प्रभाष जोशी
हिन्दी पत्रकारिता के शलाका पुरुष प्रभाष जोशी एक शक्तिशाली और प्रमुख सम्पादक-पत्रकार थे। 15 जुलाई, 1936 को जन्मे प्रभाषजी 5 नवंम्बर, 2009 को हमारे बीच नहीं रहे। भारत-आस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट मैच देखने के दौरान हृदय गति रूकने से उनका निधन हो गया था। वैचारिक और सरोकारी पत्रकार, समाज-चिंतक का औचक जाना खल गया था। उनके पाठकों-प्रशंसकों, शुभचिंतकों में ही नहीं , अपितु निंदकों में भी घोर शोक छा गया। सक्रियता के बीच खरी-खरी कहने वाले , लिखने वाले प्रभाष जोशी का चले जाना सबको खल गया ।
प्रभाषजी अचानक ही चले गए। मृत्यु बहाना लेकर आती है । क्रिकेट के
प्रति उनकी संवेदनशीलता के कारण भारत की पराजय मृत्यु का बहाना बन गया! किसी चीज के प्रति लगाव ---गहरी संवेदनशीलता -- जीवन से जुड़ जाती है ।
प्रभाषजी की अनुपस्थिति इसलिए भी काफी तकलीफदेह रही कि वे अपने आखिरी दौर में 'पैकेज पत्रकारिता' को लेकर काफी मुखर थे। पत्रकारिता के धतकरम के खिलाफ वह लोगों को सचेत कर रहे थे। एक 'एक्टिविस्ट' पत्रकार के रूप में सत्य, निष्पक्षता और निर्भीकता को बचाए जाने की उनकी कोशिश को जनसमर्थन भी मिला। उनसे लोगों की आशाएं थीं । पत्रकारिता के फिसलन-विचलन के खिलाफ जोरदार मुहिम चला रहे थे। बड़े -बड़े मीडिया घरानों के पत्रों एवं खबरिया चैनलों में 'पैसा दे दो, खबर ले लो, खबर दो, पइसा लो' की पुरजोर चलन के खिलाफ वे लगातार लिख और बोल रहे थे। कभी दिल्ली तो कभी पटना, बनारस, भोपाल ....... पूरे देश में वह पत्रकारिता के मूल्यों, सरोकारों के लिए अलख जगा रहे थे। जाने से एक दिन पहले ही पटना , बनारस ...और लखनऊ की यात्रा से लौटे थे ...। फिर उनका मणिपुर जाने का कार्यक्रम था । राजनीति , समाज , संस्कृति, अर्थनीति , विदेश संबंध , खेल ....प्रायः सभी विषयों पर उनकी कलम चली है । भाषा, शैली का वह प्रवाह दिल को छू तो जाता ही था , हमारे मनोमस्तिष्क को भी झकझोर भी जाता था । ताकतवर मीडिया घरानों, ‘सटोरियों’ तथा ’धनपशुओं’ के गठजोड़ का वैचारिक प्रतिरोध एक सत्साहसी मनीषी ही कर सकता है! उनके जाने के बाद न्यू मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर उनकी अनुपस्थिति से उपजे सन्नाटे और खालीपन की काफी चर्चा हुई। उनके घोर निंदकों ने भी उनके महत्व को ना-नुकुर करके महसूसा। लेकिन अनेक मीडिया घरानों ने जो पेड न्यूज के गुनाहगार हैं/रहे , उन्होंने प्रभाष जी को 'निबटाने’ की गलतफहमी पाल ली! मानों उनके भौतिक शरीर के साथ वह मुद्दे खत्म हो गयो हों जो प्रभाष जी ने उठाये थे । तभी तो ‘विश्व का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला हिन्दी दैनिक‘ उनकी मृत्यु की दो-चार लाईन में खबर देकर बदला चुकाया! कितना विश्वास है अपने पूंजी बाजार पर सर्वाधिक पढ़े जाने वाले दैनिक का कि वह प्रभाष जोशी को सिर्फ दो तीन लाइन में निबटाकर 'पेड न्यूज' के खिलाफ उनकी मुहिम का वह बदला लेता है! प्रसिद्ध कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी के शब्दों में ‘प्रभाष जी गांधीवादी निर्भयता के आखिरी प्रवक्ता थे।’ पत्रकारिता और जीवन में नैतिकता और पारदर्शिता के मुखर प्रभाव समर्थक प्रभाष जी अपनी गांधीवादी सोच और निर्भयता के कारण ही खबर के धन्धे और सच बेचे जाने के खिलाफ भारतीय प्रेस परिषद से लेकर जनता के बीच पत्रकारिता बचाने की लड़ाई लड रहे थे। उनकी चिन्ता के केन्द्र में था पत्रकारिता का वह मूल्य जो किसी भी प्रकार के शोषण , भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता की ओर से जुझता है। जनसता 1983 के संस्थापक-सम्पादक के रूप में उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता में भाषा और प्रस्तुति के नये संस्कार दिये। ' जनसता' के सुनहरे पृष्ठों पर प्रभाष जी के किये-धरे की गहरी छाप है। 'सबकी खबर ले , सबको खबर दे' के संकल्प के साथ उन्होंने पत्र को मिशनरी बना दिया । अंगे्रजी पत्रकारिता में सता के प्रतिरोध की जो अलख ‘इडियन एक्सप्रेस’ ने जगाई , वही हिन्दी में काफी हद तक जनसता ने। प्रभाष जी इंडियन एक्सप्रेस के भी अदमदाबाद, चण्डीगढ, दिल्ली संस्करण के स्थानीय सम्पादक रहे। उनकी बेबाकी, निडरता के साथ भाषा और शिल्प हर किसी को अपनी ओर खीचता है। ‘नई दुनिया‘ से अपने करियर की शुरूआत करने वाले प्रभाष जी की भाषा मालवा की सोंधी माटी से सिंचित थी। तभी तो वह जो कुछ लिखते थे उसमें जीवन की आहट थी। भूदान आन्दोलन से गहरे जुड़े प्रभाष जी जो कुछ लिखे साहस और बेवाकी से लिखें । सता से टकराने का और जनता की ओर से सवाल करने का उनके पास सत्साहस था। वह सत्ता के प्रतिपक्ष थे ---पत्रकारिता की असल धर्म की तरह । क्रिकेट प्रेम, सचिन तेंदुलकर प्रेम, सती प्रथा, ब्राह्मणवाद आदि के मुददे पर काफी सवाल किये गये। साहित्य-पत्रकारिता के दिग्गजों एवं तेजस्वी पत्रकारों ने उन पर काफी सवाल किये गए। उन पर जोरदार बौद्धिक हमले किए। लेकिन प्रभाष जी कभी सुरक्षात्मक नहीं रहे! वे हमलों का जवाब ‘डिफेंसिव' होकर नहीं बल्कि तर्को एवं विचारों से देते थे। यह भी सच है कि हिन्दी पत्रकारिता को उन्होंने 'जनसता' के माध्यम से कई तेजस्वी युवा पत्रकार दिये। ऐसा नहीं कि प्रभाष जोशी कोई देवता थे । आलोचना से परे थे । उनका सब कुछ लिखा - बोला आँख मूद कर स्वीकर्य है ! कई बार वे इन पंक्तियों के लेखक को भी वे खुन्नसी और अतिवादी लगे ! जी हाँ , प्रभाष जी की परम्परा यह नहीं है कि उन्हें देवता बनाकर पूजा जाये। उनकी परम्परा सवाल करने की परम्परा थी। वे प्रतिपक्ष थे । जीवन में घनघोर आस्तिक और कर्मकांडी होने के बावजूद पत्रकारिता एवं बौद्धिकता की दुनिया में किसी को देवता बनाने के विरोधी थे। 'हिन्दू होने का धर्म' उनकी महत्वपूर्ण चिन्तन पुस्तक है जिसमें हिन्दू धर्म के मूल पक्षों को एवं इसकी गहराई को अभिव्यक्त किया गया है। बनारस में मैं उनसे कहा कि आपने 'हिंदुत्व' को बचा लिया ! धर्म के असल को प्रखरता से रखा । प्रभाष जी को संतोष मिला , ख़ुशी हुई मेरी पाठकीय टिप्पणियों से । ‘हद से अनहद गये' प्रभाष जोशी स्मृति संचयन उन पर केन्द्रित है। '2 1 वीं सदी : पहला दशक' और 'आगे अंधी गली है ' उनके लेखों का संग्रह है। जनसता के रविवार अंक में उनके स्तम्भ 'कागद कारे’ को खोज-खोज कर पढ़ा जाता था। 