Monday, July 30, 2012

एक सांस्कृतिक संवाददाता की डायरी में ‘प्रेमचंद’


                                                       लमही वृतांत
31 जुलाई, 2005 
जन-मन के कुशल चितरे महान कथा-शिल्पी प्रेमचन्द की वर्षपर्यंत मनायी जाने वाली 125 वीं जयंती के निमित्त गठित प्रेमचन्दः 125 वीं जयंती राष्ट्रीय समारोह समिति के बैनर तले (प्रेमचन्द के गाँव) लमहीमें (नामवर) साहित्यकरों-राजनेताओं का दृढ़  जमावड़ा हुआ। इस दिन इस गाँव में इस तरह की जुटान , मेला-तमाशा पिछले 50 वर्षों से 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस), 15 अगस्त, गाँधी जंयती (2 अक्टूबर) की तरह होता रहा है।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर न जाने कितने मंत्री , अधिकारी (साहित्यकार-पाठक तो ऐसे भी आते रहते हैं......) लमही पधारकर  प्रेमचंद को कृतार्थ कर चुके हैं! इस बार लगता है शायद हमारी सरकार अपने प्रतिनिधि लेखक के सचमुच (?) गंभीर है। इसलिए 125 वी जयंती  धूम-धाम से मनाने के लिए समितिगठित हुई। इसी के तहत सूचना-प्रसारण एवं संस्कृति मंत्री  श्री एस. जयपाल रेड्डी (समारोह समिति के अध्यक्ष) यहाँ पधारे तथा प्रेमचन्द स्मारक तथा प्रेमचंद शोध व अध्ययन संस्थान का शिलान्यास  किया। उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री श्री मुलायम सिंह यादव ने मुख्य अतिथि पद से बड़ी घोषणाएं कीं।

इस तरह रा.सा. समिति की संयोजक राज्यसभा की सांसद सरला माहेश्वरी, आलोचक चंद्रबली सिंह , नामवर सिंहराजेंद्र  यादव,  शिवकुमार मिश्र जैसे मूर्घन्य लोगों की मजबूत उपस्थिति में कर्मकाण्ड की तरह वर्षों से  होती रही तमाम घोषणाओं-आश्वासनों में एक और अध्याय जुड़ गया। “.... नहीं सचमुच इस बार कुछ न कुछ होकर रहेगा .....  के बीच पिछले पर्याप्त अनुभवों  से उपजी आशंकाएं पीछा नहीं छोड़ पा रही हैं। क्या भारत के राष्ट्रपति से बड़ा अभी तक यहाँ कोई आया है क्या ? (अगर सत्ता/पद की बात ही की जाय तो .......)
 गाँव वालों की कई पीढ़ियां मुंशी जी के समकालीनों से लेकर नई पीढ़ी तक हर साल होने वाली कर्मकाण्डी  भीड़-भाड़ से लगभग उबिया चुकी है। खैर, आजादी के बाद से अब तक हमारे जैसे लोकतंत्र में जनता चुनावी आश्वासनों, घोषणाओं की इतनी आदती हो चुकी है कि अब उसके लिए इन्हें  पूरा होना ... नहीं होना कोई मायने नहीं रखता। अब वहइसे इंज्वॉयकरने लगी है। कलम के सिपाही भी कब चाहते कि  जनता की समस्याएँ उसका दुःख-दर्द जारी रहे और सिर्फ  महानों की विरासत के नाम पर स्मारक पर स्मारक  बनते रहे ।

आगे की बात ........

शिलान्यासके बाद सत्तातंत्रदिल्ली /लखनऊ... उड़ गया। लमही से समारोह समिति के अधिकृत नामी साहित्यकारों- लेखकों  का जत्था संगोष्ठी स्थल  उदय प्रताप महाविद्यालय (भोजूवीर) के प्रेक्षागृह में पहुँचा। संगोष्ठी के श्रोताओं, लेखकों का एक बड़ा समूह पहिले से ही वहां जमा था.... लमही नही गया। नहीं जा पाया .. । कारण - वहाँ जाकर पलिहर का वानरहोना है ? बेइज्जत होना है और जो वहाँ से होकर आये थे - वे उदास, चुपचाप,कड़वे अनुभव को लिये खीझते हुए लौटे थे। आखिर, पुलिस-प्रशासन सत्ता को छोड़कर किस चीन्हती है, वे भी लेखकों, पाठकों.... जैसे 'टुच्चे' लोगों को!  बताते हैं बुजुर्ग और भले आलोचक चंद्रबली सिंह तक की गाड़ी रोकी गयी थी.... प्रेमचंद के प्रपौत्र अतुल तो रोके ही गये!

