Thursday, October 11, 2012

अमिताभ: एक सुंदर कविता






अगर सिनेमा मानस पटल पर छा जानेवाली कोई सुंदर-सी किताब है तो अमिताभ बच्चन उस किताब की एक सुंदर कविता हैं। ऐसी मधुर पंक्तियां हैं जो बरबस ही होंठों पर नाच उठती हैं। किसी अज्ञात सम्मोहन में बिंधे से हम पंक्ति -दर -पंक्ति उसे गुनते रहते हैं। औरों से उसकी चर्चा करते हैं। फिर सब मिलकर उसका सस्वर गान करने लगते हैं।  एक गाथा बन जाते हैं। फिल्मी किरदार के रूप में हम उस गाथा को परदे पर अवतरित होता देखते हैं। वह एक आम आदमी बन जाते हैं। उनके अंदर वही सब मानवीय भावना दिखती हैं जो हमारे-आपके अंदर हैं। अमिताभ बच्चन को देखते हुये हम हंस सकते हैं, रो सकते हैं,  तालियां पीट सकते हैं,  ढीशूम-ढीशूम कर सकते हैं। एक संपूर्ण कलाकार को जीवन के विभिन्न रंगों में डूबता देखते हैं। साथ-साथ हिचकोले खाते हैं। अमिताभ बच्चन!! अमिताभ बच्चन!! गॉड ऑफ स्क्रीन,  वन मैन इंडस्ट्री, मेगा स्टार, लिजेंड, एक्टर ऑफ मिलेनियम...  सहस्त्राब्दी के नायक ...अमिताभ ने नायक की अवधारणा को बदलकर रख दिया ! 
 





गंगा किनारे वाले उस छोरे की लंबाई,  दुबले-पतले बदन, पतली-महीन  आवाज की शुरू में अनदेखी की गई, अस्वीकृत किया गया। बाद में वही आवाज एक सुंदर पहचान बन गई। बेमिसाल । अमिताभ का नाम देश-विदेश, गांवों-कस्बों, बस्ती-बस्ती में सुना जा सकता है। वे आमजन की वेदना, गुस्से-आक्रोश को कला के सांचे में ढाल देते हैं। दबे और दबाये हुए लोगों की आवाज को सिनेमाई अंदाज देते हैं और इस तरह जन-जन के मन में अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। लंबी-पतली टांगों, छरहरे बदन और डूबती हुई दूर तलक देखती गहरी आंखों को लोग सिर-माथे पर उठा लेते हैं। हाथों-हाथ लपक लेते हैं। दिल के कोनों और मन की अनंत गहराइयों में बिठा लेते हैं। उनकी हेयर स्टाइल,  पहनावे और संवाद और हर पहलू की नकल करते हैं।हां! अमिताभ सिनेमा-संसार के अद्भुत नक्षत्र हैं। विश्व मंच पर छा जाने वाले सुनहरे सितारें हैं, जिनकी एक छवि पाने के लिये इजिप्टियन महिलाएं इस कदर उतावली हो जाती हैं कि काइरो एयरपोर्ट 'डेंजर जोन ' बन जाता है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति  नजीबुल्लाह उनके साथ अपनी ढेर सारी तस्वीरों के बदले फिल्म 'खुदा गवाह'  की शूटिंग के लिए फिल्म टीम को अफगान एयरफोर्स के लगभग आधे भाग का प्रबंध करवाते हैं। यहाँ तक की मुजाहिद्दीन भी उनकी करिश्मा से बच नहीं सके ।  और अपने वतन में उनकी प्रसिद्घि का यह आलम छाया होता है कि कुली (१९८२) की शूटिंग के दौरान  पुनीत इस्सर के प्रहार के कारण घायल हो जाने पर पूरे देश की सांसें थम जाती हैं। उनकी हर एक सांस देशवासियों की प्रार्थनाओं के साथ घुल-मिल जाती हैं। सलमान रुश्दी 'द सैटनिक वर्सेस'  में रेखा के स्क्रीन लवर के रूप में उन्हें इंगित करते हैं।  शशि थरूर और शोभा डे अपनी कहानियों में उन्हें उद्घृत और चित्रित करते हैं। प्रसिद्ध लेखक-गीतकार जावेद अख्तर उनकी भूमिका को संबोधित करते हैं- '....ऐसा गुस्सा जिसमें गरिमा हो, ऐसा आक्रोश जो दुखी करता हो और जिसमें आंसू हों।...'अमिताभ निर्विवाद रूप से हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारे हैं।  सिनेमा आकाश के शिखर पुरुष । बॉक्स ऑफिस पर प्रभाव इतना गहरा रहा कि १९७० के दशक में उन्हें 'वन मैन इंडस्ट्री'  कहा जाता रहा।
हिंदी के प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन के बेटे अमिताभ बच्चन का जन्म इलाहाबाद में हुआ। दिल्ली के किरोरीमल कॉलेज से इन्होंने विज्ञान स्नातक की उपाधि ली। कलकत्ता से अभिनय में अपना भाग्य आजमाने बंबई गये।फिल्मी करियर में पहला ब्रेक के. ए. अब्बास की फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' से मिला। लेकिन फिल्म असफल रही। इसके पूर्व प्रख्यात फिल्मकार मृणाल सेन की क्लासिक फिल्म भुवन शोमे (१९६९) में वॉयस नैरेटर के रूप में काम किया। शुरुआती असफलताओं के बाद ऋषिकेश मुखर्जी की कुछ फिल्मों जैसे-'आनंद'  अभिमान और नमक हराम ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। १९७३ में फिल्म जंजीर  की अपार सफलता ने अमिताभ की एंग्री यंग मैन की छवि बना दी। एक ऐसा युवा नायक जो कानून को  हाथों में लेकर भी गलत कामों का बदला लेता है, वाली बनी उनकी अन्याय के खिलाफ आक्रोश जनित छवि ने उन्हें स्टारडम तक पहुंचाया। दीवार, शोले  त्रिशुल और शक्ति का क्रोध, कुंठा, गुस्से, आक्रोश और प्रतिशोध से भरा नायक युवा सपनों का प्रतिनिधि  बन गया। सलीम-जावेद ने १९७० के दशक में गुस्से को प्रदर्शित करती उनकी फिल्मों में एंग्री यंग मैन वाली भूमिका में जान डाल दी। अमिताभ के अभिनय को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है- मनमोहन देसाई की वन मैन इंटरटेनर वाली फिल्में जैसे- कुली  और मर्द । यश चोपड़ा और प्रकाश मेहरा की मेनस्ट्रीम वाली सीरियस ड्रामा वाली फिल्में, जैसे- नमक हलाल, शराबी  और सिलसिला या ऋषिकेश मुखर्जी की अभिनय प्रधान फिल्में।  १९८४ में उन्होंने बाल सखा राजीव गांधी के कहने पर राजनीति की ओर रुख किया तथा इलाहाबाद से लोक सभा की सीट भी जीती। राजनीति की चक्करघिन्नी में वह एडज़स्ट  नहीं हो पाए । पर राजनीति  के बाद वाली फिल्मों में वह जादू नहीं रहा। बच गया बस जादुई यथार्थ  ! १९९० में अग्निपथ और हम की सफलता ने उन्हें फिर ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया। १९९२ के बाद फिल्मों से पांच साल का अवकाश लिया और सारा ध्यान अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल) पर केंद्रित रखा। १९९७ में फिल्म मृत्युदंड  से वापसी की। लेकिन यह फिल्म भी उनकी अन्य फिल्मों मेजर साब और सूर्यवंशम की तरह वह खोया हुआ आकर्षण वापस लाने में असफल रही। फिर भी, अमिताभ टेलीविजन के गेम शो 'कौन बनेगा करोड़पति' में होस्ट की भूमिका से चाहनेवालों की लंबी फेहरिस्त से घिर गये। एक नया अवतार । जोश और जुनून । नये मिलेनियम की और नये दशक की शुरुआत के साथ अमिताभ नये अवतार में सामने आये और एक रिश्ता- द बॉण्ड ऑव लव, मोहब्बतें, अक्स, कभी खुशी कभी गम,  आंखें और हम किसी से कम नहीं जैसी कई प्रशंसनीय और प्रसिद्घ फिल्में की। उन्हें अनेक राष्टरीय-अंतर्राष्टï्रीय सम्मान मिलें हैं। मिलते चले जा रहे हैं । फिल्म फेयर अवार्ड , राष्टïरीय पुरस्कार। अंतरराष्टïरीय सम्मान। मानद डॉक्टरेट उपाधि।   नागरिक सम्मान। एशियन फिल्म पुरस्कार। फ्रांस सरकार का  सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेजन  ऑफ आनर।  लगातार प्रसिद्घि ने बीबीसी ऑनलाइन यूजर्स पोल’ की वोटिंग के जरिए इन्हें मिलेनियम ग्रेटेस्ट स्टार ऑव स्टेज और स्क्रीन से सम्मानित किया गया। कई हॉलीवुड नायकों को पछाडक़र । बीते सालों में  पा में ऑरो की अनूठी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ नायकका राष्टïरीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया है। सच! अमिताभ बच्चन मिलेनियम के नायक हैं। किसी परिचय के मोहताज नहीं। किसी नाम के गुलाम नहीं। कला को जीते हुये, अभिनय को जिंदा बनाये हुये। विविध आयामों वाली भूमिकाएं निभाते हुए एक संपूर्ण कलाकार! महानायक! पुरस्कार-सम्मान, प्रसिद्घि, लोकप्रियता... और नायकत्व अमिताभ के लिए अब लघु है। वे सिनेमा के इतिहास में स्थायी नायक बन चुके हैं। जीवेद् शरद: शतम्... अमिताभ।              

Friday, September 28, 2012

लता मंगेशकर : भारत की आवाज


                             

कहते हैं संगीत ईश्वर है। सच ही, संगीत प्रकृति के कण-कण में व्याप्त है। अखिल ब्रह़मांड एक प्रकार का संगीत है। नन्हे से घुंघरु की खनक से लेकर नदियों के कलरव और सघन वनों की शांति को भंग करती पत्तियों की चरमराहट में है संगीत। संगीत चिडिय़ों की चहचहाहट संग भोर के प्रकाश में घुल जाता है। रात गए झींगुरों की आवाज संग नाच उठता है। कोयल की कूक बन आम्रमंजरियों-सा महक उठता है। संगीत मेघ मल्हार बन बादलों से बरस उठता है और रौशनी बन चिरागों रौशन हो उठता है। यही संगीत जब सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज बन जाता है तो हमारी आत्मा को छू लेता है। हमारा मन-प्राण झंकृत हो उठता है।  प्रियतमा की बाहों में झूम गा उठता है ‘तूने ओ रंगीले कैसा जादू किया...’ सिली-सिली बिरहा की आग में जल उठता है। ‘प्यार किया तो डरना क्या’ गा कर  बगावत कर देता है। ‘लग जा गले’ कह आंखों से आंसू बन झरता है... तो कमर्शियल फिल्मों की तेज धूनों संग यह गाता है ‘दिल तो पागल है...’।

