सरोकार
राष्ट्रीय एकता , सद्भाव , भाईचारा , समन्वय ...शब्द मात्र नहीं है । ये हमारे मूल संस्कार हैं। भारतीयता के मर्म हैं । महान समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जिसे 'विरुधोँ का सामंजस्य' कहा है ... । वह है भारतीयता । ब्राह्मण एवं श्रमण धरा एक साथ रही है यहाँ । प्रख्यात विद्वान पंडित विद्यानिवास मिश्र जिसे 'भारतीयता निःशेष होने का फक्कडपन है' कहते थे ....
और '' इस फक्कड़पन में संग्रह अधिक नहीं होना चाहिए , परिग्रह नहीं करना चाहिए अर्थात् वस्तुओं को अपने आस-पास वितरित करना चाहिए । हमारा संग्रह सबके लिए है --सबका है , यह भाव होना चाहिए । .. सारे के सारे प्रांत , जाति , क्षेत्र-उपक्षेत्र , धर्म-संप्रदाय का विभेद इस भारतीय होने से ही विलोपित हो जाता है । हमारी अखंडता ..अखंड सोच से ही निर्मित है ।'' भारतीयता लोकतंत्र का चलताऊ या कहें तो 'पोलिटिकली करेक्ट' (राजनीतिकों की तरह ) शब्द नहीं है , बल्कि लोकतंत्र की आधुनिक अवधारणा से पहले का हमारा मूल चरित्र है , संस्कार है ... असहमति , विरोध को भी सम्मान देने का ...। नास्तिक दर्शन चार्वाक को भी यहाँ सम्मान दिया गया है । भारतीय दर्शन का अंग मना गया है । असहमति की आवाज को बर्दास्त करना .. ज्ञान -संस्कृति के किसी भी केंद्र को मान देना यह भारतीय संस्कृति का मूल स्वर है ।
जब माहौल शक्की हो , अफवाहोँ का जोर-शोर हो , जगह-जगह धर्म और संस्कृति के नाम पर झगड़े-झंझट हों , राजनीति और सत्ता के अपने-अपने स्वार्थ हों , वैसे में राष्ट्रीय एकता को धर्म के मंच पर , सरोकार के मोर्चे पर डटकर मजबूत बनाने की कोशिश .. पहल अनुकरणीय एवं आस्वस्तिदायक हैं ।
स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय (मेरठ ) में सुभारती विश्वविद्यालय एवं एन एल बी चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में राष्ट्रीय एकता , सद्भावना के लिए (16 अगस्त को ) अद्भुत एवं मजबूत जमावड़ा हुआ। रमजान , रक्षाबंधन , जन्माष्टमी एक साथ ..ख़ुशी , उल्लास और परंपरा के साथ मना।
पवित्र रमजान के महीने में योगिराज भगवान श्रीकृष्ण के अवतार पर्व जन्माष्टमी और रक्षाबंधन पर चर्चा की गयी ।
ईश्वर , अल्लाह ...यानि अलग-अलग विश्वासों पर वौधिक चर्चा की गयी और कहा गया कि धर्मं के रास्ते भले ही अलग हों , मानवता के उत्थान के लिए , जगत कल्याण के लिए बातें प्रायः एक जैसी हैं । धर्म जोड़ता है । मनुष्यता की जमीं पर सभी एक हैं ।
शहर काजी डॉ जैनुस साजिदीन , रेव्हरन- डैनियल मसीह , पास्टर मनीष , सरदार तिलक सिंह , सरदार गुरुचरण सिंह , डॉ वाचस्पति मिश्र , नायब शहर काजी , पंकज जोली , डॉ कुंतल अग्रवाल , जोहरा आपा , शाहीन परवेज़ आदि की सक्रिय-सचेत उपस्थिति रही ।
प्रख्यात विद्वान् शहर काजी (मेरठ ) डॉ साजिदीन ने पाक रमजान के महत्व और मर्म को सुचिंतित तरीके से रखा , वही संस्कृत विद्वान डॉ वाचस्पति मिश्र ने धर्म-संस्कृति के मूल तत्वों को रखते हुए रक्षाबंधन की महता एवं प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला । धर्म में निहित एका को सुचिंतित वाणी दी ।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मंज़ूर अहमद ने अध्यक्षीय वक्तव्य में स्वामी विवेकानंद , रामकृष्ण परमहंस और अनेक संदर्भोँ के उद्धरण देते हुई संस्कृति समन्वय द्वारा राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रबल बनाने पर जोर दिया ।
