Thursday, July 19, 2012

...हमने चाँद सुनहरा देखा ---



                                                                     1942--2012




 " बाबू मोशाय  !  जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं ।"


"अरे ओ बाबू मोशाय ! हम तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में हैं , कब , कौन , कहाँ उठेगा ये कोई नहीं जनता । "


 ये संवाद दरअसल दर्शन है जीवन का .. सशक्त अभिनेता और कला सर्जक 'सुपरस्टार'  राजेश खन्ना के बोले सम्वाद आज भी हमें सुकून देते हैं , जीवन को परिभाषित करते हैं ।
अब वे नहीं हैं ...उनका भौतिक शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया है । 'आनंद' में मौत और जीवन के फलसफे को हंसी-खेल , मस्ती , खिलंदडपने से जीने वाले आनंद यानि राजेश खन्ना जिंदगी को बड़ा अर्थ देते हैं । उनकी  मौत पर आज भी दर्शक रो देते हैं ,  आखें छलछला जाती हैं । लेकिन आनंद मरते नहीं ...। उदासी में जीवन को अर्थ देते हैं ...
 उनके चाहने वाले उनसे दूर नहीं थे , नए 'ज़माने' में भी --यह अब बखूबी पता चल रहा है जबकि वे हमसे शारीरिक रूप से दूर हो गए हैं । उनके 'फैन्स' उनसे जुदा नहीं हो सकते ! उनके फैन्स उनके ही रहेंगे ...यही तो उन्होंने पंखे वाले विज्ञापन में कहा । उनके जाने के बाद  देश -विदेश में प्रशंसकों की उदासी और मुंबई में उमडन इस बात की परिचायक है कि  चाहने वाले के दिलो -दिमाग में वे रचे -बसे थे 
  राजेश खन्ना अपने मासूम और सुंदर अभिनय में प्रेम रचते हैं ... रोमांस की गाथा रचते  हैं ...रोमांस का पर्याय बन जाते हैं । लाखों दिलों को प्रेम की मीठी सुगंध से सिक्त करते हैं। उनकी अनेक फिल्में आज भी हर उम्र के दर्शकों को बांध देती हैं । प्रेम ,  रोमांस , भावुकता , उदासी ...राजेश हर जगह विशिष्ट हैं ।


     ''अम्मा की उस कहानी का नायक कोई राजकुमार नहीं, फूल-पत्तियाँ बेचने वाला माली था। माली गुलाबी पंखुडिय़ों सी रंगत और चमकती आँखों वाला था। उसकी मदमस्त हँसी में कोई भाव ऐसा था कि लोगबाग खिंचे चले आते। हमउम्र लड़कियाँ उसके फूल बालों में सजातीं। लड़कियां माली की ढोलक की थाप पर नाच उठना चाहतीं। माली फूल-पत्तियों पर टपकी ओस की बूंदों को सबके होंठों पर सजा देता। लोग मंत्रमुग्ध- से उसे निहारते। माली सतभइया झरनों का मीठा जल अपनी डलिया में ला सकता था। माली झरनों के रखवाले राक्षस से लडक़र उसके गले में बंधी कंठी फोड़ सकता था। माली कमल-फूल में कैद राजकुमारी को राक्षस के चंगुल से छुड़ा सकता था। हाँ-हाँ, सबके दिलों में राज करने वाले नायक ऐसे ही होते हैं। युग बदला और धीरे-धीरे अम्मा की कहानियों में कैद नायक फिल्मी पर्दे पर छाने लगे। वे सितारे बन गये। उनकी अदायें मन-मोहने लगीं। उनकी छवियाँ आदर्श छवियाँ बन गईं। लोग उनकी नकल उतारने लगे। नायकों की देहों पर सजने वाले कपड़े पहनने लगे। वैसे ही बाल संवारने लगे। उन्हें स्टार- सुपरस्टार के तमगों से नवाजने लगे। उनके फैन्स होने की बात कर गर्व से भरने लगें। राजेश खन्ना सडक़ों पर अपने चाहने वालों से घिरे रहने वाले ऐसे ही सुपरस्टार रहे जिनकी हर अदा को दर्शकों ने सराहा। ऐसी रोमांटिक अदायें बिखेरीं कि लड़कियां उनके नाम का सिंदूर सजाने लगीं। अपने खून से उन्हें खत लिखने लगीं। अपनी दमदार ऐक्टिंग और रोमानी हाव-भाव से राजेश खन्ना बहुरंगी छवियों में एक प्रतिनिधि नायक बन गये।''