'कागद कारे' में देश-विदेश, समाज-संस्कृति , राजनीति के विविध पक्षों पर लिखे को काफी पढ़ा जाता था। राजेन्द्र यादव जैसा लिक्खाड़ साहित्यकार-विचारक भी भले ही प्रभाष जी के विचारों से सहमत न हो लेकिन उनके लिखे को नियमित पढ़ता था। राजेंद्र जी एक बडे जीवनधर्मी-जनधर्मी साहित्यकार हैं, अपनी भाषा के लिए जाने जाते हैं। वे स्वयं प्रभाष जी की बोलती हुई भाषा के प्रशंसक रहे हैं। साहित्य, कला-संस्कृति सभी क्षेत्रों में प्रभाष जी का विशेष प्रभाव था। वे बहुत बड़े समाज चिन्तक थे। वे सता शीर्ष पर आसीन शख्सियत के आंख में आंख डालकर बात करने वाले , लिखने वाले और बोलने -बतियाने वाले पत्रकार थे। खबरों को जानने की उनमें एक अजीब सी भूख थी। अपने रिपोर्टर को तरासने वाले वे एक ऐसे सम्पादक थे जो खबर ही नहीं पूरे संदर्भ का नब्ज पकड़ना चाहते हैं । वह अपने रिपोर्टरों को खोज-बीन के दौड़ाते रहते थे। प्रोत्साहित करते थे । लेखनी ही नहीं उनके सोच में भी बड़ी गहराई थी। आज के डेढ दशक पहले वे दलित, नक्सली जैसे मुददों पर, व्यवस्था परिर्वतन पर रिर्पोटरों से मेनहत कराते थे। टीवी पत्रकार-एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी को उन्होंने 1 8 --2 0 साल पहले नागपुर में संघ, दलित, नक्सल को लेकर व्यवस्था परिवर्तन सम्बंधी काम भी दिया था। इस तरह वे अपने युवा दोस्तों से ठोक-बजा कर काम करवाते थे। बाजारवाद के सच को बयां करने का उनका तरीका काफी सुचिंतित था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में उनको बाजारवाद पर सुनने को मौका मिला था। 'तीसरी दुनिया के देशों में ज्ञान एवं संस्कृति के समक्ष चुनौतियां' विषयक संगोष्ठी में प्रभाष जी ने बाजारवाद के कई सवालों एवं संदर्भो को रोचक तरीके से रखा। बोलने की ही तरह लिखना .... उन्हें सुनना अद्भुत अनुभव रहा । प्रभाष जी ने कहा था कि बाजार की संस्कृति हमें मिल बैठकर रहने और किसी भी चीज की सामूहिक उपभोग से मना करती है। यह संस्कृति नहीं चाहती कि हम मिलजुल कर, आपस में बांट कर रहें, खायें क्योंकि इससे उनका सामान नहीं खपेगा। इस बाजार तंत्र में संबंधों की पवितत्रा में भीतर देखने की मनाही है क्योंकि उनके यहां इसका का भी बाजार मूल्य है। ऐसे में संबंधों की पवितत्रा को मानने के बजाए पैसे से आंकने का आग्रह बढ़ा है। ब्रह्म की जगह पूंजी ने ले ली है और मोक्ष की जगह मुनाफे ने। उनका यह भी माना था कि आज के सिनेमाई और खेल जगत के रोल माँडल जब 'ठण्डा मतलब कोका कोला' और हर घर में कोला का गुणगान करते हैं और यह बच्चों में संदेश देते हैं कि हमेशा घर में ठण्डा रखो पता नहीं ब्रह्म की तरह कब महानायक घर में प्रकट हो जाए। प्रभाष जी का कहना था कि तीसरी दुनिया में नव साम्राज्यवादी शक्तियां बाजार तंत्र के माध्यम से अपना वर्चस्व स्थापित कर रही हैं। पहले समाज तय करता था कि बाजार कैसा होगा जबकि आज बाजार तय करता है कि हमारा समाज कैसा होगा। उपभोक्तावादी संस्कृति में उत्पाद हावी होगा तो संस्कृति विलीन होगी। समाचार पत्रों की भूमिका को लेकर उनका कहना था कि हम लोग गांधी को ही विकल्प का विषय मानते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से अखबार यह मानने लगें हैं कि इसका कोई विकल्प नहीं है। नवउदारवाद , बाजार और भूमंडलीकरण की स्वार्थी संस्कृति पर उन्होंने काफी बोला -लिखा । सिंगूर- नंदीग्राम , जबरिया भूमि अधिग्रहण प्रकरण पर उनके लिखे को देखें- ''खेती करना पिछड़ापन क्यों और कारखाना चलाना विकास कैसे है? क्योंकि खेती में कभी उतनी कमाई नहीं होती जितनी कारखाने में हो सकती है ...