(26 सितम्बर 1923 -- 3 दिसम्बर 2011)
'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’ ....यह उनका फलसफा था . ईश्वर ने उन्हें लम्बी उम्र दी . जिंदगी को भरपूर जिया उन्होंने . विश्वास नहीं होता कि वे 'थे' हो गए हैं . उल्लास से भरे , अनवरत सृजनरत देव आनंद .
देव आनंद सफलता-असफलता से परे सिनेमा सृजन में जिंदगी के नौवें दशक में भी सक्रिय थे . वे सिनेमा से ‘सेवानिवृत्त’ न हुए थे . ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’... उन पर सही फबता था . एक बातचीत में वह कहते हैं- ‘‘मैं फिल्में बनाता हूं क्योंकि मैं बनाना पसंद करता हूं।’’ एक अभिनेता, फिल्मकार, स्क्रीन लेखक, निर्देशक के रूप में देव आनंद ने अनेक चेहरों को ब्रेक दिया। गाइड, ज्वेल थीफ, प्रेम पुजारी, हरे रामा, हरे कृष्णा, देश-परदेश, स्वामी दादा सहित अनेक फिल्मों के कारण वह अन्तर्राष्ट्रीय सिनेमा संसार में भी प्रतिष्ठा रखते हैं। स्वतंत्र भारत का पहला दशक भारतीय सिनेमा के उत्कर्ष का दौर था। यह वो समय था जब फिल्म इंडस्ट्री पल-पल बदल रही थी। नये-नये प्रयोग हो रहे थे। अभिनय लेखन, निर्देशन, प्रयोजन सभी क्षेत्रों में नित नये आयाम खुल रहे थे। वह संजीदा समय था। राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे अभिनेताओं का समय था। देवआनंद इन्हीं कलाकारों की एक कड़ी रहे। पर थोड़े अधिक रोमांटिक, थोड़े अधिक जोशीले, थोड़े अधिक दिलफरेब, थोड़े अधिक शहरी!
जीवन की भूख , सृजन की चाह देव साहब की जिंदगी थी . वे सफलता -असफलता से परे रचनात्मक सक्रियता को जी रहे थे.
कहते हैं कि फिल्मी पर्दे पर देवानंद को काले कपड़ों में देख लड़कियां आहें भर उठती थीं। वे सिने प्रेमियों के दिलो-दिमाग पर छा जाते थे। चलने, हंसने, बोलने और अभिनय के अपने ही अलग अंदाज के साथ पर्दे पर रूमानियत और आकर्षण का समां सा बांध देते। नई-नई नायिकाओं के साथ जोडिय़ां बनाते और भी खूबसूरत हो जाते। चटख रंगों, सूट-बूट, सुंदर लिबासों, हंसीसेटों के बीच और भी रोमांटिक और जीवन से भरे दिखते थे। देवआनंद का जन्म पंजाब के गुरदासपुर में हुआ। इनके बचपन का नाम देवदत्त पिशोरीमल आनंद था। पंजाब युनिवर्सिटी से डिग्री लेने के बाद 1943 में फिल्मों में ऐक्टिंग के लिये बम्बई आये। अपने लक्ष्य में इन्हें सफलता हासिल हुई और 1945 में प्रभात फिल्म्स कंपनी की फिल्म ‘हम एक हैं’ से लीड हीरो के रूप में बे्रक मिला जो उनके कैरियर के 50 से भी अधिक वर्षों तक जारी रहा। बड़े भाई चेतन आनंद के साथ मिलकर 1949 में इन्होंने नवकेतन स्टूडियो खोला।
उनकी पहली सबसे बड़ी हिट फिल्म ‘जिद्दी’ रही। ‘बाजी’, ‘सी.आई.डी.,’ ‘काला बाजार,’ ‘हम दोनों’ की सफलता के साथ ही आनंद बॉक्स ऑफिस पर छा गये। 