Thursday, October 11, 2012

अमिताभ: एक सुंदर कविता






अगर सिनेमा मानस पटल पर छा जानेवाली कोई सुंदर-सी किताब है तो अमिताभ बच्चन उस किताब की एक सुंदर कविता हैं। ऐसी मधुर पंक्तियां हैं जो बरबस ही होंठों पर नाच उठती हैं। किसी अज्ञात सम्मोहन में बिंधे से हम पंक्ति -दर -पंक्ति उसे गुनते रहते हैं। औरों से उसकी चर्चा करते हैं। फिर सब मिलकर उसका सस्वर गान करने लगते हैं।  एक गाथा बन जाते हैं। फिल्मी किरदार के रूप में हम उस गाथा को परदे पर अवतरित होता देखते हैं। वह एक आम आदमी बन जाते हैं। उनके अंदर वही सब मानवीय भावना दिखती हैं जो हमारे-आपके अंदर हैं। अमिताभ बच्चन को देखते हुये हम हंस सकते हैं, रो सकते हैं,  तालियां पीट सकते हैं,  ढीशूम-ढीशूम कर सकते हैं। एक संपूर्ण कलाकार को जीवन के विभिन्न रंगों में डूबता देखते हैं। साथ-साथ हिचकोले खाते हैं। अमिताभ बच्चन!! अमिताभ बच्चन!! गॉड ऑफ स्क्रीन,  वन मैन इंडस्ट्री, मेगा स्टार, लिजेंड, एक्टर ऑफ मिलेनियम...  सहस्त्राब्दी के नायक ...अमिताभ ने नायक की अवधारणा को बदलकर रख दिया ! 
 