सुप्रसिद्घ संगीतकार नौशाद के शब्दों में- ‘‘अभी तक हम इस बात का अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि लता मंगेशकर के रूप में हमें ऊपर वालों ने क्या दिया ! यह खुशकिस्मती है कि हम उस दौर में हैं जिसमें लता जी ने जन्म लिया। उन्होंने गायकी की शुरुआत उस दौर में की, जब नूरजहां, शमशाद बेगम, अमीरबाई और जौहराबाई अम्बालेवाली जैसे जानदार बड़े नाम मौजूद थे। बावजूद इसके लता जी ने अपनी न सिर्फ एक अलग पहचान बनाई बल्कि श्रेष्ठ और शीर्ष स्थान हासिल भी किया। ’’

भारतीय सिनेमा में लता मंगेशकर का नाम 'सिंगिंग' से गूंथा-सा लगता है। इनके गाने हजारों-करोड़ों लोगों के दिलो-दिमाग पर छाये हैं और दुनिया भर में गुनगुनाये जाते हैं । इन्होंने अलग-अलग भाषाओं में छह दशकों से भी अधिक समय तक गाने गाये और भारतीय संगीत को नई ऊचाईयां दी। गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड  ने माना है कि लता दुनिया भर में सर्वाधिक रिकार्ड की गई गायिका हैं । उन्होंने  20 से अधिक भाषाओं में  30 हजार से अधिक गाने गाये हैं।


लता मंगेशकर का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में 28 सितम्बर, 1929 को हुआ ।  ये पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं जिनके नाम हैं आशा भोंसले, मीना खादीकर, ऊषा मंगेशकर और ह्रदयनाथ मंगेशकर। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर जाने-माने गायक और स्टेज ऐक्टर थे। लता जी के पहले गुरु भी वही थे। १३ वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई। परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने इस छोटी-सी उम्र में ही मराठी और हिंदी फिल्मों में काम करना शुरू किया। 


जब स्वतंत्रता आन्दोलन के समय भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था तब 1942 में उनके पिता दुनिया से विदा हो गए, लता के कंधों पर पूरे परिवार का ख़र्च चलाने की ज़िम्मेदारी आ गई  बाल कलाकार के रूप में उनकी पहली फिल्म थी ‘पाहिली मंग्लागौर’। इसी फिल्म में इन्होंने अपना पहला गाना ‘नाटी चैत्रीची नावालाई... गाया। पहला हिंदी गाना ‘पा लागू कर जोरी... 1947 में बनी फिल्म ‘आपकी सेवा में’ के लिए गाया। उस समय जबकि शमशाद बेगम और नूरजहाँ का फिल्मी दुनिया में राज छाया था। लता मंगेशकर ने धीरे-धीरे अपनी पहचान ‘मजबूर’ और ‘महल’ जैसी फिल्मों से बनाई। भारत-चीन युद्घ के बाद 1962 में कवि प्रदीप (असल नाम रामचंद्र द्विवेदी ) का लिखा गाना ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ गाया तो माहौल इतना गमगीन हो उठा कि पंडित जी की आंखों से आंसू आ गये !

ईश्वर की विशेष रूप से तराशी गई जादुई आवाज के साथ लता मंगेशकर ने मधुबाला, मीना कुमारी से लेकर माधुरी दीक्षित तक कई हीरोइनों को अपनी आवाज दी। 70 की उम्र में भी उन्होंने अपनी आवाज की मधुरता से चाहने वालों को मंत्रमुग्ध कर दिया जब उन्होंने फिल्म 'दिल से' का ‘जिया जले जा जले...’ गाया जिसे मात्र 40 मिनट में पूरा किया गया था। उन्होंने लगभग सभी बड़े संगीत निर्देशकों के साथ काम किया है। नौशाद, सी रामचंद्र, एसडी बर्मन, मदन मोहन और शंकर जयकिशन के साथ अपने सबसे अच्छे प्रदर्शन दिए। ‘अभिमान’, ‘दस्तक’ और ‘आम्रपाली’ यादगार फिल्मों में हैं। 1990 के दशक में ‘रूदाली’, ‘हम आपके है कौन’ और ‘लेकिन’ जैसी अनेक फिल्मों को आवाज दी (जिसे इन्होंने प्रोड्यूज भी किया)। इन्होंने कई मराठी फिल्मों को भी प्रोड्यूज किया। लता मंगेशकर को 1989 में सर्वोच्च भारतीय सिने पुरस्कार दादा साहब फाल्के और 2001 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वे हर संगीतकार की सपना हैं


लता जी अब जीवित किंवदंती बन चुकी हैं। जब तक हो सके, वे गाती रहें... आएगा आने वाला... । जीवेद शरदः शतम....

Tuesday, September 25, 2012

...आनंद और आनंद




                   
                                                           (26 सितम्बर 1923 -- 3 दिसम्बर 2011)



'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’ ....यह उनका फलसफा था . ईश्वर ने उन्हें लम्बी उम्र दी . जिंदगी को भरपूर जिया उन्होंने . विश्वास नहीं होता कि वे 'थे' हो गए हैं .  उल्लास से भरे , अनवरत सृजनरत देव आनंद .
देव आनंद सफलता-असफलता से परे सिनेमा सृजन में जिंदगी के नौवें दशक में भी सक्रिय थे .  वे सिनेमा से ‘सेवानिवृत्त’ न हुए थे . ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया’... उन पर सही फबता था .  एक बातचीत में वह कहते हैं- ‘‘मैं फिल्में बनाता हूं क्योंकि मैं बनाना पसंद करता हूं।’’ एक अभिनेता, फिल्मकार, स्क्रीन लेखक, निर्देशक के रूप में देव आनंद ने अनेक चेहरों को ब्रेक दिया। गाइड, ज्वेल थीफ, प्रेम पुजारी, हरे रामा, हरे कृष्णा, देश-परदेश, स्वामी दादा सहित अनेक फिल्मों के कारण वह अन्तर्राष्ट्रीय सिनेमा संसार में भी प्रतिष्ठा रखते हैं। स्वतंत्र भारत का पहला दशक भारतीय सिनेमा के उत्कर्ष का दौर था। यह वो समय था जब फिल्म इंडस्ट्री पल-पल बदल रही थी। नये-नये प्रयोग हो रहे थे। अभिनय लेखन, निर्देशन, प्रयोजन सभी क्षेत्रों में नित नये आयाम खुल रहे थे। वह संजीदा समय था। राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे अभिनेताओं का समय था। देवआनंद इन्हीं कलाकारों की एक कड़ी रहे। पर थोड़े अधिक रोमांटिक, थोड़े अधिक जोशीले, थोड़े अधिक दिलफरेब, थोड़े अधिक शहरी!
जीवन की भूख , सृजन की चाह देव साहब की जिंदगी थी . वे सफलता -असफलता से परे रचनात्मक सक्रियता को जी रहे थे. 

                      

कहते हैं कि फिल्मी पर्दे पर देवानंद को काले कपड़ों में देख लड़कियां आहें भर उठती थीं। वे सिने प्रेमियों के दिलो-दिमाग पर छा जाते थे। चलने, हंसने, बोलने और अभिनय के अपने ही अलग अंदाज के साथ पर्दे पर रूमानियत और आकर्षण का समां सा बांध देते। नई-नई नायिकाओं के साथ जोडिय़ां बनाते और भी खूबसूरत हो जाते। चटख रंगों, सूट-बूट, सुंदर लिबासों, हंसीसेटों के बीच और भी रोमांटिक और जीवन से भरे दिखते थे। देवआनंद का जन्म पंजाब के गुरदासपुर में हुआ। इनके बचपन का नाम देवदत्त पिशोरीमल आनंद था। पंजाब युनिवर्सिटी से डिग्री लेने के बाद 1943 में फिल्मों में ऐक्टिंग के लिये बम्बई आये। अपने लक्ष्य में इन्हें सफलता हासिल हुई और 1945 में प्रभात फिल्म्स कंपनी की फिल्म ‘हम एक हैं’ से लीड हीरो के रूप में बे्रक मिला जो उनके कैरियर के 50 से भी अधिक वर्षों तक जारी रहा। बड़े भाई चेतन आनंद के साथ मिलकर 1949 में इन्होंने नवकेतन स्टूडियो खोला।
उनकी पहली सबसे बड़ी हिट फिल्म ‘जिद्दी’ रही। ‘बाजी’, ‘सी.आई.डी.,’ ‘काला बाजार,’ ‘हम दोनों’ की सफलता के साथ ही आनंद बॉक्स ऑफिस पर छा गये। 1970 में देव आनंद ने फिल्मों के डायरेक्शन की ओर रूख किया और फिर तब से अपनी ही निर्देशित फिल्मों में अभिनय भी करते रहे। ड्रग कल्चर पर आधारित उनकी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। अपनी फिल्मों से कई नये चेहरों को इंट्रोड्यूज किया जिनमें जीनत अमान, टीना मुनिम, नताशा, एकता और सुनील आनंद जैसे नाम शामिल हैं। निर्देशक होने के साथ-साथ ही देवआनंद एक अच्छे प्रोड्यूसर भी रहे। नवकेतन के बैनर तले इन्होंने ४0 से भी अधिक फिल्मों का निर्माण किया। फिल्म बनाने के क्षेत्र में भी आनंद सफल रहे और फिल्म इण्डस्ट्री को एक अभिनेता निर्देशक और प्रोड्यूसर के रूप में कई सफल फिल्में दी। करियर के अपने लंबे सफर में इन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे और असफलताओं को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ते रहे और हमेशा सक्रिय रहे। उनकी हर फिल्म उनके लिये जैसे एक चैलेंज थी।
‘काला पानी’ और ‘गाइड’ के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिले। वहीं भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें 2001 में पद्म भूषण अवार्ड से सम्मानित किया गया। पुराने जमाने के नये अभिनेता रहे वह। रोजमर्रा की घटनाओं से कहानियां बुनते लेखक रहे वह, एक सफल निर्देशक, प्रायोजक रहे वह।  देवानंद की किताब रोमांसिंग विद लाइफ के अनुसार ‘मुझे जीनत पर फख्र था, लेकिन राजकपूर से जब वो लिपटती तो... मुझे जलन होती। मुझे लगता कि वह सिर्फ मेरी अमानत है, मेरी खोज है, मेरी नायिका है। उसे एक बार चूमने की चाहत थी मेरे दिल में...’। ‘‘सुराईया ने होंठ मेरी ओर बढ़ाए, मैने पूछा, ‘‘शादी करोगी?’’ उसने फिर मुझे सीने से लगाया और हुंकारी भरते हुए बोली, ‘‘आई लव यू! आई लव यू...’’ ऐसे है हमारे ऐवर ग्रीन हीरो देवानंद... एक समय था जिन पर उनके चाहने वाले मरते थे कहां जाता है कि काली पेंट और सफेद शर्ट पहनकर चलने पर रोक लगा दी गयी थी क्योंकि लड़कियां उन्हे देखकर ऊपर से कूद ना जाएं। 
देव साहब के ६५ साला फ़िल्मी सफ़र के जो किये -धरे कार्य हैं वह हमारे लिए सुरक्षित है . वह जिन्दा रहेंगे अपनी कृत्तियो में . सिनेमा का इतिहास के वे स्वर्णिम अध्याय बनकर प्रेरित करते रहेंगे सिने पीढियों को . कब मिलेगा फिल्म इण्डस्ट्री को एक कलाकार ऐसा दुबारा ?

