवाज की मधुरता से चाहने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया जब उन्होंने फिल्म 'दिल से' का ‘जिया जले जा जले...’ गाया जिसे मात्र 40 मिनट में पूरा किया गया था। उन्होंने लगभग सभी बड़े संगीत निर्देशकों के साथ काम किया है। नौशाद, सी रामचंद्र, एसडी बर्मन, मदन मोहन और शंकर जयकिशन के साथ अपने सबसे अच्छे प्रदर्शन दिए। ‘अभिमान’, ‘दस्तक’ और ‘आम्रपाली’ यादगार फिल्मों में हैं। 1990 के दशक में ‘रूदाली’, ‘हम आपके है कौन’ और ‘लेकिन’ जैसी अनेक फिल्मों को आवाज दी (जिसे इन्होंने प्रोड्यूज भी किया)। इन्होंने कई मराठी फिल्मों को भी प्रोड्यूज किया। लता मंगेशकर को 1989 में सर्वोच्च भारतीय सिने पुरस्कार दादा साहब फाल्के और 2001 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वे हर संगीतकार की सपना हैं


लता जी अब जीवित किंवदंती बन चुकी हैं। जब तक हो सके, वे गाती रहें... आएगा आने वाला... । जीवेद शरदः शतम....

Tuesday, September 25, 2012

...आनंद और आनंद




                   
                                                           (26 सितम्बर 1923 -- 3 दिसम्बर 2011)



'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’ ....यह उनका फलसफा था . ईश्वर ने उन्हें लम्बी उम्र दी . जिंदगी को भरपूर जिया उन्होंने . विश्वास नहीं होता कि वे 'थे' हो गए हैं .  उल्लास से भरे , अनवरत सृजनरत देव आनंद .
देव आनंद सफलता-असफलता से परे सिनेमा सृजन में जिंदगी के नौवें दशक में भी सक्रिय थे .  वे सिनेमा से ‘सेवानिवृत्त’ न हुए थे . ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’... उन पर सही फबता था .  एक बातचीत में वह कहते हैं- ‘‘मैं फिल्में बनाता हूं क्योंकि मैं बनाना पसंद करता हूं।’’ एक अभिनेता, फिल्मकार, स्क्रीन लेखक, निर्देशक के रूप में देव आनंद ने अनेक चेहरों को ब्रेक दिया। गाइड, ज्वेल थीफ, प्रेम पुजारी, हरे रामा, हरे कृष्णा, देश-परदेश, स्वामी दादा सहित अनेक फिल्मों के कारण वह अन्तर्राष्ट्रीय सिनेमा संसार में भी प्रतिष्ठा रखते हैं। स्वतंत्र भारत का पहला दशक भारतीय सिनेमा के उत्कर्ष का दौर था। यह वो समय था जब फिल्म इंडस्ट्री पल-पल बदल रही थी। नये-नये प्रयोग हो रहे थे। अभिनय लेखन, निर्देशन, प्रयोजन सभी क्षेत्रों में नित नये आयाम खुल रहे थे। वह संजीदा समय था। राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे अभिनेताओं का समय था। देवआनंद इन्हीं कलाकारों की एक कड़ी रहे। पर थोड़े अधिक रोमांटिक, थोड़े अधिक जोशीले, थोड़े अधिक दिलफरेब, थोड़े अधिक शहरी!
जीवन की भूख , सृजन की चाह देव साहब की जिंदगी थी . वे सफलता -असफलता से परे रचनात्मक सक्रियता को जी रहे थे. 

                      