समाज की नब्ज को ठीक से परखने वाले डा. दीनबंधु तिवारी (याद है... 'काशी का अस्सी) का आब्जर्वेशन सटीक बैठा था! वे दो-चार दिन पहले से बता रहे थे कि  वहाँ लदकर जायेंगे ... कोई नहीं पूछेगा और धकियाये जायेंगे अलग से .... और लदकर ही आना पडेगा रैलियोंके भागीदारों की तरह। लेकिन इस मायने में लमही यात्रा सुखद थी कि लंका से (बी.एच.यू.)  एक लक्जरी बस में पाँच-दस  लोग सवार हुए और उधर से रात को लौटानी में भी यहीं दशा थी।


संगोष्ठी: वाराणसी 31 जुलाई 2005 

प्रेमचन्द की प्रासंगिकता समाज की असफलता है - राजेन्द्र यादव

 प्रेमचन्द की 125 वीं जयंती के अवसर पर 125 वीं जयंती  राष्ट्रीय समारोह समितिकी ओर से उदय प्रताप  महाविद्यालय के प्रेक्षागृह में धर्मनिरपेक्ष भारत और प्रेमचन्द  विषयक संगोष्ठी का आयोजन हुआ।

 चंद्रबली सिंह की अध्यक्षता और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के संचालन में गोष्ठी की शुरुआत करते हुए  नामवर सिंह ने कहा कि स्वाधीनता आंदोलन के दौर में प्रेमचन्द से बड़ा कोई लेखक नहीं दिखाई  देता। कर्बला’ (नाटक), ‘लाँछन (उर्दू में फरेब-कहानी), ‘मंदिर-मस्जिद’(कहानी), ‘हिंसा परमो धर्मः’, ‘कायाकल्प’ (उपन्यास) आदि अनेक रचनाओं को उधृत करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द ने सांप्रदायिकता पर जमकर प्रहार किया। उनकी लडाई दोनों मोर्चों पर थी । हिन्दुत्व की कट्टरता के खिलाफ भी लड़ रहे थे और इस्लाम के भी। उनका मानना था कि समप्रदायिकता पैसे कमाने का भी धंधा है क्योंकि नफरत बिकती है, प्रेम बिकाऊ नहीं होता। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के इस्लाम का विषवृक्षको उन्होंने कम्यूनल एजेंडाकहा था । नामवर जी ने कहा कि प्रेमचंद के  साहित्य में तीन दशक के भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की अमरगाथा है।