Monday, September 17, 2012

शबाना आजमी: सृजन एवं सरोकार

                         


      


शबाना आजमी (18 सितम्बर , 1950)  भारतीय सिनेमा की एक अनूठी उपलब्धि हैं। सिनेमा-सृजन और सरोकारों को समर्पित शबाना के लिए सिनेमा सिर्फ कॅरियर या मनोरंजन नहीं है बल्कि एक बड़ा सरोकार भी है। शबाना आजमी का बचपन मशहूर शायर कैफी आजमी और मां शौकत आजमी के सान्निध्य में पला-बढ़ा। सरोकारों से संस्कारित हुआ ।    एक तरह से कलात्मक विरासत और सांस्कृतिक पर्यावरण में उनका पालन पोषण हुआ। सृजन और विचार  द्वारा हस्तक्षेप शबाना का एक लक्ष्य रहा है। एक कुशल वक्ता, समाज सेवी और गंभीर अभिनेत्री के रूप में उन्होंने हिन्दी सिनेमा को एक गरिमा दी है। तभी तो उनकी विशिष्टता को पूरे सिनेमा संसार में एक सम्मानित जगह हासिल है। 
समानांतर सिनेमा हो या फिर कमर्शियल फिल्में उन्होंने हमेशा अपने को साबित किया। उनकी गंभीरता ही उनकी ग्लैमर साबित हुई। 'अर्थ', 'निशांत', 'अंकुर', 'स्पर्श', 'मासूम', 'फायर' जैसी फिल्मों के अलावा 'अमर अकबर एंथोनी', 'परवरिश', 'मैं आजाद हूं'... आदि में भी उनकी अभिनय प्रतिभा प्रबुद्घ और आम दर्शकों में पसंद की गई।  प्रयोगात्मक सिनेमा को एक स्थापित जगह दिलाने में उनके योगदान उल्लेखनीय हैं। विवादास्पद और बहुचर्चित फिल्म 'फायर' में उनके अभिनय को लेकर काफी चर्चा-कुचर्चा हुई  लेकिन जिस तरह उन्होंने बेधडक़ होकर अभिनय किया वह उनकी प्रतिभा का जीवंत प्रमाण ही तो है! 'मकड़ी' में (बाल-फिल्म ) चुड़ैल की भूमिका को देखकर यह लगा कि शबाना के लिए अभिनय का मतलब भीड़ से जुदा है। 'गॉडमदर' में महिला डॉन की भूमिका ने उनकी प्रतिभा को विस्तार दिया। लगभग चार दशक की अपनी अभिनय यात्रा में उन्होंने यह साबित किया है कि एक कलाकार समाज में विविध प्रकार से अपनी भूमिका निभाते हुए बदलाव और जरूरी हस्तक्षेप का वाहक बन सकता है।

      

याद है ‘वाटर’ फिल्म की बनारस में शूटिंग के दौरान शबाना आजमी को सिर मुंडवाकर उस किरदार की तैयारी में गंभीरता से डूबे होने का। उस बवाल के दौरान मैं बनारस ही था । अस्सी घाट के एक होटल में शबाना और नंदिता दास रुकी हुई थीं ।  बनारस में इसकी शूटिंग और पटकथा को लेकर हुए बवाल के कारण फिल्म की शूटिंग का प्रभावित होना एक अप्रिय प्रसंग रहा।
शबाना आजमी फिल्म, टेलीविजन और थिएटर के क्षेत्र की कुशल अभिनेत्री और सक्रिय सृजनधर्मी हैं। पूणें स्थित फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षित शबाना ने 1974 में ‘अंकुर ’ से अभिनय जगत में कदम रखा और शीघ्र ही वे समानांतर सिनेमा के क्षेत्र में चर्चित कलाकार के रूप में शुमार हो गईं। सिनेमा के सामाजिक सरोकार के नव यथार्थवादी आंदोलन में बतौर कलाकार शबाना ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। सिनेमा संसार में और एक सामाजिक कार्यकर्ता उनके योगदानों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। उन्हें अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार-सम्मान मिले। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार क्रमश: अंकुर (1975), अर्थ (1983), खंडहर (1984), पार (1985), गॉडमदर (1999) के लिए मिले। वही स्वामी (1978), भावना (१९८५) के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिले। लिबास (1993), पतंग (1994), फायर (1996) आदि में उनके सशक्त अभिनय के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। शबाना आजमी को भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के सदस्य होने का भी गौरव प्राप्त है। सौ से अधिक मुख्यधारा और कलात्मक फिल्मों में जो उन्होंने रचा है वह अपने आप में बेमिसाल है। मशहूर कवि-गीतकार और सिने लेखक जावेद अख्तर की संगिनी शबाना आजमी की सम्पूर्ण कलात्मकता 60 पार भी उसी लय के साथ जारी है। एक कलाकार की तरह जीते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से उनकी सरोकारी सक्रियता बनी हुई है ....जारी रहे अनवरत!

Tuesday, August 28, 2012

' ये वो गलिया थीं , जिनसे मैं गुजर गया हूँ ...'


                         