कहते हैं कि फिल्मी पर्दे पर देवानंद को काले कपड़ों में देख लड़कियां आहें भर उठती थीं। वे सिने प्रेमियों के दिलो-दिमाग पर छा जाते थे। चलने, हंसने, बोलने और अभिनय के अपने ही अलग अंदाज के साथ पर्दे पर रूमानियत और आकर्षण का समां सा बांध देते। नई-नई नायिकाओं के साथ जोडिय़ां बनाते और भी खूबसूरत हो जाते। चटख रंगों, सूट-बूट, सुंदर लिबासों, हंसीसेटों के बीच और भी रोमांटिक और जीवन से भरे दिखते थे। देवआनंद का जन्म पंजाब के गुरदासपुर में हुआ। इनके बचपन का नाम देवदत्त पिशोरीमल आनंद था। पंजाब युनिवर्सिटी से डिग्री लेने के बाद 1943 में फिल्मों में ऐक्टिंग के लिये बम्बई आये। अपने लक्ष्य में इन्हें सफलता हासिल हुई और 1945 में प्रभात फिल्म्स कंपनी की फिल्म ‘हम एक हैं’ से लीड हीरो के रूप में बे्रक मिला जो उनके कैरियर के 50 से भी अधिक वर्षों तक जारी रहा। बड़े भाई चेतन आनंद के साथ मिलकर 1949 में इन्होंने नवकेतन स्टूडियो खोला।
उनकी पहली सबसे बड़ी हिट फिल्म ‘जिद्दी’ रही। ‘बाजी’, ‘सी.आई.डी.,’ ‘काला बाजार,’ ‘हम दोनों’ की सफलता के साथ ही आनंद बॉक्स ऑफिस पर छा गये। 1970 में देव आनंद ने फिल्मों के डायरेक्शन की ओर रूख किया और फिर तब से अपनी ही निर्देशित फिल्मों में अभिनय भी करते रहे। ड्रग कल्चर पर आधारित उनकी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। अपनी फिल्मों से कई नये चेहरों को इंट्रोड्यूज किया जिनमें जीनत अमान, टीना मुनिम, नताशा, एकता और सुनील आनंद जैसे नाम शामिल हैं। निर्देशक होने के साथ-साथ ही देवआनंद एक अच्छे प्रोड्यूसर भी रहे। नवकेतन के बैनर तले इन्होंने ४0 से भी अधिक फिल्मों का निर्माण किया। फिल्म बनाने के क्षेत्र में भी आनंद सफल रहे और फिल्म इण्डस्ट्री को एक अभिनेता निर्देशक और प्रोड्यूसर के रूप में कई सफल फिल्में दी। करियर के अपने लंबे सफर में इन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे और असफलताओं को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ते रहे और हमेशा सक्रिय रहे। उनकी हर फिल्म उनके लिये जैसे एक चैलेंज थी।
‘काला पानी’ और ‘गाइड’ के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिले। वहीं भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें 2001 में पद्म भूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया। पुराने जमाने के नये अभिनेता रहे वह। रोजमर्रा की घटनाओं से कहानियां बुनते लेखक रहे वह, एक सफल निर्देशक, प्रायोजक रहे वह।  देवानंद की किताब रोमांसिंग विद लाइफ के अनुसार ‘मुझे जीनत पर फख्र था, लेकिन राजकपूर से जब वो लिपटती तो... मुझे जलन होती। मुझे लगता कि वह सिर्फ मेरी अमानत है, मेरी खोज है, मेरी नायिका है। उसे एक बार चूमने की चाहत थी मेरे दिल में...’। ‘‘सुराईया ने होंठ मेरी ओर बढ़ाए, मैने पूछा, ‘‘शादी करोगी?’’ उसने फिर मुझे सीने से लगाया और हुंकारी भरते हुए बोली, ‘‘आई लव यू! आई लव यू...’’ ऐसे है हमारे ऐवर ग्रीन हीरो देवानंद... एक समय था जिन पर उनके चाहने वाले मरते थे कहां जाता है कि काली पेंट और सफेद शर्ट पहनकर चलने पर रोक लगा दी गयी थी क्योंकि लड़कियां उन्हे देखकर ऊपर से कूद ना जाएं। 
देव साहब के ६५ साला फ़िल्मी सफ़र के जो किये -धरे कार्य हैं वह हमारे लिए सुरक्षित है . वह जिन्दा रहेंगे अपनी कृत्तियो में . सिनेमा का इतिहास के वे स्वर्णिम अध्याय बनकर प्रेरित करते रहेंगे सिने पीढियों को . कब मिलेगा फिल्म इण्डस्ट्री को एक कलाकार ऐसा दुबारा ?