हमें भारत को अमेरिका बनाना है । इसे खेती की बजाय उद्योग की अर्थव्यवस्था बनाना है । कोई बात नहीं अगर ऐसा करने में अपनी खेती और लगभग पांच हजार साल की संस्कृति और उससे निकली जीवन पद्धति बरबाद हो जाए । '' एक मौलिक चिंतक के रूप में उन्होंने 11 सितंबर को अमेरिका पर हुए हमले के बाद बुश के इस कथन का कि '....या तो आप हमारे पक्ष में हैं या आतंक के ...' को उन्होंने कलम और कागद के मोर्चे पर बेनकाब किया - ''अमेरिका पर हमला हो तो संसार पर हमला क्यों हो जाता है और भारत पर हमले होते रहें तो वे स्थानीय लोगों की आजादी की लडाई कैसे हो जाती है ? और पश्चिम पर हमले हों तो वे सभ्यता पर हमले क्यों हो जाते हैं और भारत पर हमले भिन्न राष्ट्रीयता वाले लोगों की कामना कैसे हो जाते हैं । अमेरिका संसार है इसलिए उस पर हमला संसार पर हमला है । पश्चिम सभ्यता है इसलिए पश्चिम पर हमला सभ्यता पर हमला कहलाता है । भारत के लोगों ने इस चमत्कार को समझने की कोशिश कभी क्यों नहीं की ? " और अपना धंधा यांनी मीडिया प्रभाष जी यहाँ भी खरी-खरी कहते हैं ---" अब हमारा कोई बड़ा अख़बार बड़ी पूंजी और बड़ी कम्पनियों के हितों के खिलाफ नहीं लिखता । भले ही वे इस देश के आम लोगों के बुनियादी हितों को चोट पहुंचाते हों । गनीमत यही है अब तक इन अखबारों ने लिखा नहीं कि बड़ी पूँजी और कम्पनियों के हित ही आम लोगों का हितवर्धन करते हैं और इसलिए समाजसेवियों को उनके पीछे पड़ने की बजे उनके फलने-फूलने का माहौल बनाना चाहिए । '' प्रभाष जी को याद करने का अर्थ है कि उनकी निर्भयता, जनपक्षधरता और सरोकारों को जिन्दा रखा जाये। 'खबर देना ही नहीं, खबर लेना भी' पत्रकारिता का काम है। यही तो उन्होंने सिखाया।
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Monday, July 15, 2013
प्रभाष जोशी होने का अर्थ
Friday, July 12, 2013
एक खलनायक जो नायक था ...
1920-2013
खलनायक ‘खल’ छवि वाले नायक होते हैं। खलनायक ऊर्जा, उत्तेजना और भावावेग का समग्र होते हैं जो नायक को संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं। नायक को नायक बनाते हैं। खलनायक वह अंधेरी रात है, जिस पर विजय पाकर ही नायक चमकता है। विजय का प्रकाश ! फिल्मों में खलनायकों का होना फिल्मों को एक नये हौसले से भर देता है। भारतीय सिनेमा में खलनायक दर्शकों का उत्साह, जोश-खरोश और छिपी भावनाओं की अभिव्यक्ति बनकर उभरते हैं। दर्शक नायक बन जाते हैं। ‘मार दो साले को....’, ‘और मारो.... और पीटो...’ जैसी आवाजों, सीटियों, तालियों के बीच दर्शक अपनी सीटों से खड़े हो-होकर हौसलाआफजाई के क्रम में सिनेमाघर को हो-हल्ले से भर देते हैं । इस तरह खलनायक एक अदम्य वेग का संचार कर देते हैं। हारकर और पीटकर दर्शकों में विजय भाव भर देते हैं। कभी-कभी प्राण जैसे खलनायक सकारात्मक भूमिकाओं से खलनायक- नायक की नई छवि रच डालते हैं। 2010 में सीएनएन ने उन्हें एशिया के शीर्ष 25 सर्वकालिक अभिनेताओँ में रखा । 'विल्लैन ऑफ़ दी मिल्लेन्नियम ' ...। प्राण सबके चहेते रहे हैं । 90 ' पार प्राण हिंदी सिनेमा के लिजेंड रहे हैं ।