 राजेन्द्र यादव के लेखन व विचारों में जो स्पष्टता, साफगोई और वैचारिक 'आकाश' --'दर्शन' दिखता है वह काफी कुछ उनके जीवन-दर्शन और सृजन का ही प्रतिबिंब है। लेकिन यह भी सच है कि झोल-झाल बर्दाश्त न करने की आदत और खतरनाक किस्म की साफगोई
के बावजूद उनके यहां भी अपार झोल-झाल और ‘डिफेंस मैकेनिज्म’ (सुरक्षा कवच) मौजूद रहता है। सुविधा से चलने में वे माहिर हैं . ईमानदार तो हैं ही।
उनके बहस - विमर्श में एक ऐसी मौलिकता रहती है जो असहमति और ‘अति’ की  पुर जोर गुंजाइश  के बावजूद आकर्षित,  मंत्रमुग्ध  और भौंचक करती है। तभी खिसियाहट में भी
प्यार आता है , श्रद्धा जगती है उन पर । उनके प्रति एक सा सम्मान जगता है दोस्त-दुश्मनों में ।
राजनीति में यदि राजेन्द्र जी की तुलना किसी अब के नेता से की जाए तो शरद यादव से वे काफी मिलते-जुलते हैं! यहां शरद यादव से तुलना का आधार उनके नाम में लगे अनिवार्य किस्म के ‘उपनाम’ से नहीं है। (अगर यादव मिलान ही करना होता तो मुलायम सिंह और लालू जी कहीं ज्यादा प्रासंगिक थे !) दरअसल, यहां तुलना का कारण शरद जी की दुद्धर्ष ईमानदारी और स्वच्छ छवि तथा वैचारिकता है। जो राजेन्द्र जी की कहीं ज्यादा गहन  है,  लेकिन सामाजिक न्याय और अगड़ा-पिछड़ा की समाज मनोवैज्ञानिक “मंडलीय” सोच दोनों लोगों की एक जैसी है और वह काफी ईमानदार भी है ! प्रायः  दोनों लोग अपने क्रांतिकारी चिंतन और अभिव्यक्ति में ईमानदारी के बावजूद राजनीतिक- रणनीतिक  हैं । और किसी भी गंभीर बहस को मटियामेट करने में माहिर !  यह ध्यान रहे राजेन्द्र जी और शरद जी के दुश्मन भी यह नहीं कह सकते कि ये लोग निजी रूप से जातिवादी हैं!  जनवादी जरूर हैं ! सामाजिक न्याय के लिए तड़प है । समाज के कमजोर-वंचित , श्रमजीवी
वर्ग के लिए आग्रह है ।
  राजेंद्रजी को बिहार में लालू जी के मुख्यमंत्रित्व काल में बिहार का सबसे बड़ा साहित्यिक पुरस्कार दिया जा रहा था तो तमाम लेखकों की अपील (न लेने के ) के बावजूद उन्होंने ‘हंस’ के लिए पुरस्कार ग्रहण किया और पुरस्कार समारोह में जब भरी सभा में कहा कि ''मुझे यह इसलिए दिया जा रहा है कि मैं यादव हूं'' तो तमाम लोगों  सहित  लालू जी, राजेंद्रजी की बेबाकी और सत्साहस-दुस्साहस को सुनकर फक पड़ गए थे। यादव न होते तो भी राजेंद्र जी  पुरस्कार पाने के हकदार थे । लेकिन इसमें भी उन्होंने जरूरी 'विमर्श' खोज लिया ।
राजेन्द्र यादव तो मार्क्सवादी  हैं, लेकिन शरद यादव मार्क्सवादी  न होते हुए भी जनवाद और सामाजिक न्याय को बखूबी उठाते रहते हैं। राजेन्द्र यादव जी हिन्दी पट्टी में ९० के बाद जो तेज सामाजिक- राजनीतिक बदलाव हुए उसे महसूस करते हुए हंस की रचनाओं में  दर्ज किया-कराया। साहित्य की शुद्धता-पवित्रता  और आदर्शी सीख के संदेशों से आगे साहित्य का विस्तार किया और सबको  सोचने पर मजबूर किया। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श को लाख उलाहना, आलोचना,बदनामी  के बावजूद केन्द्रीय जगह देने में उनके योगदानों को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। हालांकि, उन्होंने भी दलित साहित्य सिर्फ दलित लिख सकता है, के चिंतन को भी तमाम तर्को-कुतर्को से परिष्कृत किया और मजबूत संरक्षण दिया ।
भटकाओं और अतियों को पुचकारते रहे । दलित ही दलित को समझ-बुझ सकता है के मारफत नव ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दिया ! किसी के जातीय टाइटिल यानि पाण्डेय, यादव, सिंह, बाल्मिकी को सामने रखकर उनके साहित्य का मुल्यांकन करने की चिंतन- धारा भी उन्होंने खूब बहायी।  उन्होंने  अपने को संशोधित भी किया । कही -कही बदला भी !   गाहे -बगाहे  उन्होंने भाव मुद्रा बदली है ।  गाँधी और अज्ञेय के मामले भी !
डॉ धर्मवीर के 'सामंत का मुंशी' की दलित धारणा को वे  कहा पचा पाए ! अति को जीने वाले यादव जी अति को कहा पचा पाए !  लेकिन धर्मवीर उनके पुर्वग्रहोँ के अनुरूप किसी अन्य के लिए उल-जुलूल लिखते तो यादव जी लोकतंत्र ,  वे देवता नहीं हैं , अभिव्यक्ति के नाम पर अभयदान देते  ।    सब कुछ के बावजूद उनकी बेबाकी और दुस्साहस तथा खतरनाक किस्म की रचनात्मक जिद को उनके पाठक-प्रशंसक ही नहीं,  अशोक वाजपेयी जैसे कलावादी दुश्मन और नामवर जी जैसे आचार्य दुश्मन-दोस्त भी आदर के साथ सराहते हैं।
खैर,  राजेन्द्र यादव की संपादकीय पढ़कर  ही इन पंक्तियों के लेखक ने उनके लेखन से उपजी मंत्र-मुग्धता के साथ असहमति और अतिवादिता के बावजूद आधुनिक और ‘अच्छे साहित्य’ की स्थापित अवधारणा से अलग लिखना सीखा। हर महीने कथा-कहानियों से कहीं ज्यादा इंतजार उन ‘फालतू’ विमर्शों का रहता जो राजेन्द्र जी उठाते रहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे क्रमिक विकास क्रम में यह भी महसूस हुआ कि वे अपने ही सवालों और संदर्भों को बीजेपी, आरएसएस, हिन्दुत्व, ब्राह्मणवादी संस्कृति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद आदि को मौलिकता से बांचने के क्रम में उलट-पुलट करते रहते हैं। एक तरफ वे कहते हैं कि ‘ईश्वर आदमी का अविष्कार है’ वहीं दूसरी तरफ ईश्वर को बांचते समय वे  वर्ण व्यवस्था सहित तमाम बातों के लिए ईश्वर को (मानो) प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की तरह प्रामाणिक और जिम्मेदार जन प्रतिनिधि  मानकर कटघरे में खड़े करते हैं। हनुमान और राम को जब वे बांच रहे होते हैं तो उसमें से जो निकल कर आता है उसको तो पूछिए मत !  ऐसे-ऐसे सवालों के सहित वे राम, सीता आदि को सुलझाते-उलझाते हुए कैरेक्टर पाठ करने लगते हैं मानों राम, सीता के बारे में जो कुछ लिखा-पढ़ा गया है उनमें पुराण नहीं इतिहास नजर आ रहा हो । एक प्रामाणिक इतिहास का मानो पाठ कर रहे हों । अगले ही क्षण वाले लेखन में विदेशियों को कोस भी रहे होते हैं कि भारतीयों में इतिहास दृष्टि का घनघोर अभाव रहा है । मतलब जब गरियाना हो तो कथाएं हु-ब-हू प्रामाणिक; कोसना हो तो एक दम काल्पनिक भड़ैती ।  अब जैसे यदि वे कविता को श्रमहीन विधा ठहराते हुए ब्राह्मण और कथा-उपन्यास को श्रमजीवी विधा बताते हुए दलित -पिछड़ा घोषित करते हैं तो लगता है कि वे विमर्श को मौलिकता के चक्कर में सतह से नीचे ले जा रहे हैं।
यहां याद नहीं लेकिन अपनी एक संपादकीय ने उन्होंने जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त और अन्य अनेक रचनाकारों को जातीय आधार पर रखते हुए यह साबित किया कि आधुनिक और बीते इतिहास में सबसे ज्यादा गैर ब्राह्मण साहित्यकारों ने महान रचा है। वही शायद उन्हें याद नहीं रहता कि जब वे भारतीय संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ऐसी-तैसी कर रहे होते हैं तो मैथिलीशरण गुप्त और जयशंकर प्रसाद उन्हें  हाफ पैन्ट धारी विचार धारा वाले लगने लगते हैं। क्योकि इनका दर्शन ब्रह्मण है ! कहने का मतलब कि मण्डल और कमण्डल को राजेन्द्र जी जब गहन चिंतन का विषय बेनाते हैं तो काफी नकार और साकार दिखने लगता है और उसका कोई अर्थ नहीं निकालता। सवाल उठाने चाहे वह सही हो या गलत और अपने समय संदर्भ के द्वंद को दिखाने और दर्ज कराने में उनके योगदानों को कोई भी नाकार नहीं सकता। काश ! मैं राष्ट्र द्रोही होता ! जैसे टी आर पी बटोरने वाले सवाल का तो पूछिये ही नहीं !

                     -
                          --राजेन्द्र यादव उवाच
"प्रेमचन्द के व्यक्तिगत संस्मरण हैं कि वे व्यवहार में खुलकर मिलते थे,  ठठाकर हँसते थे और जो खुलकर हँसता है, वह निर्भीक होता है, जो निर्भीक होता है  ईश्वर  से नहीं डरता। उसे धर्म की जरूरत नहीं होती । भेद करने की मानसिकता जाति में मिलती है। ‘जाति’ को धर्म का समर्थन हासिल है। हिन्दू सेक्युलर नहीं हो सकता, राजनीति व रणनीति में भले हो जाए। जातिवाद के सबसे बडे़ शिकार दलित और स्त्री हैं। स्त्री और दलित की मुक्ति के बिना जातिवाद नहीं मिट सकता। और जातिवाद मिटे बिना साम्प्रदायिकता खत्म नहीं हो सकती। प्रेमचन्द ने उन सारी समस्याओं को पकड़ा है जो हमारे समाज और देश को बाँटता है वह वर्ण व्यवस्था है।  प्रेमचन्द बड़ी बाधा हैं। कोई भी रचनाकार जब हम उसकी नकल करते हैं तो वे हमें खा जाते हैं और जब पार कर जाते हैं तो वे हमारी शक्ति बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द की पूजा क्या हमें निरंतर बौना बनाने की तो नहीं है, यह जाँचनी चाहिए। प्रेमचन्द प्रासंगिक हैं यह कहते हुए गर्व नहीं होता, वे आज भी प्रासंगिक हैं इसमें हमारे समाज की असफलता है।" - (31 जुलाई, 2005, बनारस , प्रेमचन्द की 125 वीं जयंती के अवसर पर 125 वीं जयंती राष्ट्रीय समारोह समिति’ की ओर से  ‘धर्मनिरपेक्ष भारत और प्रेमचन्द’ विषय संगोष्ठी )     
 ‘‘अतीत मुझे कभी नहीं सुहाता और सताता। जो लोग बीते कल   महानता और स्वर्णयुग की बात करते हैं वे सब झूठ बोलते हैं। आदमी इतिहास से नहीं बल्कि सिर्फ अपनी गलतियों-गुनाहों से सीखता है। मैं पीछे मुडक़र नहीं देखता।’’

   - ‘‘पता नहीं ‘नई कहानी’ को हमने बनाया या ‘नई कहानी’ ने हमें। हम लोगों ने सत्ता-विरोध से अपनी यात्राएं शुरू की थीं, मगर धीरे-धीरे स्वयं सत्तावान की प्रक्रिया में उसी के हिस्से बनते चले गए। छह बातें हम आज भी सात्र्र, कामू, ब्रेख्त, लोर्का और पाब्लो नेरूदा की करते हैं। ’’  
 
                 राजेंद्र जी के बारे में
''राजेन्द्र यादव जी हमारे समय के एक सशक्त, उत्तेजक, विवादप्रिय और विवादजनक उपस्थिति हैं । उनकी बेबाकी और दुस्साहस भी प्रसिद्घ है। उन्होंने उपन्यास लिखे, कहानियां लिखीं,लेकिन अब उन्हें हंस के लिए याद किया जाता है । स्त्री ,दलित विमर्श और अपनी जिदों के लिए याद किया जाता है ।'' -अशोक वाजपेयी, प्रसिद्घ कवि-आलोचक
''राजेन्द्र कला विरोधी रहें हैं लेकिन उनकी कहानियों की कलात्मकता में कोई शक नहीं है। इनका गद्य निश्चित ही कलात्मक है। राजेन्द्र के अवदान में केन्द्रीय जगह उनकी कहानियों और उपन्यासों की होगी। इनका अवदान कथा -साहित्य के क्षेत्र में होगा, तो  विवाद और सम्पादन के क्षेत्र में भी होगा।  ‘हंस’ ने बहुत साहसी कहानियां छापी हैं और बहुत सारी कूड़ा भी, पर हंस की खूबी यह है कि इसने वाद-विवाद का और बहस का जो मंच बनाया उसके लिए इन्हें हमेशा याद किया जाएगा।'' -कृष्ण बलदेव वैद, वरिष्ठ कथाकार और नाटककार    