                               
 राजेश खन्ना यानी जतिन खन्ना का  जन्म (29 दिसंबर , 1942 --18 जुलाई २०12) अमृतसर को  हुआ। परवरिश निस्संतान माता-पिता ने की, जो इनके  माता-पिता के रिश्तेदार थे। स्कूली शिक्षा संत सेवेस्टियन गोअन हाई स्कूल, गिरगाँव से पूरी की, जहाँ रवि कपूर (बाद में जितेन्द्र) भी पढ़ते थे। धीरे-धीरे जतिन खन्ना का मन थियेटर की ओर आकृष्ट हुआ । स्कूल तथा कॉलेज के दिनों में कई नाटक किये। युवा दिनों में उनका प्रेम-प्रसंग फैशन डिजाइनर और अभिनेत्री अंजू महेंद्रू के साथ हुआ, जो कि सात वर्षों तक चला। बाद में षोडषी डिंपल कपाडिय़ा के साथ 1973 में विवाह कर लिया। चट मंगनी पट व्याह के तर्ज पर सुपरस्टार राजेश डिम्पल के हो गए।  इनकी दो बेटियां हुईं-ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना। 
1965 में युनाइटेड प्रोड्यूसर और फिल्मफेयर द्वारा आयोजित ऑल इंडिया टैलेन्ट कॉन्टेस्ट में दस हजार प्रतिभागियों के बीच राजेश खन्ना का चयन अंतिम आठ में हुआ। इन्होंने कॉन्टेस्ट जीत लिया और जी.पी. सिप्पी तथा नासिर हुसैन के साथ अपनी पहली फिल्में साइन कीं। 1966 में चेतन आनंद निर्देशित फिल्म ‘आखिरी खत’ और रविन्द्र दावे निर्देशित ‘राज’ की जो कि टैलेन्ट कॉन्टेस्ट का एक हिस्सा थीं। यूनाइटेड प्रोड्यूसरों के साथ उन्हें ‘औरत,’ ‘डोली’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी फिल्में मिलीं। इसके बाद ‘बहारों के सपने’ और ‘अराधना’ आई। ‘अराधना’ ने इन्हें राष्ट्रीय ख्याति दिलाई और फिल्म आलोचक राजेश को भारत का पहला सुपरस्टार कहने लगे। राजेश ने शर्मिला टैगोर, आशा पारेख, मुमताज, हेमा मालिनी तथा टीना मुनीम जैसी अभिनेत्रियों के साथ कई सामाजिक और रोमांटिक फिल्में कीं। 80 के दशक में इन्होंने शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, पूनम ढिल्लो आदि के साथ भी काम किया।
 अपने करियर के शीर्ष पर पहुँचकर राजेश की प्रसिद्धि इतनी अधिक थी कि सडक़ों पर भीड़ से घिर जाते। फैन्स सडक़ों के किनारे उनके नाम का शोर मचाते खड़े रहते और उनकी कार तक को चूमते। महिलायें खून से लिखे खत भेजतीं। प्रोड्यूसरों और चाहनेवालों की गाडिय़ां उनके बंगले के बाहर लगी रहतीं। महमूद ने भी अपनी फिल्म ‘बॉम्बे टू गोवा’ में उनकी लोकप्रिय छवि का उपयोग किया और फिल्म में बस के ड्राइवर और कंडक्टर का नाम ‘राजेश’ तथा ‘खन्ना’ रखा। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि लड़कियां अपनी अंगुली काटकर खून का सिंदूर बना उनके फोटोग्राफ्स से ही शादी करने लगीं।
1970 में किशोर कुमार द्वारा गाये गये बहुतेरे गीत राजेश खन्ना के लिये ही थे। फिल्म ‘आराधना’ का गाना ‘मेरे सपनों की रानी....’ अपने समय का सबसे लोकप्रिय गाना रहा। आज भी यह गीत हमें झूमता है 
बीबीसी ने राजेश खन्ना पर 1974 में फिल्म ‘बॉम्बे सुपरस्टार’ बनाई। वहीं बॉम्बे यूनिवर्सिटी द्वारा ‘द कैरिज्मा ऑफ राजेश खन्ना’ नामक लेख प्रकाशित किया गया। राजेश की फिल्मों में अच्छी म्यूजिक का खास आकर्षण रहा। एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इनके लिये कई गाने कंपोज किये। राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर. डी. वर्मन की जोड़ी ने कई हिट फिल्में दीं। जिनमें शामिल हैं- ‘अमर प्रेम’, ‘अपना देश’, ‘मेरे जीवन साथी’, ‘आप की कसम’, ‘कटी पतंग’, ‘नमक हराम’, ‘फिर वही रात’, ‘आँचल’, ‘कुदरत’, ‘आवाज’, ‘हम दोनों’, ‘अलग-अलग’ जैसी और भी कर्ई फिल्में। 1969 से 1972 के बीच राजेश खन्ना ने 15 लगातार हिट फिल्में कीं, जो कि भारतीय सिनेमा में अब भी एक ना टूटने वाले रिकॉर्ड की तरह बरकरार है। हालांकि 1976-78 का दौर उनके लिए अच्छा नहीं रहा। कई फिल्में पिट गई। फिर भी खन्ना के जोश-खरोश में कमी नहीं आई और 1979 से ‘अमरदीप’, ‘फिर वही रात’, ‘बंदिश’, ‘दर्द’, ‘कुदरत,’ ‘धनवान’ जैसी अनेक यादगार हिट फिल्में दीं। उनकी फिल्मों में साथ-साथ काम करने वालों में मुख्यत: अशोक कुमार, सुजीत कुमार, प्रेम चोपड़ा, मदन पुरी, आसरानी, बिंदू, विजय अरोड़ा, रूपेश कुमार और ए.के.हंगल रहे जिन्होंने एक टीम की तरह 1980 के अंतिम दशकों तक साथ काम किया। लीड रोल में राजेश की शक्ति सामंता की फिल्में, पंचम के संगीत और आनंद बख्शी की लिरिक्स के साथ वाली फिल्मों पर लोग टूट से पड़ते। 1990 के शुरुआती दिनों से इन्होंने अभिनय करना छोड़ दिया और 1991-96 तक दिल्ली के एम. पी. रहे और राजनीति से जुड़े। 1994 में फिल्म ‘खुदाई’ के साथ फिल्मों में वापसी की। 1999 में ‘आ अब लौट चलें’ और 2002 में ‘क्या दिल ने कहा’ की। सितम्बर 2007 से इन्होंने कई नई फिल्मे और टेलीविजन सीरियल साइन किये। इन्होंने रविन्द्र संगीत आधृत एक एलबम में मुफ्त काम किया। राजेश ने अनेकों टीवी कार्यक्रमों में काम किया तथा एक नई पहचान बटोरी। 2009 में उनके 67वें जन्मदिन पर शेमारु एंटरटेनमेंट ने उनकी फिल्मों और गानों का ‘स्क्रीन लिजेंड्स 'राजेश खन्ना- द ओरिजीनल सुपरस्टार’ के नाम से एक कलेक्शन रिलीज किया। राजेश खन्ना ने कई फिल्मफेयर अवार्ड जीते -1971 ‘सच्चा झूठा’ 1972- ‘आनंद’ 1975- ‘आविष्कार’ के लिए सर्वोच्य अभिनेता का , 1990- फिल्म इंण्डस्ट्री में पच्चीस सालों के योगदान के लिए, 2005- फिल्मफेयर लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड  इसके अतिरिक्त कई बालीवुड अवार्ड, सैन्सुई फिल्म अवार्ड, ऑल इंडिया क्रिटिक्स एशोसिएशन अवार्ड तथा अन्य अवार्डों से भी सम्मानित किए गए।
 राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के नायकों की छवि हैं।  सामाजिक, राजनीतिक, प्रेम कहानियों के हीरो हैं जो दीवाना कर जाते हैं। अपनी कहानियों में राजेश ऐसे भाव उत्पन्न करते हैं कि साधारण-सी भूमिका भी उत्कृष्ट बन जाती हैं और दर्शक उनकी भूमिकाओं में स्वयं को तलाशने लगते हैं। इस तरह बन जाते हैं सभी अपनी-अपनी जिंदगियों के नायक।