हालांकि, नामवर जी इस बार जमे नहीं! पाँच-सात मिनट तक मंच के इस किनारे से उस किनारे तक खराब माइक के कारण चककर काटते रहे। ठोक-ठाक ... इधर-उधर में उनका यूनिक  लयबिगड़ गया था। ...और पहली बार बनारस में खचाखच भरे सभागारों में जनता को वक्तृत्व द्वारा हमेशा सम्मोहित कर देने वाले नामवर जी प्रभावहीन लगे। वे अंत तक प्रेमचंद कि कहानियों को समझाने में लग रहे स्वाभविक भाषण नहीं कर पाये।
जलेस के रा. अ. आलोचक शिवकुमार मिश्र ने कहा कि प्रेमचन्द के वैचारिक लेखन (हंस’, मर्यादा, जागरण, जमाना जैसी पत्रिकाओं में छपे लेख, संपादकीय वगैरह में) स्वाधीनता आंदोलन का पूरा इतिहास मिलता है।  राही मासूम रज़ा से सम्बंधित एक प्रसंग  का उल्लेख करते हुए उनका मानना था कि प्रेमचन्द जेहन के भीतर जमे हुए हिन्दू- मुसलमान को मार चुके थे। इसलिए उन्होंने धर्म की रूढ़ियों, कट्टरता की धज्जियाँ उड़ाई कबीर की तरह। उन्होंने आगे कि सही मायने में प्रेमचंद की सेकुलर  निगाह थी। सेकुलर वो दृष्टि है, सोच है जो आदमी को आदमियत के पैमाने पर शिनाख्त करती है। उनकी स्वराज-संर्घषकी परिकल्पना की बुनियाद ही धर्मनिपेक्षताहै उनके लिए यह बड़ा मूल्य था। अगर जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक समाजवादी भारत आ सका तो प्रेमचन्द का सही सपना पूरा होगा।
सुप्रसिद्व कथाकार दूधनाथ सिंह ने असहमति जताते हुए कहा कि नामवर जी ने कुछ कहानियाँ निकाली .... और शिवकुमार जी ने लेख, संपादकीय ... । इन्हें  सुनकर लगा कि 1900 - 19360  के लेखन काल में उनका पूरा सरोकार हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता  ही थी। सामंतवाद, शोषण और स्त्री पराधीनता के विरूद्व लिखनेवाले प्रेमचन्द का धरम,मरजाद’ ’धर्मनही बल्कि नैतिक मूल्य है।
राजनितिक चिन्तक रमेश दीक्षित  का कहना था कि भारतीय स्वधीनता आंदोलन को हम प्रेमचन्द के बिना समझ नहीं सकते। धर्मनिरपेक्ष भारत के निर्माण में उनक मूल्य हमारे लिए संबल है।
 हंससंपादक राजेन्द्र यादव को बचाकररखा गया था। अपेक्षा के मुताबिक देश के दिग्गज स्टा रों  के जमावड़े के बावजूद कुर्सियां खाली थीं। प्रेक्षागृह के आधे हाल में। नामवर जी को सुनने के लिए  इतनी और इस इससे भी अधिक भीड़ होती रही है। श्रोताओं में अधिकसंख्यक नई पीढ़ी के लेखक-पाठक छात्रगण  राजेंद्र यादव को पहली बार देख-सुन रहे थे। कभी साहित्यिक गोष्ठियों में शिरकत न करने वाले लोगों में कई-हम सिर्फ राजेंद्र यादव को सुनने आये हैं। वाले थे।  अपनी बेबाकी, तल्खी, प्रतिशोध तथा जिन्दादिली   के लिय प्रसिद्व (बदनाम’) राजेंद्र यादव ने भी निराश नहीं किया। उनके प्रशंसकों - पाठकों ने हंसऔर अन्य जगह जैसा उनको पढ़ा था, पढ़ी जाने वाल भाषा उसी तरह सुना भी।
श्री यादव ने कहा कि बड़ी मुश्किल से प्रेमचंद प्रतिमा क पहुँचना हो पाया। वहाँ (लमही में) हमारी जरूरत थी भी नहीं। स्थानीय साहित्यकारों की भी भागीदारी  नहीं थी। कैमरामैनही ज्यादा दीख रहे थे। वहाँ प्रेमचन्द का क्या होगा ? हमें राजनेताओं खासकर सत्ता वालों से एलर्जी है। साहित्य सत्ता का प्रतिपक्ष है।  मैं राजनेताओं के साथ असहज हो जाता हूँ। नामवरजी थोड़ा उनके साथ सहज हो जाते हैं। लहमी में किसी संास्कृतिक केंद्र, वाचनालय की घोषणा  नहीं  हुई। यहाँ आकर लगा कि शायाद हम थोड़ा  प्रेमचन्द पर बाल कर सकते हैं।  उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द के व्यक्तिगत  संस्मरण है कि वे व्यवहार में खुलकर मिलते थे, ठठाकर हँसते थे और जो खुलकर हँसता है - वह निर्भीक होता है, जो निर्भीक होता है ईश्वर से नहीं डरता। उसे धर्म की जरूरत नहीं होती । उन्होंने कहा कि भेद करने की मानसिकता जाति में मिलती है। जातिको धर्म का समर्थन हासिल है। हिन्दू सेकुलर नहीं हो सकता- राजनीति व रणनीति में भले हो जाए। जातिवाद के  सबसे बडे़ शिकार दलित और स्त्री  हैं। स्त्री और दलित की मुक्ति के बिना जातिवाद नहीं मिट सकता। और जातिवाद मिटे बिना संाप्रदायिकता खत्म नहीं हो सकती। प्रेमचन्द ने उन सारी समस्याओं को पकड़ा है