           जब वे तुलसीदास के व्यक्तित्व और कृतित्व को बांच रहे होते हैं तो तुलसी संकीर्ण जातिवादी और वर्चस्ववादी मूल्यों वाले हो जाते हैं। दलित और पिछड़ा विरोधी हो जाते हैं। यहां राजेन्द्र जी ‘होना/सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ लिखकर सालभर कीर्ति का फल चखते हैं यानि उस पर ऐतिहासिक बहस चलता है। चलवाया जाता है ... और विरोध में लिखे जाने से वे करुणा और खीझ से भर जाते हैं कि लेख यानि रचना के व्यंग्य और सरोकार को पता नहीं हिन्दी वाले समझ क्यों नहीं पा रहे हैं!  मतलब तुलसीदास ने अपने समय के मूल्यों या बादमाशियोँ  को जब अपनी रचना में रखा तो वह तुलसीदास का निजी विचार बन गया लेकिन राजेन्द्र जी ने महिलाओं के प्रति पुरुष मानसिकता को जब व्यंग्य और प्रतिरोध के रूप में रखा तो उनकी मानसिकता को लेकर जब प्रायोजित-अप्रायोजित हो-हल्ला हुआ तो वे खीझने लगे कि पुरुषवादी मानसिकता को हमारा विचार क्यों माना जा रहा है?  राजेन्द्र जी जिन सुविधाओं का वैचारिक सृजन में उपयोग-उपभोग करते हैं उसका दूसरों को लाभ नहीं लेने देते।
राजेन्द्र यादव की हिन्दी विमर्श को सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने पारंपरिक दिमाग के अभिजात्य को बदला। 'हंस' और अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय सामाजिक मनोविज्ञान को बदलने या बदलाव की ओर अग्रसर होने में योगदान किया।  'हंस' में असहमति की आवाज भी बर्दाश्त करने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया उन्होंने ही की। अपना मोर्चा, बीच बहस सहित लेखों और रचनाओं में उन वैचारिक असहमतियों को भी जगह दी गई जो राजेन्द्र जी की चिंता और चिंतन से उलट है। सवाल उठाने चाहे वह सही हो या गलत और अपने समय संदर्भ के द्वंद को दिखाने और दर्ज कराने में उनके योगदानों को कोई भी नाकार नहीं सकता। वो इसी तरह बिंदास बने रहें . जिंदगी को और भी बेहतर बना सकने का उनका रचनात्मक एवं वौधिक उद्यम हमेशा जारी रहे .  उनकी उपस्थिति जरूरी और जिंदादिल उपस्थिति है .  वे एक ऐसे स्तम्भ हैं जिनसे आस्वस्ति मिलती है .
 83 पार राजेंद्रजी को उनके किए-धरे और जिंदादिली के लिए अपार शुभकामनाएं ।

सुभारती में ' समुद्र संगम'

सरोकार          


                              


राष्ट्रीय एकता , सद्भाव , भाईचारा , समन्वय ...शब्द मात्र नहीं है ।  ये हमारे मूल संस्कार हैं।  भारतीयता के मर्म हैं ।  महान समालोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जिसे  'विरुधोँ का सामंजस्य'  कहा है ... । वह है भारतीयता ।  ब्राह्मण एवं श्रमण धरा एक साथ रही है यहाँ । प्रख्यात विद्वान पंडित विद्यानिवास मिश्र जिसे  'भारतीयता निःशेष होने का फक्कडपन है'   कहते थे ....
और '' इस फक्कड़पन में संग्रह अधिक नहीं होना चाहिए , परिग्रह नहीं करना चाहिए अर्थात् वस्तुओं को अपने आस-पास वितरित करना चाहिए । हमारा संग्रह सबके लिए है --सबका है , यह भाव होना चाहिए ।  .. सारे के सारे प्रांत , जाति , क्षेत्र-उपक्षेत्र , धर्म-संप्रदाय का विभेद इस भारतीय होने से ही विलोपित हो जाता है । हमारी अखंडता ..अखंड सोच से ही निर्मित है ।''  भारतीयता लोकतंत्र का चलताऊ या कहें  तो 'पोलिटिकली करेक्ट' (राजनीतिकों की तरह )  शब्द नहीं है , बल्कि लोकतंत्र की आधुनिक अवधारणा से पहले का हमारा मूल चरित्र है  ,  संस्कार है ... असहमति , विरोध को भी सम्मान देने का ...। नास्तिक दर्शन चार्वाक को भी यहाँ सम्मान दिया गया है । भारतीय दर्शन का अंग मना गया है  । असहमति की आवाज को बर्दास्त करना .. ज्ञान -संस्कृति के किसी भी केंद्र को मान  देना यह भारतीय संस्कृति का मूल स्वर है ।
    जब माहौल शक्की हो ,  अफवाहोँ का जोर-शोर हो , जगह-जगह धर्म और संस्कृति के नाम पर झगड़े-झंझट हों , राजनीति और सत्ता के अपने-अपने स्वार्थ हों , वैसे में राष्ट्रीय एकता को धर्म के मंच  पर , सरोकार के मोर्चे पर डटकर मजबूत बनाने की कोशिश .. पहल अनुकरणीय एवं आस्वस्तिदायक हैं ।
स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय (मेरठ ) में सुभारती विश्वविद्यालय एवं एन एल बी   चेरिटेबल ट्रस्ट  के तत्वाधान में  राष्ट्रीय एकता , सद्भावना के लिए (16 अगस्त को ) अद्भुत एवं मजबूत जमावड़ा हुआ।  रमजान , रक्षाबंधन , जन्माष्टमी एक साथ ..ख़ुशी , उल्लास और परंपरा के साथ मना।
 पवित्र रमजान के महीने में योगिराज भगवान श्रीकृष्ण के अवतार पर्व जन्माष्टमी और रक्षाबंधन पर चर्चा की गयी । 
ईश्वर , अल्लाह ...यानि अलग-अलग विश्वासों पर वौधिक चर्चा की गयी और कहा गया कि धर्मं के रास्ते भले ही अलग हों , मानवता के उत्थान के लिए , जगत कल्याण के लिए बातें प्रायः एक जैसी हैं । धर्म जोड़ता है ।  मनुष्यता की जमीं पर सभी एक हैं ।
शहर काजी डॉ जैनुस साजिदीन , रेव्हरन- डैनियल मसीह , पास्टर मनीष , सरदार तिलक सिंह , सरदार गुरुचरण सिंह , डॉ वाचस्पति मिश्र ,  नायब शहर काजी , पंकज जोली , डॉ कुंतल अग्रवाल , जोहरा आपा , शाहीन परवेज़ आदि की सक्रिय-सचेत  उपस्थिति रही ।
प्रख्यात विद्वान् शहर काजी (मेरठ )  डॉ साजिदीन ने पाक रमजान के महत्व और मर्म को सुचिंतित तरीके से रखा , वही संस्कृत विद्वान  डॉ वाचस्पति मिश्र ने धर्म-संस्कृति के मूल तत्वों को रखते हुए रक्षाबंधन की  महता एवं प्रासंगिकता  पर प्रकाश डाला । धर्म में निहित एका को सुचिंतित वाणी दी  ।
 विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मंज़ूर अहमद ने अध्यक्षीय वक्तव्य में स्वामी विवेकानंद , रामकृष्ण परमहंस और अनेक संदर्भोँ के उद्धरण देते हुई संस्कृति समन्वय द्वारा राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रबल बनाने पर जोर दिया ।
सुभारती आन्दोलन के संस्थापक डॉ अतुल कृष्ण , जो स्वयं पुरे रमजान में रोजा रखते रहे हैं , ने सूत्रधार के रूप में कार्यक्रम को राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए साकार रूप दिया।  भारतीय संस्कृति की जमीं पर खड़े होकर कैसे राष्ट्रीय एकता, अखंडता को मजबूत और अटूट बनाया जाय यह चिंता रही है उनकी ।  नवरात्र व्रत पारायण हो या रमजान या फिर अन्य धार्मिक सांस्कृतिक उत्सव - पर्व ...यह डॉ अतुल कृष्ण  के मिशन में विद्यार्थी जीवन से रहा ।  कहें तो बाल जीवन से रहा ।  समाज , संस्कृति , सरोकार , समन्वय , राष्ट्रवाद  ... डॉक्टर अतुल  के लिए जीवन धर्म है ,  दर्शन है।   डॉ अतुल एवं अन्य लोगों को इस अवसर पर मुस्लिम-हिन्दू बहनों ने एकता और संस्कृति समन्यव के प्रतीक  के रूप में रक्षासूत्र बाँधा ।
'समुद्र संगम' (सांस्कृतिक उपन्यास --'मज्ज -उल -बह -रैन' -दाराशुकोह ) जो मुग़ल शहजादे दाराशुकोह के गुरु पंडितराज जगन्नाथ की आत्मकथा का औपन्यासिक अनुवाद है , में आचार्य डॉ भोलाशंकर व्यास ने अपने निवेदन में लिखा है - "दो विरोधी विचारधाराओं, दार्शनिक परम्पराओं, कलागत मान्यताओं, रीति-रिवाजों के .....समन्वय के लिए (जो प्रयास) काश ! कवीन्द्राचार्य सरस्वती, सन्त मुल्लाशाह, बाबा लालदयाल, सरमद, दारा, जहाँआरा और पण्डितराज ने किया, वह सफल हो गया होता।"
इस कार्यक्रम में भी सभी विद्वानों , धर्म गुरुओ , समाजसेवियों ,  अध्यापकों , छात्रों की यही मंशा रही कि भारतीयता की मजबूत गाँठ और मजबूत हो , ऐसे कर्यक्रम हमेशा और सभी दिशाओ में होते रहे  ।
'सभ्यता संघर्ष' नहीं बल्कि सभ्यता समन्वय भारतीय धरा  है ।  हमारा उत्स है । 

Monday, July 30, 2012

एक सांस्कृतिक संवाददाता की डायरी में ‘प्रेमचंद’


                                                       लमही वृतांत
31 जुलाई, 2005 
जन-मन के कुशल चितरे महान कथा-शिल्पी प्रेमचन्द की वर्षपर्यंत मनायी जाने वाली 125 वीं जयंती के निमित्त गठित प्रेमचन्दः 125 वीं जयंती राष्ट्रीय समारोह समिति के बैनर तले (प्रेमचन्द के गाँव) लमहीमें (नामवर) साहित्यकरों-राजनेताओं का दृढ़  जमावड़ा हुआ। इस दिन इस गाँव में इस तरह की जुटान , मेला-तमाशा पिछले 50 वर्षों से 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस), 15 अगस्त, गाँधी जंयती (2 अक्टूबर) की तरह होता रहा है।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर न जाने कितने मंत्री , अधिकारी (साहित्यकार-पाठक तो ऐसे भी आते रहते हैं......) लमही पधारकर  प्रेमचंद को कृतार्थ कर चुके हैं! इस बार लगता है शायद हमारी सरकार अपने प्रतिनिधि लेखक के सचमुच (?) गंभीर है। इसलिए 125 वी जयंती  धूम-धाम से मनाने के लिए समितिगठित हुई। इसी के तहत सूचना-प्रसारण एवं संस्कृति मंत्री  श्री एस. जयपाल रेड्डी (समारोह समिति के अध्यक्ष) यहाँ पधारे तथा प्रेमचन्द स्मारक तथा प्रेमचंद शोध व अध्ययन संस्थान का शिलान्यास  किया। उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने मुख्य अतिथि पद से बड़ी घोषणाएं कीं।

इस तरह रा.सा. समिति की संयोजक राज्यसभा की सांसद सरला माहेश्वरी, आलोचक चंद्रबली सिंह , नामवर सिंहराजेंद्र  यादव,  शिवकुमार मिश्र जैसे मूर्घन्य लोगों की मजबूत उपस्थिति में कर्मकाण्ड की तरह वर्षों से  होती रही तमाम घोषणाओं-आश्वासनों में एक और अध्याय जुड़ गया। “.... नहीं सचमुच इस बार कुछ न कुछ होकर रहेगा .....  के बीच पिछले पर्याप्त अनुभवों  से उपजी आशंकाएं पीछा नहीं छोड़ पा रही हैं। क्या भारत के राष्ट्रपति से बड़ा अभी तक यहाँ कोई आया है क्या ? (अगर सत्ता/पद की बात ही की जाय तो .......)
 गाँव वालों की कई पीढ़ियां मुंशी जी के समकालीनों से लेकर नई पीढ़ी तक हर साल होने वाली कर्मकाण्डी  भीड़-भाड़ से लगभग उबिया चुकी है। खैर, आजादी के बाद से अब तक हमारे जैसे लोकतंत्र में जनता चुनावी आश्वासनों, घोषणाओं की इतनी आदती हो चुकी है कि अब उसके लिए इन्हें  पूरा होना ... नहीं होना कोई मायने नहीं रखता। अब वहइसे इंज्वॉयकरने लगी है। कलम के सिपाही भी कब चाहते कि  जनता की समस्याएँ उसका दुःख-दर्द जारी रहे और सिर्फ  महानों की विरासत के नाम पर स्मारक पर स्मारक  बनते रहे ।

आगे की बात ........

