Monday, July 30, 2012

वे हमारे स्वाभिमान हैं ...

                

                                                                        काशीनाथ सिंह                         

      

   31 जुलाई 1880- 08 अक्टूबर 1936


‘‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिन्तन हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो -जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’’ - प्रेमचंद


‘‘भारत आज भी पूंजीपतियों के शोषण से भयाभय स्थिति में आ चुका है। प्रेमचंद के जमाने का अंग्रेज़ हमारे आज के जमाने का अमरीकन है। इस तरह के संकेत या इशारे जो प्रेमचंद के साहित्य में मिलते हैं उन्हें कभी भी व्यतीत और अप्रासंगिक नहीं होने देंगे। वे भले ही न रहे हों- उनकी रचनाएं हमेशा रहेंगी। वे हमारे स्वाभिमान भी हैं और गौरव भी।’’ 

प्रेमचंद हमारी प्रेरणा ही नहीं आज के लेखकों के लिए चुनौती की तरह हैं। चुनौती इस अर्थ में कि हिंदी कहानी-उपन्यासों के पाठकों की संख्या निरंतर घट रही है। हम सारा दोष प्रकाशकों पर डाल देते हैं। अपनी कमियों के बारे में हम नहीं सोचते। यह नहीं सोचते कि आज भी प्रेमचंद इतने लोकप्रिय क्यों हैं? हर जाति-वर्ण और धर्म का पाठक उन्हें पढऩा क्यों चाहता है?
यही वे प्रश्न हैं जो प्रेमचंद को हमेशा प्रांसगिक बनाए रखेंगे। इसकी पहली वजह यह है कि प्रेमचंद अपने समय की समस्याओं, संघर्षों और आम आदमी की जरूरतों का बराबर ध्यान रखते थे। उनकी कहानियां, उपन्यास आत्मोन्मुखी नहीं, समाजोन्मुखी हुआ करती थी। मानने की बात है कि निजी जिंदगी के बारे में लिखने वाले लेखक में आम आदमी की कोई रुचि नहीं होती। पाठक हर कहानी में अपने को देखना चाहता है। अपने सुख-दुख को, अपने संघर्षों को, अपनी समस्याओं को। प्रेमचंद इस बात का बराबर ध्यान रखते थे। दूसरी बात यह है कि प्रेमचंद की कहानियों के मनुष्य में एक सामान्य हृदय है। वह हृदय जाति-वर्ण-धर्म से परे हर मनुष्य में पाया जाता है। प्रेमचंद की कहानियां उस हृदय का स्पर्श करती हैं। इसलिए वे किसान और मध्यवर्ग के लेखक होकर भी सिर्फ किसानों और वर्गीय चरित्रों के लेखक नहीं हैं। यही कारण है कि वो बींसवी शताब्दी के सिर्फ तीन दशक के लेखक नहीं हैं या स्वाधीनता संग्राम के लेखक नहीं हैं। उन्हें पढ़ते हुए कभी-कभी लगता है कि वे आज के लेखक हैं। जैसे जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में और हिंदी भाषी क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध किसान आंदोलन कर रहे हैं, ये आंदोलन प्रेमचंद के दिनों के किसान आंदोलन की याद दिलाते हैं। आज के किसान और गांव प्रेमचंद के गांव या किसान नहीं रह गए हैं। फिर भी अपनी जमीन को लेकर उनकी मानसिकता वही हैं, जो प्रेमचंद के समय में थी। तीसरी बात प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यासों की भाषा हमारे लिए मॉडल का काम कर सकती है। वह सडक़-बाजार और आम आदमी की भाषा है। इधर के लेखकों की भाषा कभी हिंग्लिश जैसी दिखाई पड़ती है और कभी जनपदीय बोलियों से आक्रांत। इससे किसी को कोई विरोध नहीं हो सकता। लेकिन हम लेखकों को बराबर ध्यान रखना चाहिए कि हम सिर्फ अपने परिचित वर्ग या समाज के लिए नहीं लिख रहे हैं, उनके लिए भी लिख रहे हैं जो हमारे दायरे से बाहर पड़ते हैं। उन्हीं अर्थों में आज के लेखकों के लिए प्रेमचंद को चुनौती के रूप में देखता हूं। और मानता हूं कि प्रेमचंद किसी भी वक्त में अप्रसांगिक नहीं होंगे। वे पुराने पड़ सकते हैं, अप्रासंगिक नहीं।

                                            -लेखक प्रसिद्ध कथाकार हैं ।
  

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