जो हमारे समाज और देश को बाँटता है वह वर्णवयवस्था है। बेहद साहसिक अंदाज में अनेको श्रोताओं के लिए यह स्वर बिल्कुल नया था कि प्रेमचन्द बड़ी बाधा हैं।  कोई भी रचनाकार जब हम उसकी नकल करते हैं तो वे हमें खा जाते हैं और जब पार कर जाते हैं तो वे हमारी शक्ति बन जाते हैं।उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द की पूजा क्या हमें निरंतर बौना बनाने की तो नहीं है, यह जाँचनी चाहिए। प्रेमचन्द प्रासंगिक हैं यह कहते हुए गर्व नहीं होता, वे आज भी प्रासंगिक हैं इसमें  हमारे समाज की असफलता है।

चर्चित कथाकार काशीनाथ सिंह ने कहा कि प्रेमचन्द का सारा साहित्य हमारे लिए घोषणा पत्र है कोई भी नया लेखक  उनसे सिखता है कि कैसा और कैसे लिखना चाहिए। उन्होंने प्रेमचन्द स्मारककी घोषणओं की एक लंबी पंरपरा को याद करते हुए  बनारस की ओर से दिल्लीवालों से गुजारिश की कि फिर दुबारा ऐसा मजाक न हो। क्योंकि प्रेमचन्द एक ऐसे लेखक हैं जिनकी जयंती यहाँ का हर कलाकार, संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार, पाठक, बुद्विजीवी  मनाना अपना कर्तव्य समझता है। 
अध्यक्षीय वक्तव्य में चंद्रबली सिंह ने कहा कि प्रेमचंद को कम्युनिस्ट, गाँधीवादी अपना-अपना बताते हैं। मैं उन्हें कम्युनिस्ट नहीं मानता। लेकिन सामान्य जनता के दुख-दर्द से प्रतिबह रचनाकार के रूप  में वे जनतोत्रिक व्यवस्था, राष्ट्रीय एकता को नयी चेतना प्रदान करते हैं। उनके पास संपूर्ण दृष्टि है। वे गरीबों-मजदूरों की शक्ति को पहचानते थे। शोषण के विरूद्वउनकी लेखकीय  दृष्टि हमारे लिए बेहद जरूरी है।
आलोक राय, अतुल राय सहित अनेक महत्पूर्ण  उपस्थितियां थी।

वे हमारे स्वाभिमान हैं ...

                

                                                                        काशीनाथ सिंह                         

      

   31 जुलाई 1880- 08 अक्टूबर 1936


‘‘हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिन्तन हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो -जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।’’ - प्रेमचंद


‘‘भारत आज भी पूंजीपतियों के शोषण से भयाभय स्थिति में आ चुका है। प्रेमचंद के जमाने का अंग्रेज़ हमारे आज के जमाने का अमरीकन है। इस तरह के संकेत या इशारे जो प्रेमचंद के साहित्य में मिलते हैं उन्हें कभी भी व्यतीत और अप्रासंगिक नहीं होने देंगे। वे भले ही न रहे हों- उनकी रचनाएं हमेशा रहेंगी। वे हमारे स्वाभिमान भी हैं और गौरव भी।’’ 