शिलान्यासके बाद सत्तातंत्रदिल्ली /लखनऊ... उड़ गया। लमही से समारोह समिति के अधिकृत नामी साहित्यकारों- लेखकों  का जत्था संगोष्ठी स्थल  उदय प्रताप महाविद्यालय (भोजूवीर) के प्रेक्षागृह में पहुँचा। संगोष्ठी के श्रोताओं, लेखकों का एक बड़ा समूह पहिले से ही वहां जमा था.... लमही नही गया। नहीं जा पाया .. । कारण - वहाँ जाकर पलिहर का वानरहोना है ? बेइज्जत होना है और जो वहाँ से होकर आये थे - वे उदास, चुपचाप,कड़वे अनुभव को लिये खीझते हुए लौटे थे। आखिर, पुलिस-प्रशासन सत्ता को छोड़कर किस चीन्हती है, वे भी लेखकों, पाठकों.... जैसे 'टुच्चे' लोगों को!  बताते हैं बुजुर्ग और भले आलोचक चंद्रबली सिंह तक की गाड़ी रोकी गयी थी.... प्रेमचंद के प्रपौत्र अतुल तो रोके ही गये!

समाज की नब्ज को ठीक से परखने वाले डा. दीनबंधु तिवारी (याद है... 'काशी का अस्सी) का आब्जर्वेशन सटीक बैठा था! वे दो-चार दिन पहले से बता रहे थे कि  वहाँ लदकर जायेंगे ... कोई नहीं पूछेगा और धकियाये जायेंगे अलग से .... और लदकर ही आना पडेगा रैलियोंके भागीदारों की तरह। लेकिन इस मायने में लमही यात्रा सुखद थी कि लंका से (बी.एच.यू.)  एक लक्जरी बस में पाँच-दस  लोग सवार हुए और उधर से रात को लौटानी में भी यहीं दशा थी।


संगोष्ठी: वाराणसी 31 जुलाई 2005 

प्रेमचन्द की प्रासंगिकता समाज की असफलता है - राजेन्द्र यादव

 प्रेमचन्द की 125 वीं जयंती के अवसर पर 125 वीं जयंती  राष्ट्रीय समारोह समितिकी ओर से उदय प्रताप  महाविद्यालय के प्रेक्षागृह में धर्मनिरपेक्ष भारत और प्रेमचन्द  विषयक संगोष्ठी का आयोजन हुआ।

 चंद्रबली सिंह की अध्यक्षता और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के संचालन में गोष्ठी की शुरुआत करते हुए  नामवर सिंह ने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन के दौर में प्रेमचन्द से बड़ा कोई लेखक नहीं दिखाई  देता। कर्बला’ (नाटक), ‘लाँछन (उर्दू में फरेब-कहानी), ‘मंदिर-मस्जिद’(कहानी), ‘हिंसा परमो धर्मः’, ‘कायाकल्प’ (उपन्यास) आदि अनेक रचनाओं को उधृत करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द ने सांप्रदायिकता पर जमकर प्रहार किया। उनकी लडाई दोनों मोर्चों पर थी । हिन्दुत्व की कट्टरता के खिलाफ भी लड़ रहे थे और इस्लाम के भी। उनका मानना था कि समप्रदायिकता पैसे कमाने का भी धंधा है क्योंकि नफरत बिकती है, प्रेम बिकाऊ नहीं होता। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के इस्लाम का विषवृक्षको उन्होंने कम्यूनल एजेंडाकहा था । नामवर जी ने कहा कि प्रेमचंद के  साहित्य में तीन दशक के भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की अमरगाथा है।

हालांकि, नामवर जी इस बार जमे नहीं! पाँच-सात मिनट तक मंच के इस किनारे से उस किनारे तक खराब माइक के कारण चककर काटते रहे। ठोक-ठाक ... इधर-उधर में उनका यूनिक  लयबिगड़ गया था। ...और पहली बार बनारस में खचाखच भरे सभागारों में जनता को वक्तृत्व द्वारा हमेशा सम्मोहित कर देने वाले नामवर जी प्रभावहीन लगे। वे अंत तक प्रेमचंद कि कहानियों को समझाने में लग रहे स्वाभविक भाषण नहीं कर पाये।
जलेस के रा. अ. आलोचक शिवकुमार मिश्र ने कहा कि प्रेमचन्द के वैचारिक लेखन (हंस’, मर्यादा, जागरण, जमाना जैसी पत्रिकाओं में छपे लेख, संपादकीय वगैरह में) स्वाधीनता आंदोलन का पूरा इतिहास मिलता है।  राही मासूम रज़ा से सम्बंधित एक प्रसंग  का उल्लेख करते हुए उनका मानना था कि प्रेमचन्द जेहन के भीतर जमे हुए हिन्दू- मुसलमान को मार चुके थे। इसलिए उन्होंने धर्म की रूढ़ियों, कट्टरता की धज्जियाँ उड़ाई कबीर की तरह। उन्होंने आगे कि सही मायने में प्रेमचंद की सेकुलर  निगाह थी। सेकुलर वो दृष्टि है, सोच है जो आदमी को आदमियत के पैमाने पर शिनाख्त करती है। उनकी स्वराज-संर्घषकी परिकल्पना की बुनियाद ही धर्मनिपेक्षताहै उनके लिए यह बड़ा मूल्य था। अगर जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक समाजवादी भारत आ सका तो प्रेमचन्द का सही सपना पूरा होगा।
सुप्रसिद्व कथाकार दूधनाथ सिंह ने असहमति जताते हुए कहा कि नामवर जी ने कुछ कहानियाँ निकाली .... और शिवकुमार जी ने लेख, संपादकीय ... । इन्हें  सुनकर लगा कि 1900 - 19360  के लेखन काल में उनका पूरा सरोकार हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता  ही थी। सामंतवाद, शोषण और स्त्री पराधीनता के विरूद्व लिखनेवाले प्रेमचन्द का धरम,मरजाद’ ’धर्मनही बल्कि नैतिक मूल्य है।
राजनितिक चिन्तक रमेश दीक्षित  का कहना था कि भारतीय स्वधीनता आंदोलन को हम प्रेमचन्द के बिना समझ नहीं सकते। धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण में उनक मूल्य हमारे लिए संबल है।
 हंससंपादक राजेन्द्र यादव को बचाकररखा गया था। अपेक्षा के मुताबिक देश के दिग्गज स्टा रों  के जमावड़े के बावजूद कुर्सियां खाली थीं। प्रेक्षागृह के आधे हाल में। नामवर जी को सुनने के लिए  इतनी और इस इससे भी अधिक भीड़ होती रही है। श्रोताओं में अधिकसंख्यक नई पीढ़ी के लेखक-पाठक छात्रगण  राजेंद्र यादव को पहली बार देख-सुन रहे थे। कभी साहित्यिक गोष्ठियों में शिरकत न करने वाले लोगों में कई-हम सिर्फ राजेंद्र यादव को सुनने आये हैं। वाले थे।  अपनी बेबाकी, तल्खी, प्रतिशोध तथा जिन्दादिली   के लिय प्रसिद्व (बदनाम’) राजेंद्र यादव ने भी निराश नहीं किया। उनके प्रशंसकों - पाठकों ने हंसऔर अन्य जगह जैसा उनको पढ़ा था, पढ़ी जाने वाल भाषा उसी तरह सुना भी।
श्री यादव ने कहा कि बड़ी मुश्किल से प्रेमचंद प्रतिमा क पहुँचना हो पाया। वहाँ (लमही में) हमारी जरूरत थी भी नहीं। स्थानीय साहित्यकारों की भी भागीदारी  नहीं थी। कैमरामैनही ज्यादा दीख रहे थे। वहाँ प्रेमचन्द का क्या होगा ? हमें राजनेताओं खासकर सत्ता वालों से एलर्जी है। साहित्य सत्ता का प्रतिपक्ष है।  मैं राजनेताओं के साथ असहज हो जाता हूँ। नामवरजी थोड़ा उनके साथ सहज हो जाते हैं। लहमी में किसी संास्कृतिक केंद्र, वाचनालय की घोषणा  नहीं  हुई। यहाँ आकर लगा कि शायाद हम थोड़ा  प्रेमचन्द पर बाल कर सकते हैं।  उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द के व्यक्तिगत  संस्मरण है कि वे व्यवहार में खुलकर मिलते थे, ठठाकर हँसते थे और जो खुलकर हँसता है - वह निर्भीक होता है, जो निर्भीक होता है ईश्वर से नहीं डरता। उसे धर्म की जरूरत नहीं होती । उन्होंने कहा कि भेद करने की मानसिकता जाति में मिलती है। जातिको धर्म का समर्थन हासिल है। हिन्दू सेकुलर नहीं हो सकता- राजनीति व रणनीति में भले हो जाए। जातिवाद के  सबसे बडे़ शिकार दलित और स्त्री  हैं। स्त्री और दलित की मुक्ति के बिना जातिवाद नहीं मिट सकता। और जातिवाद मिटे बिना संाप्रदायिकता खत्म नहीं हो सकती। प्रेमचन्द ने उन सारी समस्याओं को पकड़ा है