गंगा किनारे वाले उस छोरे की लंबाई,  दुबले-पतले बदन, पतली-महीन  आवाज की शुरू में अनदेखी की गई, अस्वीकृत किया गया। बाद में वही आवाज एक सुंदर पहचान बन गई। बेमिसाल । अमिताभ का नाम देश-विदेश, गांवों-कस्बों, बस्ती-बस्ती में सुना जा सकता है। वे आमजन की वेदना, गुस्से-आक्रोश को कला के सांचे में ढाल देते हैं। दबे और दबाये हुए लोगों की आवाज को सिनेमाई अंदाज देते हैं और इस तरह जन-जन के मन में अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। लंबी-पतली टांगों, छरहरे बदन और डूबती हुई दूर तलक देखती गहरी आंखों को लोग सिर-माथे पर उठा लेते हैं। हाथों-हाथ लपक लेते हैं। दिल के कोनों और मन की अनंत गहराइयों में बिठा लेते हैं। उनकी हेयर स्टाइल,  पहनावे और संवाद और हर पहलू की नकल करते हैं।हां! अमिताभ सिनेमा-संसार के अद्भुत नक्षत्र हैं। विश्व मंच पर छा जाने वाले सुनहरे सितारें हैं, जिनकी एक छवि पाने के लिये इजिप्टियन महिलाएं इस कदर उतावली हो जाती हैं कि काइरो एयरपोर्ट 'डेंजर जोन ' बन जाता है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  नजीबुल्लाह उनके साथ अपनी ढेर सारी तस्वीरों के बदले फिल्म 'खुदा गवाह'  की शूटिंग के लिए फिल्म टीम को अफगान एयरफोर्स के लगभग आधे भाग का प्रबंध करवाते हैं। यहाँ तक की मुजाहिद्दीन भी उनकी करिश्मा से बच नहीं सके ।  और अपने वतन में उनकी प्रसिद्घि का यह आलम छाया होता है कि कुली (१९८२) की शूटिंग के दौरान  पुनीत इस्सर के प्रहार के कारण घायल हो जाने पर पूरे देश की सांसें थम जाती हैं। उनकी हर एक सांस देशवासियों की प्रार्थनाओं के साथ घुल-मिल जाती हैं। सलमान रुश्दी 'द सैटनिक वर्सेस'  में रेखा के स्क्रीन लवर के रूप में उन्हें इंगित करते हैं।  शशि थरूर और शोभा डे अपनी कहानियों में उन्हें उद्घृत और चित्रित करते हैं। प्रसिद्ध लेखक-गीतकार जावेद अख्तर उनकी भूमिका को संबोधित करते हैं- '....ऐसा गुस्सा जिसमें गरिमा हो, ऐसा आक्रोश जो दुखी करता हो और जिसमें आंसू हों।...'अमिताभ निर्विवाद रूप से हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे हैं।  सिनेमा आकाश के शिखर पुरुष । बॉक्स ऑफिस पर प्रभाव इतना गहरा रहा कि १९७० के दशक में उन्हें 'वन मैन इंडस्ट्री'  कहा जाता रहा।
हिंदी के प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन के बेटे अमिताभ बच्चन का जन्म इलाहाबाद में हुआ। दिल्ली के किरोरीमल कॉलेज से इन्होंने विज्ञान स्नातक की उपाधि ली। कलकत्ता से अभिनय में अपना भाग्य आजमाने बंबई गये।फिल्मी करियर में पहला ब्रेक के. ए. अब्बास की फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' से मिला। लेकिन फिल्म असफल रही। इसके पूर्व प्रख्यात फिल्मकार मृणाल सेन की क्लासिक फिल्म भुवन शोमे (१९६९) में वॉयस नैरेटर के रूप में काम किया। शुरुआती असफलताओं के बाद ऋषिकेश मुखर्जी की कुछ फिल्मों जैसे-'आनंद'  अभिमान और नमक हराम ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। १९७३ में फिल्म जंजीर  की अपार सफलता ने अमिताभ की एंग्री यंग मैन की छवि बना दी। एक ऐसा युवा नायक जो कानून को  हाथों में लेकर भी गलत कामों का बदला लेता है, वाली बनी उनकी अन्याय के खिलाफ आक्रोश जनित छवि ने उन्हें स्टारडम तक पहुंचाया। दीवार, शोले  त्रिशुल और शक्ति का क्रोध, कुंठा, गुस्से, आक्रोश और प्रतिशोध से भरा नायक युवा सपनों का प्रतिनिधि  बन गया। सलीम-जावेद ने १९७० के दशक में गुस्से को प्रदर्शित करती उनकी फिल्मों में एंग्री यंग मैन वाली भूमिका में जान डाल दी। अमिताभ के अभिनय को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- मनमोहन देसाई की वन मैन इंटरटेनर वाली फिल्में जैसे- कुली  और मर्द । यश चोपड़ा और प्रकाश मेहरा की मेनस्ट्रीम वाली सीरियस ड्रामा वाली फिल्में, जैसे- नमक हलाल, शराबी  और सिलसिला या ऋषिकेश मुखर्जी की अभिनय प्रधान फिल्में।  १९८४ में उन्होंने बाल सखा राजीव गांधी के कहने पर राजनीति की ओर रुख किया तथा इलाहाबाद से लोक सभा की सीट भी जीती। राजनीति की चक्करघिन्नी में वह एडज़स्ट  नहीं हो पाए । पर राजनीति  के बाद वाली फिल्मों में वह जादू नहीं रहा। बच गया बस जादुई यथार्थ  ! १९९० में अग्निपथ और हम की सफलता ने उन्हें फिर ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया। १९९२ के बाद फिल्मों से पांच साल का अवकाश लिया और सारा ध्यान अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल) पर केंद्रित रखा। १९९७ में फिल्म मृत्युदंड  से वापसी की। लेकिन यह फिल्म भी उनकी अन्य फिल्मों मेजर साब और सूर्यवंशम की तरह वह खोया हुआ आकर्षण वापस लाने में असफल रही। फिर भी, अमिताभ टेलीविजन के गेम शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में होस्ट की भूमिका से चाहनेवालों की लंबी फेहरिस्त से घिर गये। एक नया अवतार । जोश और जुनून । नये मिलेनियम की और नये दशक की शुरुआत के साथ अमिताभ नये अवतार में सामने आये और एक रिश्ता- द बॉण्ड ऑव लव, मोहब्बतें, अक्स, कभी खुशी कभी गम,  आंखें और हम किसी से कम नहीं जैसी कई प्रशंसनीय और प्रसिद्घ फिल्में की। उन्हें अनेक राष्टरीय-अंतर्राष्टï्रीय सम्मान मिलें हैं। मिलते चले जा रहे हैं । फिल्म फेयर अवार्ड , राष्टïरीय पुरस्कार। अंतरराष्टïरीय सम्मान। मानद डॉक्टरेट उपाधि।   नागरिक सम्मान। एशियन फिल्म पुरस्कार। फ्रांस सरकार का  सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेजन  ऑफ आनर।  लगातार प्रसिद्घि ने बीबीसी ऑनलाइन यूजर्स पोल’ की वोटिंग के जरिए इन्हें मिलेनियम ग्रेटेस्ट स्टार ऑव स्टेज और स्क्रीन से सम्मानित किया गया। कई हॉलीवुड नायकों को पछाडक़र । बीते सालों में  पा में ऑरो की अनूठी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ नायकका राष्टïरीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया है। सच! अमिताभ बच्चन मिलेनियम के नायक हैं। किसी परिचय के मोहताज नहीं। किसी नाम के गुलाम नहीं। कला को जीते हुये, अभिनय को जिंदा बनाये हुये। विविध आयामों वाली भूमिकाएं निभाते हुए एक संपूर्ण कलाकार! महानायक! पुरस्कार-सम्मान, प्रसिद्घि, लोकप्रियता... और नायकत्व अमिताभ के लिए अब लघु है। वे सिनेमा के इतिहास में स्थायी नायक बन चुके हैं। जीवेद् शरद: शतम्... अमिताभ।