 राजेश के बारे में --

‘‘भारतीय सिनेमा में ‘सुपरस्टार’ शब्द का ईजाद ही    उनके लिए हुआ’’- अमिताभ बच्चन



‘‘राजेश भगवान थे। ऐसा हिस्टीरिया कभी नहीं हुआ’’-  मनोजित लाहिरी   

राजेश जब भी मद्रास के एक होटल में जाते आधी रात  के समय 600 लड़कियों का समुह उनके इंतजार में होता’’- मुमताज
  1970 के दशक में कौन उनका फैन नहीं था? मुझे ‘अराधना’, ‘अमर प्रेम’, ‘कटी पतंग’ के लिए लाइन    में खड़े रहना आज भी याद है’’ - अक्षय कुमार  


यह भगवान के वरदान की तरह था कि हम उनके लिए हिट गानों की वृहद कडिय़ा लेकर आयें’’ -   प्यारेलाल
          राजेश खन्ना ने कई फिल्मफेयर अवार्ड जीते जो हैं-
1971- ‘सच्चा झूठा’ के लिये सर्वोच्च अभिनेता का
1972- ‘आनंद’ के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1975- ‘अविस्कार’ के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1990- फिल्म इंण्डस्ट्रीज में पच्चीस सालों के योगदान के लिए
2005- फिल्मफेयर लाइफटाइम अचिवमेंट आवार्ड
 बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एशोसियेशन अवार्ड भी मिलें जो हैं-
1972 में आनंद के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1973 में बावर्ची के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1974 में नमक हराम के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1987 में अमृत के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
2009 का लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड, चीन
2009 का ऑल इंडिया फिल्म वर्कर्स एशोसियेशन लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड
2010 का इंटरनेशनल पुने फिल्म फेस्टीवल में लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड
इसके अतिरिक्त कई बालीवड अवार्ड, सैन्सुई फिल्म अवार्ड, ऑल इंडिया क्रिटिक्स एशोसिएशन अवार्ड तथा अन्य अवार्डों सहित 1995 में कला रत्न से भी सम्मानित किए गए।

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