जो हमारे समाज और देश को बाँटता है वह वर्णवयवस्था है। बेहद साहसिक अंदाज में अनेको श्रोताओं के लिए यह स्वर बिल्कुल नया था कि प्रेमचन्द बड़ी बाधा हैं।  कोई भी रचनाकार जब हम उसकी नकल करते हैं तो वे हमें खा जाते हैं और जब पार कर जाते हैं तो वे हमारी शक्ति बन जाते हैं।उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द की पूजा क्या हमें निरंतर बौना बनाने की तो नहीं है, यह जाँचनी चाहिए। प्रेमचन्द प्रासंगिक हैं यह कहते हुए गर्व नहीं होता, वे आज भी प्रासंगिक हैं इसमें  हमारे समाज की असफलता है।

चर्चित कथाकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि प्रेमचन्द का सारा साहित्य हमारे लिए घोषणा पत्र है कोई भी नया लेखक  उनसे सिखता है कि कैसा और कैसे लिखना चाहिए। उन्होंने प्रेमचन्द स्मारककी घोषणओं की एक लंबी पंरपरा को याद करते हुए  बनारस की ओर से दिल्लीवालों से गुजारिश की कि फिर दुबारा ऐसा मजाक न हो। क्योंकि प्रेमचन्द एक ऐसे लेखक हैं जिनकी जयंती यहाँ का हर कलाकार, संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार, पाठक, बुद्विजीवी  मनाना अपना कर्तव्य समझता है। 
अध्यक्षीय वक्तव्य में चंद्रबली सिंह ने कहा कि प्रेमचंद को कम्युनिस्ट, गाँधीवादी अपना-अपना बताते हैं। मैं उन्हें कम्युनिस्ट नहीं मानता। लेकिन सामान्य जनता के दुख-दर्द से प्रतिबह रचनाकार के रूप  में वे जनतोत्रिक व्यवस्था, राष्ट्रीय एकता को नयी चेतना प्रदान करते हैं। उनके पास संपूर्ण दृष्टि है। वे गरीबों-मजदूरों की शक्ति को पहचानते थे। शोषण के विरूद्वउनकी लेखकीय  दृष्टि हमारे लिए बेहद जरूरी है।
आलोक राय, अतुल राय सहित अनेक महत्पूर्ण  उपस्थितियां थी।

वे हमारे स्वाभिमान हैं ...

                

                                                                        काशीनाथ सिंह                         

      

   31 जुलाई 1880- 08 अक्टूबर 1936


‘‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिन्तन हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो -जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’’ - प्रेमचंद


‘‘भारत आज भी पूंजीपतियों के शोषण से भयाभय स्थिति में आ चुका है। प्रेमचंद के जमाने का अंग्रेज़ हमारे आज के जमाने का अमरीकन है। इस तरह के संकेत या इशारे जो प्रेमचंद के साहित्य में मिलते हैं उन्हें कभी भी व्यतीत और अप्रासंगिक नहीं होने देंगे। वे भले ही न रहे हों- उनकी रचनाएं हमेशा रहेंगी। वे हमारे स्वाभिमान भी हैं और गौरव भी।’’ 

प्रेमचंद हमारी प्रेरणा ही नहीं आज के लेखकों के लिए चुनौती की तरह हैं। चुनौती इस अर्थ में कि हिंदी कहानी-उपन्यासों के पाठकों की संख्या निरंतर घट रही है। हम सारा दोष प्रकाशकों पर डाल देते हैं। अपनी कमियों के बारे में हम नहीं सोचते। यह नहीं सोचते कि आज भी प्रेमचंद इतने लोकप्रिय क्यों हैं? हर जाति-वर्ण और धर्म का पाठक उन्हें पढऩा क्यों चाहता है?
यही वे प्रश्न हैं जो प्रेमचंद को हमेशा प्रांसगिक बनाए रखेंगे। इसकी पहली वजह यह है कि प्रेमचंद अपने समय की समस्याओं, संघर्षों और आम आदमी की जरूरतों का बराबर ध्यान रखते थे। उनकी कहानियां, उपन्यास आत्मोन्मुखी नहीं, समाजोन्मुखी हुआ करती थी। मानने की बात है कि निजी जिंदगी के बारे में लिखने वाले लेखक में आम आदमी की कोई रुचि नहीं होती। पाठक हर कहानी में अपने को देखना चाहता है। अपने सुख-दुख को, अपने संघर्षों को, अपनी समस्याओं को। प्रेमचंद इस बात का बराबर ध्यान रखते थे। दूसरी बात यह है कि प्रेमचंद की कहानियों के मनुष्य में एक सामान्य हृदय है। वह हृदय जाति-वर्ण-धर्म से परे हर मनुष्य में पाया जाता है। प्रेमचंद की कहानियां उस हृदय का स्पर्श करती हैं। इसलिए वे किसान और मध्यवर्ग के लेखक होकर भी सिर्फ किसानों और वर्गीय चरित्रों के लेखक नहीं हैं। यही कारण है कि वो बींसवी शताब्दी के सिर्फ तीन दशक के लेखक नहीं हैं या स्वाधीनता संग्राम के लेखक नहीं हैं। उन्हें पढ़ते हुए कभी-कभी लगता है कि वे आज के लेखक हैं। जैसे जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में और हिंदी भाषी क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध किसान आंदोलन कर रहे हैं, ये आंदोलन प्रेमचंद के दिनों के किसान आंदोलन की याद दिलाते हैं। आज के किसान और गांव प्रेमचंद के गांव या किसान नहीं रह गए हैं। फिर भी अपनी जमीन को लेकर उनकी मानसिकता वही हैं, जो प्रेमचंद के समय में थी। तीसरी बात प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यासों की भाषा हमारे लिए मॉडल का काम कर सकती है। वह सडक़-बाजार और आम आदमी की भाषा है। इधर के लेखकों की भाषा कभी हिंग्लिश जैसी दिखाई पड़ती है और कभी जनपदीय बोलियों से आक्रांत। इससे किसी को कोई विरोध नहीं हो सकता। लेकिन हम लेखकों को बराबर ध्यान रखना चाहिए कि हम सिर्फ अपने परिचित वर्ग या समाज के लिए नहीं लिख रहे हैं, उनके लिए भी लिख रहे हैं जो हमारे दायरे से बाहर पड़ते हैं। उन्हीं अर्थों में आज के लेखकों के लिए प्रेमचंद को चुनौती के रूप में देखता हूं। और मानता हूं कि प्रेमचंद किसी भी वक्त में अप्रसांगिक नहीं होंगे। वे पुराने पड़ सकते हैं, अप्रासंगिक नहीं।

                                            -लेखक प्रसिद्ध कथाकार हैं ।
  

Thursday, July 19, 2012

...हमने चाँद सुनहरा देखा ---



                                                                     1942--2012




 " बाबू मोशाय  !  जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं ।"


"अरे ओ बाबू मोशाय ! हम तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में हैं , कब , कौन , कहाँ उठेगा ये कोई नहीं जनता । "


 ये संवाद दरअसल दर्शन है जीवन का .. सशक्त अभिनेता और कला सर्जक 'सुपरस्टार'  राजेश खन्ना के बोले सम्वाद आज भी हमें सुकून देते हैं , जीवन को परिभाषित करते हैं ।
अब वे नहीं हैं ...उनका भौतिक शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया है । 'आनंद' में मौत और जीवन के फलसफे को हंसी-खेल , मस्ती , खिलंदडपने से जीने वाले आनंद यानि राजेश खन्ना जिंदगी को बड़ा अर्थ देते हैं । उनकी  मौत पर आज भी दर्शक रो देते हैं ,  आखें छलछला जाती हैं । लेकिन आनंद मरते नहीं ...। उदासी में जीवन को अर्थ देते हैं ...
 उनके चाहने वाले उनसे दूर नहीं थे , नए 'ज़माने' में भी --यह अब बखूबी पता चल रहा है जबकि वे हमसे शारीरिक रूप से दूर हो गए हैं । उनके 'फैन्स' उनसे जुदा नहीं हो सकते ! उनके फैन्स उनके ही रहेंगे ...यही तो उन्होंने पंखे वाले विज्ञापन में कहा । उनके जाने के बाद  देश -विदेश में प्रशंसकों की उदासी और मुंबई में उमडन इस बात की परिचायक है कि  चाहने वाले के दिलो -दिमाग में वे रचे -बसे थे 
  राजेश खन्ना अपने मासूम और सुंदर अभिनय में प्रेम रचते हैं ... रोमांस की गाथा रचते  हैं ...रोमांस का पर्याय बन जाते हैं । लाखों दिलों को प्रेम की मीठी सुगंध से सिक्त करते हैं। उनकी अनेक फिल्में आज भी हर उम्र के दर्शकों को बांध देती हैं । प्रेम ,  रोमांस , भावुकता , उदासी ...राजेश हर जगह विशिष्ट हैं ।


     ''अम्मा की उस कहानी का नायक कोई राजकुमार नहीं, फूल-पत्तियाँ बेचने वाला माली था। माली गुलाबी पंखुडिय़ों सी रंगत और चमकती आँखों वाला था। उसकी मदमस्त हँसी में कोई भाव ऐसा था कि लोगबाग खिंचे चले आते। हमउम्र लड़कियाँ उसके फूल बालों में सजातीं। लड़कियां माली की ढोलक की थाप पर नाच उठना चाहतीं। माली फूल-पत्तियों पर टपकी ओस की बूंदों को सबके होंठों पर सजा देता। लोग मंत्रमुग्ध- से उसे निहारते। माली सतभइया झरनों का मीठा जल अपनी डलिया में ला सकता था। माली झरनों के रखवाले राक्षस से लडक़र उसके गले में बंधी कंठी फोड़ सकता था। माली कमल-फूल में कैद राजकुमारी को राक्षस के चंगुल से छुड़ा सकता था। हाँ-हाँ, सबके दिलों में राज करने वाले नायक ऐसे ही होते हैं। युग बदला और धीरे-धीरे अम्मा की कहानियों में कैद नायक फिल्मी पर्दे पर छाने लगे। वे सितारे बन गये। उनकी अदायें मन-मोहने लगीं। उनकी छवियाँ आदर्श छवियाँ बन गईं। लोग उनकी नकल उतारने लगे। नायकों की देहों पर सजने वाले कपड़े पहनने लगे। वैसे ही बाल संवारने लगे। उन्हें स्टार- सुपरस्टार के तमगों से नवाजने लगे। उनके फैन्स होने की बात कर गर्व से भरने लगें। राजेश खन्ना सडक़ों पर अपने चाहने वालों से घिरे रहने वाले ऐसे ही सुपरस्टार रहे जिनकी हर अदा को दर्शकों ने सराहा। ऐसी रोमांटिक अदायें बिखेरीं कि लड़कियां उनके नाम का सिंदूर सजाने लगीं। अपने खून से उन्हें खत लिखने लगीं। अपनी दमदार ऐक्टिंग और रोमानी हाव-भाव से राजेश खन्ना बहुरंगी छवियों में एक प्रतिनिधि नायक बन गये।''