सुभारती आन्दोलन के संस्थापक डॉ अतुल कृष्ण , जो स्वयं पुरे रमजान में रोजा रखते रहे हैं , ने सूत्रधार के रूप में कार्यक्रम को राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए साकार रूप दिया। भारतीय संस्कृति की जमीं पर खड़े होकर कैसे राष्ट्रीय एकता, अखंडता को मजबूत और अटूट बनाया जाय यह चिंता रही है उनकी । नवरात्र व्रत पारायण हो या रमजान या फिर अन्य धार्मिक सांस्कृतिक उत्सव - पर्व ...यह डॉ अतुल कृष्ण के मिशन में विद्यार्थी जीवन से रहा । कहें तो बाल जीवन से रहा । समाज , संस्कृति , सरोकार , समन्वय , राष्ट्रवाद ... डॉक्टर अतुल के लिए जीवन धर्म है , दर्शन है। डॉ अतुल एवं अन्य लोगों को इस अवसर पर मुस्लिम-हिन्दू बहनों ने एकता और संस्कृति समन्यव के प्रतीक के रूप में रक्षासूत्र बाँधा ।
'समुद्र संगम' (सांस्कृतिक उपन्यास --'मज्ज -उल -बह -रैन' -दाराशुकोह ) जो मुग़ल शहजादे दाराशुकोह के गुरु पंडितराज जगन्नाथ की आत्मकथा का औपन्यासिक अनुवाद है , में आचार्य डॉ भोलाशंकर व्यास ने अपने निवेदन में लिखा है - "दो विरोधी विचारधाराओं, दार्शनिक परम्पराओं, कलागत मान्यताओं, रीति-रिवाजों के .....समन्वय के लिए (जो प्रयास) काश ! कवीन्द्राचार्य सरस्वती, सन्त मुल्लाशाह, बाबा लालदयाल, सरमद, दारा, जहाँआरा और पण्डितराज ने किया, वह सफल हो गया होता।"
इस कार्यक्रम में भी सभी विद्वानों , धर्म गुरुओ , समाजसेवियों , अध्यापकों , छात्रों की यही मंशा रही कि भारतीयता की मजबूत गाँठ और मजबूत हो , ऐसे कर्यक्रम हमेशा और सभी दिशाओ में होते रहे ।
'सभ्यता संघर्ष' नहीं बल्कि सभ्यता समन्वय भारतीय धरा है । हमारा उत्स है ।
राष्ट्रीय एकता , सद्भाव , भाईचारा , समन्वय ...शब्द मात्र नहीं है । ये हमारे मूल संस्कार हैं। भारतीयता के मर्म हैं । महान समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जिसे 'विरुधोँ का सामंजस्य' कहा है ... । वह है भारतीयता । ब्राह्मण एवं श्रमण धरा एक साथ रही है यहाँ । प्रख्यात विद्वान पंडित विद्यानिवास मिश्र जिसे 'भारतीयता निःशेष होने का फक्कडपन है' कहते थे ....
और '' इस फक्कड़पन में संग्रह अधिक नहीं होना चाहिए , परिग्रह नहीं करना चाहिए अर्थात् वस्तुओं को अपने आस-पास वितरित करना चाहिए । हमारा संग्रह सबके लिए है --सबका है , यह भाव होना चाहिए । .. सारे के सारे प्रांत , जाति , क्षेत्र-उपक्षेत्र , धर्म-संप्रदाय का विभेद इस भारतीय होने से ही विलोपित हो जाता है । हमारी अखंडता ..अखंड सोच से ही निर्मित है ।'' भारतीयता लोकतंत्र का चलताऊ या कहें तो 'पोलिटिकली करेक्ट' (राजनीतिकों की तरह ) शब्द नहीं है , बल्कि लोकतंत्र की आधुनिक अवधारणा से पहले का हमारा मूल चरित्र है , संस्कार है ... असहमति , विरोध को भी सम्मान देने का ...। नास्तिक दर्शन चार्वाक को भी यहाँ सम्मान दिया गया है । भारतीय दर्शन का अंग मना गया है । असहमति की आवाज को बर्दास्त करना .. ज्ञान -संस्कृति के किसी भी केंद्र को मान देना यह भारतीय संस्कृति का मूल स्वर है ।
जब माहौल शक्की हो , अफवाहोँ का जोर-शोर हो , जगह-जगह धर्म और संस्कृति के नाम पर झगड़े-झंझट हों , राजनीति और सत्ता के अपने-अपने स्वार्थ हों , वैसे में राष्ट्रीय एकता को धर्म के मंच पर , सरोकार के मोर्चे पर डटकर मजबूत बनाने की कोशिश .. पहल अनुकरणीय एवं आस्वस्तिदायक हैं ।