1970 में देव आनंद ने फिल्मों के डायरेक्शन की ओर रूख किया और फिर तब से अपनी ही निर्देशित फिल्मों में अभिनय भी करते रहे। ड्रग कल्चर पर आधारित उनकी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। अपनी फिल्मों से कई नये चेहरों को इंट्रोड्यूज किया जिनमें जीनत अमान, टीना मुनिम, नताशा, एकता और सुनील आनंद जैसे नाम शामिल हैं। निर्देशक होने के साथ-साथ ही देवआनंद एक अच्छे प्रोड्यूसर भी रहे। नवकेतन के बैनर तले इन्होंने ४0 से भी अधिक फिल्मों का निर्माण किया। फिल्म बनाने के क्षेत्र में भी आनंद सफल रहे और फिल्म इण्डस्ट्री को एक अभिनेता निर्देशक और प्रोड्यूसर के रूप में कई सफल फिल्में दी। करियर के अपने लंबे सफर में इन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे और असफलताओं को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ते रहे और हमेशा सक्रिय रहे। उनकी हर फिल्म उनके लिये जैसे एक चैलेंज थी।
‘काला पानी’ और ‘गाइड’ के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिले। वहीं भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें 2001 में पद्म भूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया। पुराने जमाने के नये अभिनेता रहे वह। रोजमर्रा की घटनाओं से कहानियां बुनते लेखक रहे वह, एक सफल निर्देशक, प्रायोजक रहे वह। देवानंद की किताब रोमांसिंग विद लाइफ के अनुसार ‘मुझे जीनत पर फख्र था, लेकिन राजकपूर से जब वो लिपटती तो... मुझे जलन होती। मुझे लगता कि वह सिर्फ मेरी अमानत है, मेरी खोज है, मेरी नायिका है। उसे एक बार चूमने की चाहत थी मेरे दिल में...’। ‘‘सुराईया ने होंठ मेरी ओर बढ़ाए, मैने पूछा, ‘‘शादी करोगी?’’ उसने फिर मुझे सीने से लगाया और हुंकारी भरते हुए बोली, ‘‘आई लव यू! आई लव यू...’’ ऐसे है हमारे ऐवर ग्रीन हीरो देवानंद... एक समय था जिन पर उनके चाहने वाले मरते थे कहां जाता है कि काली पेंट और सफेद शर्ट पहनकर चलने पर रोक लगा दी गयी थी क्योंकि लड़कियां उन्हे देखकर ऊपर से कूद ना जाएं।
‘काला पानी’ और ‘गाइड’ के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिले। वहीं भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें 2001 में पद्म भूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया। पुराने जमाने के नये अभिनेता रहे वह। रोजमर्रा की घटनाओं से कहानियां बुनते लेखक रहे वह, एक सफल निर्देशक, प्रायोजक रहे वह। देवानंद की किताब रोमांसिंग विद लाइफ के अनुसार ‘मुझे जीनत पर फख्र था, लेकिन राजकपूर से जब वो लिपटती तो... मुझे जलन होती। मुझे लगता कि वह सिर्फ मेरी अमानत है, मेरी खोज है, मेरी नायिका है। उसे एक बार चूमने की चाहत थी मेरे दिल में...’। ‘‘सुराईया ने होंठ मेरी ओर बढ़ाए, मैने पूछा, ‘‘शादी करोगी?’’ उसने फिर मुझे सीने से लगाया और हुंकारी भरते हुए बोली, ‘‘आई लव यू! आई लव यू...’’ ऐसे है हमारे ऐवर ग्रीन हीरो देवानंद... एक समय था जिन पर उनके चाहने वाले मरते थे कहां जाता है कि काली पेंट और सफेद शर्ट पहनकर चलने पर रोक लगा दी गयी थी क्योंकि लड़कियां उन्हे देखकर ऊपर से कूद ना जाएं।
देव साहब के ६५ साला फ़िल्मी सफ़र के जो किये -धरे कार्य हैं वह हमारे लिए सुरक्षित है . वह जिन्दा रहेंगे अपनी कृत्तियो में . सिनेमा का इतिहास के वे स्वर्णिम अध्याय बनकर प्रेरित करते रहेंगे सिने पीढियों को . कब मिलेगा फिल्म इण्डस्ट्री को एक कलाकार ऐसा दुबारा ?


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