                               
 राजेश खन्ना यानी जतिन खन्ना का  जन्म (29 दिसंबर , 1942 --18 जुलाई २०12) अमृतसर को  हुआ। परवरिश निस्संतान माता-पिता ने की, जो इनके  माता-पिता के रिश्तेदार थे। स्कूली शिक्षा संत सेवेस्टियन गोअन हाई स्कूल, गिरगाँव से पूरी की, जहाँ रवि कपूर (बाद में जितेन्द्र) भी पढ़ते थे। धीरे-धीरे जतिन खन्ना का मन थियेटर की ओर आकृष्ट हुआ । स्कूल तथा कॉलेज के दिनों में कई नाटक किये। युवा दिनों में उनका प्रेम-प्रसंग फैशन डिजाइनर और अभिनेत्री अंजू महेंद्रू के साथ हुआ, जो कि सात वर्षों तक चला। बाद में षोडषी डिंपल कपाडिय़ा के साथ 1973 में विवाह कर लिया। चट मंगनी पट व्याह के तर्ज पर सुपरस्टार राजेश डिम्पल के हो गए।  इनकी दो बेटियां हुईं-ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना। 
1965 में युनाइटेड प्रोड्यूसर और फिल्मफेयर द्वारा आयोजित ऑल इंडिया टैलेन्ट कॉन्टेस्ट में दस हजार प्रतिभागियों के बीच राजेश खन्ना का चयन अंतिम आठ में हुआ। इन्होंने कॉन्टेस्ट जीत लिया और जी.पी. सिप्पी तथा नासिर हुसैन के साथ अपनी पहली फिल्में साइन कीं। 1966 में चेतन आनंद निर्देशित फिल्म ‘आखिरी खत’ और रविन्द्र दावे निर्देशित ‘राज’ की जो कि टैलेन्ट कॉन्टेस्ट का एक हिस्सा थीं। यूनाइटेड प्रोड्यूसरों के साथ उन्हें ‘औरत,’ ‘डोली’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी फिल्में मिलीं। इसके बाद ‘बहारों के सपने’ और ‘अराधना’ आई। ‘अराधना’ ने इन्हें राष्ट्रीय ख्याति दिलाई और फिल्म आलोचक राजेश को भारत का पहला सुपरस्टार कहने लगे। राजेश ने शर्मिला टैगोर, आशा पारेख, मुमताज, हेमा मालिनी तथा टीना मुनीम जैसी अभिनेत्रियों के साथ कई सामाजिक और रोमांटिक फिल्में कीं। 80 के दशक में इन्होंने शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, पूनम ढिल्लो आदि के साथ भी काम किया।
 अपने करियर के शीर्ष पर पहुँचकर राजेश की प्रसिद्धि इतनी अधिक थी कि सडक़ों पर भीड़ से घिर जाते। फैन्स सडक़ों के किनारे उनके नाम का शोर मचाते खड़े रहते और उनकी कार तक को चूमते। महिलायें खून से लिखे खत भेजतीं। प्रोड्यूसरों और चाहनेवालों की गाडिय़ां उनके बंगले के बाहर लगी रहतीं। महमूद ने भी अपनी फिल्म ‘बॉम्बे टू गोवा’ में उनकी लोकप्रिय छवि का उपयोग किया और फिल्म में बस के ड्राइवर और कंडक्टर का नाम ‘राजेश’ तथा ‘खन्ना’ रखा। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि लड़कियां अपनी अंगुली काटकर खून का सिंदूर बना उनके फोटोग्राफ्स से ही शादी करने लगीं।
1970 में किशोर कुमार द्वारा गाये गये बहुतेरे गीत राजेश खन्ना के लिये ही थे। फिल्म ‘आराधना’ का गाना ‘मेरे सपनों की रानी....’ अपने समय का सबसे लोकप्रिय गाना रहा। आज भी यह गीत हमें झूमता है 
बीबीसी ने राजेश खन्ना पर 1974 में फिल्म ‘बॉम्बे सुपरस्टार’ बनाई। वहीं बॉम्बे यूनिवर्सिटी द्वारा ‘द कैरिज्मा ऑफ राजेश खन्ना’ नामक लेख प्रकाशित किया गया। राजेश की फिल्मों में अच्छी म्यूजिक का खास आकर्षण रहा। एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इनके लिये कई गाने कंपोज किये। राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर. डी. वर्मन की जोड़ी ने कई हिट फिल्में दीं। जिनमें शामिल हैं- ‘अमर प्रेम’, ‘अपना देश’, ‘मेरे जीवन साथी’, ‘आप की कसम’, ‘कटी पतंग’, ‘नमक हराम’, ‘फिर वही रात’, ‘आँचल’, ‘कुदरत’, ‘आवाज’, ‘हम दोनों’, ‘अलग-अलग’ जैसी और भी कर्ई फिल्में। 1969 से 1972 के बीच राजेश खन्ना ने 15 लगातार हिट फिल्में कीं, जो कि भारतीय सिनेमा में अब भी एक ना टूटने वाले रिकॉर्ड की तरह बरकरार है। हालांकि 1976-78 का दौर उनके लिए अच्छा नहीं रहा। कई फिल्में पिट गई। फिर भी खन्ना के जोश-खरोश में कमी नहीं आई और 1979 से ‘अमरदीप’, ‘फिर वही रात’, ‘बंदिश’, ‘दर्द’, ‘कुदरत,’ ‘धनवान’ जैसी अनेक यादगार हिट फिल्में दीं। उनकी फिल्मों में साथ-साथ काम करने वालों में मुख्यत: अशोक कुमार, सुजीत कुमार, प्रेम चोपड़ा, मदन पुरी, आसरानी, बिंदू, विजय अरोड़ा, रूपेश कुमार और ए.के.हंगल रहे जिन्होंने एक टीम की तरह 1980 के अंतिम दशकों तक साथ काम किया। लीड रोल में राजेश की शक्ति सामंता की फिल्में, पंचम के संगीत और आनंद बख्शी की लिरिक्स के साथ वाली फिल्मों पर लोग टूट से पड़ते। 1990 के शुरुआती दिनों से इन्होंने अभिनय करना छोड़ दिया और 1991-96 तक दिल्ली के एम. पी. रहे और राजनीति से जुड़े। 1994 में फिल्म ‘खुदाई’ के साथ फिल्मों में वापसी की। 1999 में ‘आ अब लौट चलें’ और 2002 में ‘क्या दिल ने कहा’ की। सितम्बर 2007 से इन्होंने कई नई फिल्मे और टेलीविजन सीरियल साइन किये। इन्होंने रविन्द्र संगीत आधृत एक एलबम में मुफ्त काम किया। राजेश ने अनेकों टीवी कार्यक्रमों में काम किया तथा एक नई पहचान बटोरी। 2009 में उनके 67वें जन्मदिन पर शेमारु एंटरटेनमेंट ने उनकी फिल्मों और गानों का ‘स्क्रीन लिजेंड्स 'राजेश खन्ना- द ओरिजीनल सुपरस्टार’ के नाम से एक कलेक्शन रिलीज किया। राजेश खन्ना ने कई फिल्मफेयर अवार्ड जीते -1971 ‘सच्चा झूठा’ 1972- ‘आनंद’ 1975- ‘आविष्कार’ के लिए सर्वोच्य अभिनेता का , 1990- फिल्म इंण्डस्ट्री में पच्चीस सालों के योगदान के लिए, 2005- फिल्मफेयर लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड  इसके अतिरिक्त कई बालीवुड अवार्ड, सैन्सुई फिल्म अवार्ड, ऑल इंडिया क्रिटिक्स एशोसिएशन अवार्ड तथा अन्य अवार्डों से भी सम्मानित किए गए।
 राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के नायकों की छवि हैं।  सामाजिक, राजनीतिक, प्रेम कहानियों के हीरो हैं जो दीवाना कर जाते हैं। अपनी कहानियों में राजेश ऐसे भाव उत्पन्न करते हैं कि साधारण-सी भूमिका भी उत्कृष्ट बन जाती हैं और दर्शक उनकी भूमिकाओं में स्वयं को तलाशने लगते हैं। इस तरह बन जाते हैं सभी अपनी-अपनी जिंदगियों के नायक।






 राजेश के बारे में --

‘‘भारतीय सिनेमा में ‘सुपरस्टार’ शब्द का ईजाद ही    उनके लिए हुआ’’- अमिताभ बच्चन



‘‘राजेश भगवान थे। ऐसा हिस्टीरिया कभी नहीं हुआ’’-  मनोजित लाहिरी   

राजेश जब भी मद्रास के एक होटल में जाते आधी रात  के समय 600 लड़कियों का समुह उनके इंतजार में होता’’- मुमताज
  1970 के दशक में कौन उनका फैन नहीं था? मुझे ‘अराधना’, ‘अमर प्रेम’, ‘कटी पतंग’ के लिए लाइन    में खड़े रहना आज भी याद है’’ - अक्षय कुमार  


यह भगवान के वरदान की तरह था कि हम उनके लिए हिट गानों की वृहद कडिय़ा लेकर आयें’’ -   प्यारेलाल
          राजेश खन्ना ने कई फिल्मफेयर अवार्ड जीते जो हैं-
1971- ‘सच्चा झूठा’ के लिये सर्वोच्च अभिनेता का
1972- ‘आनंद’ के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1975- ‘अविस्कार’ के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1990- फिल्म इंण्डस्ट्रीज में पच्चीस सालों के योगदान के लिए
2005- फिल्मफेयर लाइफटाइम अचिवमेंट आवार्ड
 बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एशोसियेशन अवार्ड भी मिलें जो हैं-
1972 में आनंद के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1973 में बावर्ची के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1974 में नमक हराम के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1987 में अमृत के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
2009 का लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड, चीन
2009 का ऑल इंडिया फिल्म वर्कर्स एशोसियेशन लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड
2010 का इंटरनेशनल पुने फिल्म फेस्टीवल में लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड
इसके अतिरिक्त कई बालीवड अवार्ड, सैन्सुई फिल्म अवार्ड, ऑल इंडिया क्रिटिक्स एशोसिएशन अवार्ड तथा अन्य अवार्डों सहित 1995 में कला रत्न से भी सम्मानित किए गए।