Monday, September 17, 2012

शबाना आजमी: सृजन एवं सरोकार

                         


      


शबाना आजमी (18 सितम्बर , 1950)  भारतीय सिनेमा की एक अनूठी उपलब्धि हैं। सिनेमा-सृजन और सरोकारों को समर्पित शबाना के लिए सिनेमा सिर्फ कॅरियर या मनोरंजन नहीं है बल्कि एक बड़ा सरोकार भी है। शबाना आजमी का बचपन मशहूर शायर कैफी आजमी और मां शौकत आजमी के सान्निध्य में पला-बढ़ा। सरोकारों से संस्कारित हुआ ।    एक तरह से कलात्मक विरासत और सांस्कृतिक पर्यावरण में उनका पालन पोषण हुआ। सृजन और विचार  द्वारा हस्तक्षेप शबाना का एक लक्ष्य रहा है। एक कुशल वक्ता, समाज सेवी और गंभीर अभिनेत्री के रूप में उन्होंने हिन्दी सिनेमा को एक गरिमा दी है। तभी तो उनकी विशिष्टता को पूरे सिनेमा संसार में एक सम्मानित जगह हासिल है। 
समानांतर सिनेमा हो या फिर कमर्शियल फिल्में उन्होंने हमेशा अपने को साबित किया। उनकी गंभीरता ही उनकी ग्लैमर साबित हुई। 'अर्थ', 'निशांत', 'अंकुर', 'स्पर्श', 'मासूम', 'फायर' जैसी फिल्मों के अलावा 'अमर अकबर एंथोनी', 'परवरिश', 'मैं आजाद हूं'... आदि में भी उनकी अभिनय प्रतिभा प्रबुद्घ और आम दर्शकों में पसंद की गई।  प्रयोगात्मक सिनेमा को एक स्थापित जगह दिलाने में उनके योगदान उल्लेखनीय हैं। विवादास्पद और बहुचर्चित फिल्म 'फायर' में उनके अभिनय को लेकर काफी चर्चा-कुचर्चा हुई  लेकिन जिस तरह उन्होंने बेधडक़ होकर अभिनय किया वह उनकी प्रतिभा का जीवंत प्रमाण ही तो है! 'मकड़ी' में (बाल-फिल्म ) चुड़ैल की भूमिका को देखकर यह लगा कि शबाना के लिए अभिनय का मतलब भीड़ से जुदा है। 'गॉडमदर' में महिला डॉन की भूमिका ने उनकी प्रतिभा को विस्तार दिया। लगभग चार दशक की अपनी अभिनय यात्रा में उन्होंने यह साबित किया है कि एक कलाकार समाज में विविध प्रकार से अपनी भूमिका निभाते हुए बदलाव और जरूरी हस्तक्षेप का वाहक बन सकता है।

      

याद है ‘वाटर’ फिल्म की बनारस में शूटिंग के दौरान शबाना आजमी को सिर मुंडवाकर उस किरदार की तैयारी में गंभीरता से डूबे होने का। उस बवाल के दौरान मैं बनारस ही था । अस्सी घाट के एक होटल में शबाना और नंदिता दास रुकी हुई थीं ।  बनारस में इसकी शूटिंग और पटकथा को लेकर हुए बवाल के कारण फिल्म की शूटिंग का प्रभावित होना एक अप्रिय प्रसंग रहा।
शबाना आजमी फिल्म, टेलीविजन और थिएटर के क्षेत्र की कुशल अभिनेत्री और सक्रिय सृजनधर्मी हैं। पूणें स्थित फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षित शबाना ने 1974 में ‘अंकुर ’ से अभिनय जगत में कदम रखा और शीघ्र ही वे समानांतर सिनेमा के क्षेत्र में चर्चित कलाकार के रूप में शुमार हो गईं। सिनेमा के सामाजिक सरोकार के नव यथार्थवादी आंदोलन में बतौर कलाकार शबाना ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सिनेमा संसार में और एक सामाजिक कार्यकर्ता उनके योगदानों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। उन्हें अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार-सम्मान मिले। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार क्रमश: अंकुर (1975), अर्थ (1983), खंडहर (1984), पार (1985), गॉडमदर (1999) के लिए मिले। वही स्वामी (1978), भावना (१९८५) के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिले। लिबास (1993), पतंग (1994), फायर (1996) आदि में उनके सशक्त अभिनय के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। शबाना आजमी को भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य होने का भी गौरव प्राप्त है। सौ से अधिक मुख्यधारा और कलात्मक फिल्मों में जो उन्होंने रचा है वह अपने आप में बेमिसाल है। मशहूर कवि-गीतकार और सिने लेखक जावेद अख्तर की संगिनी शबाना आजमी की सम्पूर्ण कलात्मकता 60 पार भी उसी लय के साथ जारी है। एक कलाकार की तरह जीते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से उनकी सरोकारी सक्रियता बनी हुई है ....जारी रहे अनवरत!