प्रेमचंद हमारी प्रेरणा ही नहीं आज के लेखकों के लिए चुनौती की तरह हैं। चुनौती इस अर्थ में कि हिंदी कहानी-उपन्यासों के पाठकों की संख्या निरंतर घट रही है। हम सारा दोष प्रकाशकों पर डाल देते हैं। अपनी कमियों के बारे में हम नहीं सोचते। यह नहीं सोचते कि आज भी प्रेमचंद इतने लोकप्रिय क्यों हैं? हर जाति-वर्ण और धर्म का पाठक उन्हें पढऩा क्यों चाहता है?
यही वे प्रश्न हैं जो प्रेमचंद को हमेशा प्रांसगिक बनाए रखेंगे। इसकी पहली वजह यह है कि प्रेमचंद अपने समय की समस्याओं, संघर्षों और आम आदमी की जरूरतों का बराबर ध्यान रखते थे। उनकी कहानियां, उपन्यास आत्मोन्मुखी नहीं, समाजोन्मुखी हुआ करती थी। मानने की बात है कि निजी जिंदगी के बारे में लिखने वाले लेखक में आम आदमी की कोई रुचि नहीं होती। पाठक हर कहानी में अपने को देखना चाहता है। अपने सुख-दुख को, अपने संघर्षों को, अपनी समस्याओं को। प्रेमचंद इस बात का बराबर ध्यान रखते थे। दूसरी बात यह है कि प्रेमचंद की कहानियों के मनुष्य में एक सामान्य हृदय है। वह हृदय जाति-वर्ण-धर्म से परे हर मनुष्य में पाया जाता है। प्रेमचंद की कहानियां उस हृदय का स्पर्श करती हैं। इसलिए वे किसान और मध्यवर्ग के लेखक होकर भी सिर्फ किसानों और वर्गीय चरित्रों के लेखक नहीं हैं। यही कारण है कि वो बींसवी शताब्दी के सिर्फ तीन दशक के लेखक नहीं हैं या स्वाधीनता संग्राम के लेखक नहीं हैं। उन्हें पढ़ते हुए कभी-कभी लगता है कि वे आज के लेखक हैं। जैसे जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में और हिंदी भाषी क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध किसान आंदोलन कर रहे हैं, ये आंदोलन प्रेमचंद के दिनों के किसान आंदोलन की याद दिलाते हैं। आज के किसान और गांव प्रेमचंद के गांव या किसान नहीं रह गए हैं। फिर भी अपनी जमीन को लेकर उनकी मानसिकता वही हैं, जो प्रेमचंद के समय में थी। तीसरी बात प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यासों की भाषा हमारे लिए मॉडल का काम कर सकती है। वह सडक़-बाजार और आम आदमी की भाषा है। इधर के लेखकों की भाषा कभी हिंग्लिश जैसी दिखाई पड़ती है और कभी जनपदीय बोलियों से आक्रांत। इससे किसी को कोई विरोध नहीं हो सकता। लेकिन हम लेखकों को बराबर ध्यान रखना चाहिए कि हम सिर्फ अपने परिचित वर्ग या समाज के लिए नहीं लिख रहे हैं, उनके लिए भी लिख रहे हैं जो हमारे दायरे से बाहर पड़ते हैं। उन्हीं अर्थों में आज के लेखकों के लिए प्रेमचंद को चुनौती के रूप में देखता हूं। और मानता हूं कि प्रेमचंद किसी भी वक्त में अप्रसांगिक नहीं होंगे। वे पुराने पड़ सकते हैं, अप्रासंगिक नहीं।

                                            -लेखक प्रसिद्ध कथाकार हैं ।
  

Thursday, July 19, 2012

...हमने चाँद सुनहरा देखा ---



                                                                     1942--2012




 " बाबू मोशाय  !  जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं ।"


"अरे ओ बाबू मोशाय ! हम तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर उस ऊपर वाले के हाथों में हैं , कब , कौन , कहाँ उठेगा ये कोई नहीं जनता । "


 ये संवाद दरअसल दर्शन है जीवन का .. सशक्त अभिनेता और कला सर्जक 'सुपरस्टार'  राजेश खन्ना के बोले सम्वाद आज भी हमें सुकून देते हैं , जीवन को परिभाषित करते हैं ।
अब वे नहीं हैं ...उनका भौतिक शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया है । 'आनंद' में मौत और जीवन के फलसफे को हंसी-खेल , मस्ती , खिलंदडपने से जीने वाले आनंद यानि राजेश खन्ना जिंदगी को बड़ा अर्थ देते हैं । उनकी  मौत पर आज भी दर्शक रो देते हैं ,  आखें छलछला जाती हैं । लेकिन आनंद मरते नहीं ...। उदासी में जीवन को अर्थ देते हैं ...
 उनके चाहने वाले उनसे दूर नहीं थे , नए 'ज़माने' में भी --यह अब बखूबी पता चल रहा है जबकि वे हमसे शारीरिक रूप से दूर हो गए हैं । उनके 'फैन्स' उनसे जुदा नहीं हो सकते ! उनके फैन्स उनके ही रहेंगे ...यही तो उन्होंने पंखे वाले विज्ञापन में कहा । उनके जाने के बाद  देश -विदेश में प्रशंसकों की उदासी और मुंबई में उमडन इस बात की परिचायक है कि  चाहने वाले के दिलो -दिमाग में वे रचे -बसे थे 
  राजेश खन्ना अपने मासूम और सुंदर अभिनय में प्रेम रचते हैं ... रोमांस की गाथा रचते  हैं ...रोमांस का पर्याय बन जाते हैं । लाखों दिलों को प्रेम की मीठी सुगंध से सिक्त करते हैं। उनकी अनेक फिल्में आज भी हर उम्र के दर्शकों को बांध देती हैं । प्रेम ,  रोमांस , भावुकता , उदासी ...राजेश हर जगह विशिष्ट हैं ।