प्राण साहब! यह फिल्म इण्डस्ट्री द्वारा उन्हें दिया गया सम्मान का नाम है। उनकी प्रभावी कला से आकर्षित लोग अपने बच्चों का नाम प्राण रखने लगे। उनका पसंदीदा शब्द ‘बरख़ुरदार’ लोगों की जुबान पर छा गया। प्राण साहब ने हिंदी फिल्म इण्डस्ट्री में छह दशक लंबा कॅरियर तय किया और ‘विलेन ऑफ द मिलेनियम’ से नवाजे गये। बड़ी बहन (1949), आह (1953 ), बिराज बहू (1954) , ‘हलाकू’ (1956), ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960), ‘विक्टोरिया नं. 203’ (1972), 'कश्मीर की कली ' (1964),‘उपकार’ , (1967), ‘पूरब और पश्चिम’, ‘जंजीर’ (1973), ‘अमर अकबर एंथनी’ (1977), और ‘डॉन’ (1978) जैसी यादगार फिल्में कर प्राण चाहनेवालों के जहन में बस गये।
हिंदी सिनेमा के सर्वाधिक मशहूर खलनायकों में एक प्राण कृष्ण सिकंद अपनी स्थिर आवाज, संकरी आंखों और हाव-भाव के विविधतापूर्ण प्रदर्शन के दम पर हिंदी सिनेमा के परिदृश्य पर छा गये।
इनका जन्म एक संपन्न सिविल कॉन्टै्रक्टर के घर दिल्ली में हुआ। पिता का स्थानांतरण कई जगहों पर होता रहता था। इसी क्रम में प्राण ने अपना मैट्रिकुलेशन मेरठ से पूरा किया और फिर लाहौर में एक फोटो स्टूडियो के मैनेजर की तरह काम करने लगे। फिल्म लेखक मोहम्मद वाली के साथ उनकी एक आकस्मिक मुलाकात ने प्राण को पंजाबी फिल्म ‘यमला जाट’ (1940) में एक भूमिका निभाने का अवसर दिया। इसके बाद ‘चौधरी और खजांची’ जैसी फिल्मों ने इन्हें अजीत और के.एन.सिंह की तरह खलनायक की पहचान दिलाई। निर्माता दलसुख पंचोली ने ‘खानदान’ में नूरजहां के साथ मुख्य भूमिका दी।
फिल्म की सफलता ने प्राण को स्टार बना दिया। ‘खानदान’ की सफलता के बाद मिली हीरो की भूमिकाओं को इन्होंने अस्वीकार कर दिया, क्योंकि एक हीरो की तरह नाचने-गाने में असहज महसूस करते थे। 1947 में देश विभाजन के बाद प्राण बंबई चले आये। लाहौर में स्टार छवि के बावजूद भारतीय फिल्म राजधानी में काम ढ़ूंढऩे में नाकामयाब हो रहे थे कि लेखक सद्दात हसन मंटो और अभिनेता श्याम की मदद से बॉम्बे टॉकिज की फिल्म ‘जिद्दी’ में रोल मिल गया। फिल्म सफल रही। ‘गृहस्थी’, ‘अपराधी’ और ‘बड़ी बहन’ लगातार सफल फिल्में रहीं। अगले दो दशकों तक अपनी ब्लॉक बस्टर फिल्मों के साथ प्राण छाये रहे। जिनमें शामिल हैं- ‘आजाद’, ‘मधुमती’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’ तथा ‘राम और श्याम’।
अपनी भूमिकाओं में पेशेवर प्राण अपने कॉस्ट्यूम और मेक-अप का खास ध्यान रखते थे। अपनी हर फिल्म में विविध चरित्रों को रचते प्राण की हर फिल्म दिलकश अदाकारी से भरी होती। 1960 के पूर्व वर्षों में इन्होंने व्यंग्यात्मक खलनायकी का सूत्रपात ‘हाफ टिकट’ और ‘कश्मीर की कली’ जैसी फिल्मों से किया। मनोज कुमार की ‘उपकार’ में मलंग बाबा के रोल से इन्होंने नाटकीय छवियों संग अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा। इस तरह की उनकी नई छवि वाली अन्य सफल फिल्में ‘जंजीर’, ‘कसौटी’ और ‘विक्टोरिया नं. 203’ रहीं।