स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय (मेरठ ) में सुभारती विश्वविद्यालय एवं एन एल बी चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में राष्ट्रीय एकता , सद्भावना के लिए (16 अगस्त को ) अद्भुत एवं मजबूत जमावड़ा हुआ। रमजान , रक्षाबंधन , जन्माष्टमी एक साथ ..ख़ुशी , उल्लास और परंपरा के साथ मना।
पवित्र रमजान के महीने में योगिराज भगवान श्रीकृष्ण के अवतार पर्व जन्माष्टमी और रक्षाबंधन पर चर्चा की गयी ।
ईश्वर , अल्लाह ...यानि अलग-अलग विश्वासों पर वौधिक चर्चा की गयी और कहा गया कि धर्मं के रास्ते भले ही अलग हों , मानवता के उत्थान के लिए , जगत कल्याण के लिए बातें प्रायः एक जैसी हैं । धर्म जोड़ता है । मनुष्यता की जमीं पर सभी एक हैं ।
शहर काजी डॉ जैनुस साजिदीन , रेव्हरन- डैनियल मसीह , पास्टर मनीष , सरदार तिलक सिंह , सरदार गुरुचरण सिंह , डॉ वाचस्पति मिश्र , नायब शहर काजी , पंकज जोली , डॉ कुंतल अग्रवाल , जोहरा आपा , शाहीन परवेज़ आदि की सक्रिय-सचेत उपस्थिति रही ।
प्रख्यात विद्वान् शहर काजी (मेरठ ) डॉ साजिदीन ने पाक रमजान के महत्व और मर्म को सुचिंतित तरीके से रखा , वही संस्कृत विद्वान डॉ वाचस्पति मिश्र ने धर्म-संस्कृति के मूल तत्वों को रखते हुए रक्षाबंधन की महता एवं प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला । धर्म में निहित एका को सुचिंतित वाणी दी ।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मंज़ूर अहमद ने अध्यक्षीय वक्तव्य में स्वामी विवेकानंद , रामकृष्ण परमहंस और अनेक संदर्भोँ के उद्धरण देते हुई संस्कृति समन्वय द्वारा राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रबल बनाने पर जोर दिया ।
सुभारती आन्दोलन के संस्थापक डॉ अतुल कृष्ण , जो स्वयं पुरे रमजान में रोजा रखते रहे हैं , ने सूत्रधार के रूप में कार्यक्रम को राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए साकार रूप दिया। भारतीय संस्कृति की जमीं पर खड़े होकर कैसे राष्ट्रीय एकता, अखंडता को मजबूत और अटूट बनाया जाय यह चिंता रही है उनकी । नवरात्र व्रत पारायण हो या रमजान या फिर अन्य धार्मिक सांस्कृतिक उत्सव - पर्व ...यह डॉ अतुल कृष्ण के मिशन में विद्यार्थी जीवन से रहा । कहें तो बाल जीवन से रहा । समाज , संस्कृति , सरोकार , समन्वय , राष्ट्रवाद ... डॉक्टर अतुल के लिए जीवन धर्म है , दर्शन है। डॉ अतुल एवं अन्य लोगों को इस अवसर पर मुस्लिम-हिन्दू बहनों ने एकता और संस्कृति समन्यव के प्रतीक के रूप में रक्षासूत्र बाँधा ।
'समुद्र संगम' (सांस्कृतिक उपन्यास --'मज्ज -उल -बह -रैन' -दाराशुकोह ) जो मुग़ल शहजादे दाराशुकोह के गुरु पंडितराज जगन्नाथ की आत्मकथा का औपन्यासिक अनुवाद है , में आचार्य डॉ भोलाशंकर व्यास ने अपने निवेदन में लिखा है - "दो विरोधी विचारधाराओं, दार्शनिक परम्पराओं, कलागत मान्यताओं, रीति-रिवाजों के .....समन्वय के लिए (जो प्रयास) काश ! कवीन्द्राचार्य सरस्वती, सन्त मुल्लाशाह, बाबा लालदयाल, सरमद, दारा, जहाँआरा और पण्डितराज ने किया, वह सफल हो गया होता।"
इस कार्यक्रम में भी सभी विद्वानों , धर्म गुरुओ , समाजसेवियों , अध्यापकों , छात्रों की यही मंशा रही कि भारतीयता की मजबूत गाँठ और मजबूत हो , ऐसे कर्यक्रम हमेशा और सभी दिशाओ में होते रहे ।
'सभ्यता संघर्ष' नहीं बल्कि सभ्यता समन्वय भारतीय धरा है । हमारा उत्स है ।

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