     ''अम्मा की उस कहानी का नायक कोई राजकुमार नहीं, फूल-पत्तियाँ बेचने वाला माली था। माली गुलाबी पंखुडिय़ों सी रंगत और चमकती आँखों वाला था। उसकी मदमस्त हँसी में कोई भाव ऐसा था कि लोगबाग खिंचे चले आते। हमउम्र लड़कियाँ उसके फूल बालों में सजातीं। लड़कियां माली की ढोलक की थाप पर नाच उठना चाहतीं। माली फूल-पत्तियों पर टपकी ओस की बूंदों को सबके होंठों पर सजा देता। लोग मंत्रमुग्ध- से उसे निहारते। माली सतभइया झरनों का मीठा जल अपनी डलिया में ला सकता था। माली झरनों के रखवाले राक्षस से लडक़र उसके गले में बंधी कंठी फोड़ सकता था। माली कमल-फूल में कैद राजकुमारी को राक्षस के चंगुल से छुड़ा सकता था। हाँ-हाँ, सबके दिलों में राज करने वाले नायक ऐसे ही होते हैं। युग बदला और धीरे-धीरे अम्मा की कहानियों में कैद नायक फिल्मी पर्दे पर छाने लगे। वे सितारे बन गये। उनकी अदायें मन-मोहने लगीं। उनकी छवियाँ आदर्श छवियाँ बन गईं। लोग उनकी नकल उतारने लगे। नायकों की देहों पर सजने वाले कपड़े पहनने लगे। वैसे ही बाल संवारने लगे। उन्हें स्टार- सुपरस्टार के तमगों से नवाजने लगे। उनके फैन्स होने की बात कर गर्व से भरने लगें। राजेश खन्ना सडक़ों पर अपने चाहने वालों से घिरे रहने वाले ऐसे ही सुपरस्टार रहे जिनकी हर अदा को दर्शकों ने सराहा। ऐसी रोमांटिक अदायें बिखेरीं कि लड़कियां उनके नाम का सिंदूर सजाने लगीं। अपने खून से उन्हें खत लिखने लगीं। अपनी दमदार ऐक्टिंग और रोमानी हाव-भाव से राजेश खन्ना बहुरंगी छवियों में एक प्रतिनिधि नायक बन गये।''