प्राण की बायोग्राफी के नामित शब्द हैं ‘.....और प्राण’। यह इसलिये क्योंकि उनकी अधिकतर फिल्मों में कास्टिंग में उनका नाम ‘....और प्राण’ या कभी-कभी ‘‘...सबसे ऊपर प्राण’’ जैसे शब्दों में होता था। यह फिल्मकारों का उन्हें क्रे डिट और सम्मान देने का तरीका था। प्राण साहब का स्टाइलिस्ट अंदाज और विविध आयामों वाली उनकी छवि उन्हें औरों से अलग बनाती है। सकारात्मक सोंच वाले खलनायकों की उनकी भूमिका ने नई छवियां गढ़ी। 1970 के दशक में उनका कॅरियर अपने चरम पर था। फिल्म ‘डॉन’ में प्राण को अमिताभ बच्चन से कहीं अधिक पैसे मिले थे।
प्राण को उनकी बेहतरीन अदायगी के लिए कई पुरस्कार सम्मान मिले, जिनमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए तीन फिल्म फेयर पुरस्कार सहित नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ भी शामिल है।
अमिताभ बच्चन ने बहुत सही कहा है कि 'चाहे तकनीक बदल जाएं, सिनेमा बदल सकता है, लेकिन प्राण हमेशा सिनेमा में योगदान के लिए याद किए जाते रहेंगे, प्रेरणा देते रहेंगे।' जी हाँ, प्राण होने का यही मतलब है । फिल्म की सफलता ने प्राण को स्टार बना दिया। ‘खानदान’ की सफलता के बाद मिली हीरो की भूमिकाओं को इन्होंने अस्वीकार कर दिया, क्योंकि एक हीरो की तरह नाचने-गाने में असहज महसूस करते थे। 1947 में देश विभाजन के बाद प्राण बंबई चले आये। लाहौर में स्टार छवि के बावजूद भारतीय फिल्म राजधानी में काम ढ़ूंढऩे में नाकामयाब हो रहे थे कि लेखक सद्दात हसन मंटो और अभिनेता श्याम की मदद से बॉम्बे टॉकिज की फिल्म ‘जिद्दी’ में रोल मिल गया। फिल्म सफल रही। ‘गृहस्थी’, ‘अपराधी’ और ‘बड़ी बहन’ लगातार सफल फिल्में रहीं। अगले दो दशकों तक अपनी ब्लॉक बस्टर फिल्मों के साथ प्राण छाये रहे। जिनमें शामिल हैं- ‘आजाद’, ‘मधुमती’, ‘जिस देश में गंगा बहती है’ तथा ‘राम और श्याम’।
अपनी भूमिकाओं में पेशेवर प्राण अपने कॉस्ट्यूम और मेक-अप का खास ध्यान रखते थे। अपनी हर फिल्म में विविध चरित्रों को रचते प्राण की हर फिल्म दिलकश अदाकारी से भरी होती। 1960 के पूर्व वर्षों में इन्होंने व्यंग्यात्मक खलनायकी का सूत्रपात ‘हाफ टिकट’ और ‘कश्मीर की कली’ जैसी फिल्मों से किया। मनोज कुमार की ‘उपकार’ में मलंग बाबा के रोल से इन्होंने नाटकीय छवियों संग अपनी प्रतिभा का जलवा बिखेरा। इस तरह की उनकी नई छवि वाली अन्य सफल फिल्में ‘जंजीर’, ‘कसौटी’ और ‘विक्टोरिया नं. 203’ रहीं।
प्राण की बायोग्राफी के नामित शब्द हैं ‘.....और प्राण’। यह इसलिये क्योंकि उनकी अधिकतर फिल्मों में कास्टिंग में उनका नाम ‘....और प्राण’ या कभी-कभी ‘‘...सबसे ऊपर प्राण’’ जैसे शब्दों में होता था। यह फिल्मकारों का उन्हें क्रे डिट और सम्मान देने का तरीका था। प्राण साहब का स्टाइलिस्ट अंदाज और विविध आयामों वाली उनकी छवि उन्हें औरों से अलग बनाती है। सकारात्मक सोंच वाले खलनायकों की उनकी भूमिका ने नई छवियां गढ़ी। 1970 के दशक में उनका कॅरियर अपने चरम पर था। फिल्म ‘डॉन’ में प्राण को अमिताभ बच्चन से कहीं अधिक पैसे मिले थे।
प्राण को उनकी बेहतरीन अदायगी के लिए कई पुरस्कार सम्मान मिले, जिनमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए तीन फिल्म फेयर पुरस्कार सहित नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ भी शामिल है।

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