                               
 राजेश खन्ना यानी जतिन खन्ना का  जन्म (29 दिसंबर , 1942 --18 जुलाई २०12) अमृतसर को  हुआ। परवरिश निस्संतान माता-पिता ने की, जो इनके  माता-पिता के रिश्तेदार थे। स्कूली शिक्षा संत सेवेस्टियन गोअन हाई स्कूल, गिरगाँव से पूरी की, जहाँ रवि कपूर (बाद में जितेन्द्र) भी पढ़ते थे। धीरे-धीरे जतिन खन्ना का मन थियेटर की ओर आकृष्ट हुआ । स्कूल तथा कॉलेज के दिनों में कई नाटक किये। युवा दिनों में उनका प्रेम-प्रसंग फैशन डिजाइनर और अभिनेत्री अंजू महेंद्रू के साथ हुआ, जो कि सात वर्षों तक चला। बाद में षोडषी डिंपल कपाडिय़ा के साथ 1973 में विवाह कर लिया। चट मंगनी पट व्याह के तर्ज पर सुपरस्टार राजेश डिम्पल के हो गए।  इनकी दो बेटियां हुईं-ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना। 
1965 में युनाइटेड प्रोड्यूसर और फिल्मफेयर द्वारा आयोजित ऑल इंडिया टैलेन्ट कॉन्टेस्ट में दस हजार प्रतिभागियों के बीच राजेश खन्ना का चयन अंतिम आठ में हुआ। इन्होंने कॉन्टेस्ट जीत लिया और जी.पी. सिप्पी तथा नासिर हुसैन के साथ अपनी पहली फिल्में साइन कीं। 1966 में चेतन आनंद निर्देशित फिल्म ‘आखिरी खत’ और रविन्द्र दावे निर्देशित ‘राज’ की जो कि टैलेन्ट कॉन्टेस्ट का एक हिस्सा थीं। यूनाइटेड प्रोड्यूसरों के साथ उन्हें ‘औरत,’ ‘डोली’ और ‘इत्तेफाक’ जैसी फिल्में मिलीं। इसके बाद ‘बहारों के सपने’ और ‘अराधना’ आई। ‘अराधना’ ने इन्हें राष्ट्रीय ख्याति दिलाई और फिल्म आलोचक राजेश को भारत का पहला सुपरस्टार कहने लगे। राजेश ने शर्मिला टैगोर, आशा पारेख, मुमताज, हेमा मालिनी तथा टीना मुनीम जैसी अभिनेत्रियों के साथ कई सामाजिक और रोमांटिक फिल्में कीं। 80 के दशक में इन्होंने शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, पूनम ढिल्लो आदि के साथ भी काम किया।
 अपने करियर के शीर्ष पर पहुँचकर राजेश की प्रसिद्धि इतनी अधिक थी कि सडक़ों पर भीड़ से घिर जाते। फैन्स सडक़ों के किनारे उनके नाम का शोर मचाते खड़े रहते और उनकी कार तक को चूमते। महिलायें खून से लिखे खत भेजतीं। प्रोड्यूसरों और चाहनेवालों की गाडिय़ां उनके बंगले के बाहर लगी रहतीं। महमूद ने भी अपनी फिल्म ‘बॉम्बे टू गोवा’ में उनकी लोकप्रिय छवि का उपयोग किया और फिल्म में बस के ड्राइवर और कंडक्टर का नाम ‘राजेश’ तथा ‘खन्ना’ रखा। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि लड़कियां अपनी अंगुली काटकर खून का सिंदूर बना उनके फोटोग्राफ्स से ही शादी करने लगीं।
1970 में किशोर कुमार द्वारा गाये गये बहुतेरे गीत राजेश खन्ना के लिये ही थे। फिल्म ‘आराधना’ का गाना ‘मेरे सपनों की रानी....’ अपने समय का सबसे लोकप्रिय गाना रहा। आज भी यह गीत हमें झूमता है 
बीबीसी ने राजेश खन्ना पर 1974 में फिल्म ‘बॉम्बे सुपरस्टार’ बनाई। वहीं बॉम्बे यूनिवर्सिटी द्वारा ‘द कैरिज्मा ऑफ राजेश खन्ना’ नामक लेख प्रकाशित किया गया। राजेश की फिल्मों में अच्छी म्यूजिक का खास आकर्षण रहा। एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने इनके लिये कई गाने कंपोज किये। राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर. डी. वर्मन की जोड़ी ने कई हिट फिल्में दीं। जिनमें शामिल हैं- ‘अमर प्रेम’, ‘अपना देश’, ‘मेरे जीवन साथी’, ‘आप की कसम’, ‘कटी पतंग’, ‘नमक हराम’, ‘फिर वही रात’, ‘आँचल’, ‘कुदरत’, ‘आवाज’, ‘हम दोनों’, ‘अलग-अलग’ जैसी और भी कर्ई फिल्में। 1969 से 1972 के बीच राजेश खन्ना ने 15 लगातार हिट फिल्में कीं, जो कि भारतीय सिनेमा में अब भी एक ना टूटने वाले रिकॉर्ड की तरह बरकरार है। हालांकि 1976-78 का दौर उनके लिए अच्छा नहीं रहा। कई फिल्में पिट गई। फिर भी खन्ना के जोश-खरोश में कमी नहीं आई और 1979 से ‘अमरदीप’, ‘फिर वही रात’, ‘बंदिश’, ‘दर्द’, ‘कुदरत,’ ‘धनवान’ जैसी अनेक यादगार हिट फिल्में दीं। उनकी फिल्मों में साथ-साथ काम करने वालों में मुख्यत: अशोक कुमार, सुजीत कुमार, प्रेम चोपड़ा, मदन पुरी, आसरानी, बिंदू, विजय अरोड़ा, रूपेश कुमार और ए.के.हंगल रहे जिन्होंने एक टीम की तरह 1980 के अंतिम दशकों तक साथ काम किया। लीड रोल में राजेश की शक्ति सामंता की फिल्में, पंचम के संगीत और आनंद बख्शी की लिरिक्स के साथ वाली फिल्मों पर लोग टूट से पड़ते। 1990 के शुरुआती दिनों से इन्होंने अभिनय करना छोड़ दिया और 1991-96 तक दिल्ली के एम. पी. रहे और राजनीति से जुड़े। 1994 में फिल्म ‘खुदाई’ के साथ फिल्मों में वापसी की। 1999 में ‘आ अब लौट चलें’ और 2002 में ‘क्या दिल ने कहा’ की। सितम्बर 2007 से इन्होंने कई नई फिल्मे और टेलीविजन सीरियल साइन किये। इन्होंने रविन्द्र संगीत आधृत एक एलबम में मुफ्त काम किया। राजेश ने अनेकों टीवी कार्यक्रमों में काम किया तथा एक नई पहचान बटोरी। 2009 में उनके 67वें जन्मदिन पर शेमारु एंटरटेनमेंट ने उनकी फिल्मों और गानों का ‘स्क्रीन लिजेंड्स 'राजेश खन्ना- द ओरिजीनल सुपरस्टार’ के नाम से एक कलेक्शन रिलीज किया। राजेश खन्ना ने कई फिल्मफेयर अवार्ड जीते -1971 ‘सच्चा झूठा’ 1972- ‘आनंद’ 1975- ‘आविष्कार’ के लिए सर्वोच्य अभिनेता का , 1990- फिल्म इंण्डस्ट्री में पच्चीस सालों के योगदान के लिए, 2005- फिल्मफेयर लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड  इसके अतिरिक्त कई बालीवुड अवार्ड, सैन्सुई फिल्म अवार्ड, ऑल इंडिया क्रिटिक्स एशोसिएशन अवार्ड तथा अन्य अवार्डों से भी सम्मानित किए गए।
 राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के नायकों की छवि हैं।  सामाजिक, राजनीतिक, प्रेम कहानियों के हीरो हैं जो दीवाना कर जाते हैं। अपनी कहानियों में राजेश ऐसे भाव उत्पन्न करते हैं कि साधारण-सी भूमिका भी उत्कृष्ट बन जाती हैं और दर्शक उनकी भूमिकाओं में स्वयं को तलाशने लगते हैं। इस तरह बन जाते हैं सभी अपनी-अपनी जिंदगियों के नायक।






 राजेश के बारे में --

‘‘भारतीय सिनेमा में ‘सुपरस्टार’ शब्द का ईजाद ही    उनके लिए हुआ’’- अमिताभ बच्चन



‘‘राजेश भगवान थे। ऐसा हिस्टीरिया कभी नहीं हुआ’’-  मनोजित लाहिरी   

राजेश जब भी मद्रास के एक होटल में जाते आधी रात  के समय 600 लड़कियों का समुह उनके इंतजार में होता’’- मुमताज
  1970 के दशक में कौन उनका फैन नहीं था? मुझे ‘अराधना’, ‘अमर प्रेम’, ‘कटी पतंग’ के लिए लाइन    में खड़े रहना आज भी याद है’’ - अक्षय कुमार  


यह भगवान के वरदान की तरह था कि हम उनके लिए हिट गानों की वृहद कडिय़ा लेकर आयें’’ -   प्यारेलाल
          राजेश खन्ना ने कई फिल्मफेयर अवार्ड जीते जो हैं-
1971- ‘सच्चा झूठा’ के लिये सर्वोच्च अभिनेता का
1972- ‘आनंद’ के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1975- ‘अविस्कार’ के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1990- फिल्म इंण्डस्ट्रीज में पच्चीस सालों के योगदान के लिए
2005- फिल्मफेयर लाइफटाइम अचिवमेंट आवार्ड
 बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एशोसियेशन अवार्ड भी मिलें जो हैं-
1972 में आनंद के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1973 में बावर्ची के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1974 में नमक हराम के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
1987 में अमृत के लिए सर्वोच्च अभिनेता का
2009 का लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड, चीन
2009 का ऑल इंडिया फिल्म वर्कर्स एशोसियेशन लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड
2010 का इंटरनेशनल पुने फिल्म फेस्टीवल में लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड
इसके अतिरिक्त कई बालीवड अवार्ड, सैन्सुई फिल्म अवार्ड, ऑल इंडिया क्रिटिक्स एशोसिएशन अवार्ड तथा अन्य अवार्डों सहित 1995 में कला रत्न से भी सम्मानित किए गए।